Not sure how to add your code? Check our installation guidelines **KANINA KI AWAZ **कनीना की आवाज**

Monday, June 27, 2022

 
हरियाणा विज्ञान मंच का 16वां द्विवार्षिक सम्मेलन संपन्न
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कनीना की आवाज। हरियाणा विज्ञान मंच का 16वां द्विवार्षिक सम्मेलन कर्मचारी भवन रोहतक में हुआ। जिला महेन्द्रगढ़ से धर्मपाल शर्मा जिला संयोजक हरियाणा विज्ञान मंच के नेतृत्व में विजय भार्गव प्रवक्ता रसायन विज्ञान, विजयपाल यादव गणित अध्यापक, अजीत यादव, रोहतास गोठवाल, प्रियकान्त गौड़,प्रोफेसर वनस्पति विज्ञान ने भाग लिया।
धर्मपाल शर्मा ने बताया कि  मुख्य वक्ता डॉ रणवीर सिंह दहिया अध्यक्ष हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति ने हरियाणा विज्ञान मंच का सफर एवं भविष्य की चुनौतियां पर प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि हरियाणा विज्ञान मंच अपने स्थापना 1987 से ही विज्ञान लोकप्रियकरण, समाज से अंधविश्वासों व कुरीतियों को हटा आम जन में वैज्ञानिक चेतना के लिए कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि ज्ञान का समस्त भंडार जनता की धरोहर है। विज्ञान कोई सिद्धांत अथवा सूत्र नहीं है जिसे किताबों से रटकर याद किया जाये बल्कि यह जीवन के प्रति दृष्टिकोण है। वेदप्रिय जी ने राजनीति और विज्ञान पर चर्चा रखते हुए कहा कि वैज्ञानिक के सामाजिक और राजनैतिक सरोकार होते हैं जिससे उस दौर की शासन व्यवस्था प्रभावित होती है। ऐसा न्यूटन, चाल्र्स डार्विन, आइंस्टीन जैसे वैज्ञानिकों की खोज से सामाजिक परिवर्तन हुए हैं। प्राकृतिक विज्ञान की खोजें क्रांति लाती हैं तो एप्लाइड विज्ञान की खोज सामाजिक परिवर्तन लाती हैं। कृष्ण वत्स द्वारा दो वर्ष के कार्यों की रिपोर्ट व भविष्य के कार्यक्रमों की रूपरेखा के साथ लेखा जोखा भी रखा गया। इस अवसर पर नयी कार्यकारिणी व सचिव मंडल का गठन भी किया गया।सचिव मंडल में
प्रो. विनीता शुक्ला अध्यक्ष, वेदप्रिय व कृष्ण मलिक उपाध्यक्ष, सतबीर नागल सचिव, डॉ पवन व चित्रा सिंह सहसचिव, डॉ शीशपाल कोषाध्यक्ष व कृष्ण वत्स इनके साथ कार्यकारिणी में अजमेर चौहान, राजेंद्र अग्निहोत्री, रमेश चंद्र, बबीता, सुभाष, रणसिंह, प्रमोद गौरी, राजेन्द्र सिंह, चंद्रप्रकाश, कुलदीप पंघाल, मुकेश यादव, मंजू वशिष्ट, डॉ दहिया व स्पेशल आमंत्रित संदीप जंडा शामिल किए। नव चयनित अध्यक्षा प्रो विनीता शुक्ला ने भविष्य के कार्यों पर विस्तार से बात रखते हुए कहा कि अनुभवी व युवा टीम के साथ विज्ञान संचार व वैज्ञानिक चेतना को आमजन तक पहुंचाने के लिए साहित्य व अन्य टूल का प्रयोग किया जायेगा।







यूरो स्कूल के दो विद्यार्थियों ने पास की केवीपीवाइ परीक्षा
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कनीना की आवाज। हाल ही में घोषित राष्ट्रीय स्तर की किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना परीक्षा के परिणाम में यूरो स्कूल कनीना के दो विद्यार्थियों ने सफलता हासिल की है। परीक्षा परिणाम आते ही विद्यालय में खुशी की लहर दौड़ गई। छात्र हेमित कनीना तथा छात्रा कंचन मोहलड़ा ने सफलता का परचम लहराया है। विद्यालय के प्राचार्य सुनील यादव ने इस विशेष उपलब्धि पर विद्यार्थियों, अध्यापकों एवं अभिभावकों को बधाई दी। प्राचार्य ने बताया कि यह परीक्षा भारत सरकार द्वारा संचालित एक राष्ट्रीय स्तर की फैलोशिप परीक्षा है, जिसे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बैंगलोर द्वारा आयोजित किया जाता है जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों का साइंस के रिसर्च फील्ड में अपना कैरियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। यूरो गु्रप के डायरेक्टर डॉ राजेन्द्र यादव ने विद्यार्थियों एवं यूरो टीम को बद्याई दी तथा बताया किस इस परीक्षा में सफलता प्राप्त कर विज्ञान विषय में स्नातक एवं स्नातकोत्तर करने वाले  विद्यार्थियों को सरकार द्वारा प्रतिमाह पांच हजार रुपये छात्रवृत्ति एवं वार्षिक बीस हजार  से 28,000 रुपये तक आकस्मिक निधि के रूप में दिया जाता है जो कि पीएचडी में रजिस्टे्रशन होने तक लगातार मिलती है। यूरो ग्रुप के चेयरमैन सत्यवीर यादव एवं निदेशक नितिन यादव ने सफल विद्यार्थियों को बधाई दी एवं उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
फोटो कैप्शन: छात्र हेमित कनीना तथा छात्रा कंचन मोहलड़ा।





कांग्रेस ने खोला अग्निपथ के खिलाफ मोर्चा, सत्याग्रह के तहत राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन
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कनीना की आवाज। कांग्रेस ने देशभर में केंद्र सरकार की अग्निपथ योजना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पार्टी केंद्र सरकार की अग्नि पथ योजना के खिलाफ संघर्ष की मुहिम को सत्याग्रह नाम दिया है। सोमवार को कनीना में पूर्व विधायक राव बहादुर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस पदाधिकारी व कार्यकर्ताओं ने अर्धनग्न हो कर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हुए एसडीएम सुरेंद्र सिंह को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। सबसे पहले कस्बे स्थित डॉ भीमराव अंबेडकर चौक पर तकरीबन 1 घंटे धरना देकर वहां से कांग्रेस कार्यकर्ता अर्धनग्न हो कर विरोध प्रदर्शन करते हुए एसडीएम कार्यालय पहुंचे। वहीं प्रशासन की और से सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे।  पूर्व विधायक कांग्रेस नेता राव बहादुर सिंह ने कहां की भाजपा सरकार कोई भी योजना बिना सोचे समझे जनता पर लाद देती है। पहले जीएसटी से परेशान किया। उसके बाद नोटबंदी ने देश का बुरा हाल किया। कुछ समय पहले किसानों को परेशान करने के बाद अब देश के जवानों को अग्नि पथ योजना के जरिए धोखे में रखा जा रहा है। कांग्रेस इस योजना को किसी कीमत पर लागू नहीं होने देगी। उन्होने कहा कि हम इस योजना में संशोधन भी बर्दाश्त नहीं करेंगे। जिला अध्यक्ष सुनीता मावता ने कहा कि कांग्रेस चाहती है कि अग्नि पथ योजना पूरी तरह से वापस ली जाए। इस योजना से युवा पढ़ाई और नौकरी दोनों से ही वंचित रह जाएंगे। उन्होंने भाजपा नेताओं के उस बयान पर भी निंदा की जिसमें कहा गया है कि अग्निवीरों को भाजपा कार्यालय में गार्ड की नौकरी दे दी जाएगी। उन्होंने कहा कि फौजियों ने अपने शादी के कार्ड में भी स्थायी नौकरी लिखना शुरू कर दिया है। कितनी शर्मनाक बात है कि देश की रक्षा करने वाले जवान को शर्मिंदा करने में यह सरकार कोई कसर नहीं छोड़ रही है। भाजपा वन रैंक वन पेंशन का नारा देकर सत्ता में आई थी, लेकिन अब नो रैंक नो पेंशन की स्थिति सबके सामने है।
यूथ कांग्रेस के हल्का अध्यक्ष नीरज यादव ने कहा कि सरकार ने अग्निपथ योजना लागू करके युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है।  बिना विचार-विमर्श के थोपी गई अग्निपथ योजना के खिलाफ कांग्रेस अपनी आवाज बुलंद करती रहेगी। इस दौरान विजय चेयरमैन, कांग्रेस नेता राजकुमार यादव, हरीश भडफ़,  जय वीर, रामनिवास, जय किशन, राज सिंह, सतपाल, सुभाषचंद्र, धर्म देव सिंह, जयवीर सिंह, कुलविंदर सिंह, सुभाष चंद्रभान सहित भारी संख्या में कांग्रेसी मौजूद रहे।
फोटो कैप्शन 01: अर्धनग्र होकर एसडीएम को ज्ञापन देते कांग्रेसी
            02: संबोधित करते राव बहादुर सिंह पूर्व एमएलए।





करीब साढ़े तीन किलो गांजा छापामारी कर बरामद, एक के विरुद्ध मामला दर्ज
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कनीना की आवाज। कनीना पुलिस को मुखबिरी के आधार पर सूचना मिली की भोजावास में एक चाय विक्रेेता जिले सिंह नशीला पदार्थ बेच रहा है। पुलिस ने दलबल सहित दुकान पर छापेमारी की तथा नोटिस देकर दुकान की तलाश ली। डॉ राजीव कुमार राजकीय पशु चिकित्सालय बाघोत को ड्यूटी मजिस्ट्रेट बनाकर कार्रवाई की गई। एएसआई एवं पुलिस ने दुकान की तलाशी ली गई तो बेसमेंट में एक पैकिंग थैली  बरामद की जिसमें गांजा मिला। इलेक्ट्रॉनिक कांटे पर पैकिंग को तोला गया तो करीब 3 किलो 600 ग्राम निकला। दुकानदार जिले सिंह से परमिट मांगा तो कुछ भी पेश नहीं कर पाया। इसलिए उसके खिलाफ नशीला पदार्थ बेचने के आरोप में  20-61-85 एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया है।





उमस एवं गर्मी जमकर सताने लगी है लोगों को
-30 जून को बारिश की है संभावना
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कनीना की आवाज। वर्तमान परिदृश्य में मैदानी राज्यों में विशेषकर राजस्थान हरियाणा एनसीआर दिल्ली  और जिला महेंद्रगढ़ में अधिकतर स्थानों पर अभी उमस और पसीने वाली भीषण गर्मी अपने तीखे तेवरों से आगाज किये हुए है जिसकी वजह से सम्पूर्ण इलाके में आमजन को आफ़त भरी गर्मी से रूबरू होना पड़ रहा है। राजकीय महाविद्यालय नारनौल के मौसम विशेषज्ञ डॉ चंद्रमोहन ने बताया कि अभी हरियाणा एनसीआर दिल्ली के आमजन को दो दिनों(28-29जून) तक भीषण उमस और पसीने वाली गर्मी से राहत नहीं मिलने वाली है क्योंकि अभी भी सम्पूर्ण इलाके पर पश्चिमी शुष्क और गर्म हवाओं का प्रभाव जारी है जिसकी वजह से हरियाणा एनसीआर दिल्ली में तापमान में उछाल जारी है। साथ ही साथ कमजोर नमी वाली हवाओं का आना भी जारी हो गया है मौसम में अस्थिरता बनी हुई है जिसकी वजह से कभी कभी हल्की बादल वाही और तेज़ गति से धूल भरी हवाएं चलने और एक दो स्थानों छिटपुट बूंदाबांदी भी देखने को मिल रही है। जिसकी वजह से सम्पूर्ण इलाके में जबरदस्त उमस और पसीने वाली गर्मी अपने रंग दिखा रही है। परन्तु जल्द ही हरियाणा एनसीआर दिल्ली से पश्चिमी गर्म और शुष्क हवाओं का प्रभाव समाप्त हो जाएगा और नमी वाली दक्षिणी पूर्वी हवाओं का आधिपत्य स्थापित होने की प्रबल संभावनाएं बन रही है। जैसे ही दक्षिणी पूर्वी नमी वाली हवाओं का रुख मैदानी राज्यों राजस्थान हरियाणा एनसीआर दिल्ली पर मजबूती प्रदान करेगा वैसे ही  सुस्त मानसून रफ्तार पकडऩे लगेगा और हरियाणा एनसीआर दिल्ली में  राहत की झमाझम बरसात देखने को मिलेगी। और सम्पूर्ण मैदानी राज्यों राजस्थान पंजाब हरियाणा एनसीआर दिल्ली में आफ़त भरी गर्मी भीषण उमस और पसीने वाली गर्मी  का सफाया हो जाएगा। हरियाणा एनसीआर दिल्ली में 28 जून  शाम बाद से ही उत्तरी पूर्वी  हिस्से में  बादल वाही देखने को मिलेगी और 29 जून को कमजोर पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव से हरियाणा एनसीआर दिल्ली में विपरीत हवाओं के मिलन से बादल अपना डेरा जमा लेंगे और कुछ स्थानों देर शाम रात्रि से ही 40 -50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलने और बारिश  के साथ सिमित स्थानों पर  गरज चमक के साथ ओलावृष्टि की गतिविधियां शुरू होने की संभावनाएं बन रही है। साथ ही साथ 30 जून सुबह से ही सम्पूर्ण हरियाणा एनसीआर दिल्ली में अधिकतर स्थानों पर रुकरुक कर बारिश का फैलाव बढ़ेगा और आगे जुलाई के शुरुआत से ही हरियाणा एनसीआर दिल्ली में मानसून गतिविधियों में तेजी और रफ्तार पकडऩे की प्रबल संभावनाएं बन रही है। आज हरियाणा एनसीआर दिल्ली में अधिकतर स्थानों पर अधिकतम तापमान  36.0  डिग्री सेल्सियस से   44.0   डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज किया गया है । आज जिला महेंद्रगढ़ भीषण पसीने और उमस भरी गर्मी का आगाज देखने को मिला। दोपहर बाद मौसम की  अस्थिरता की वजह से हल्की बादल वाही देखने को मिलीं साथ ही साथ तेज़ गति से धुल भरी हवाएं चलीं। जिला महेंद्रगढ़ में अभी दो दिन इसी प्रकार का मौसम रहने वाला है 29  जून की रात्रि और 30 जून अलसुबह से ही हरियाणा एनसीआर दिल्ली के साथ जिला महेंद्रगढ़ में अधिकतर स्थानों पर राहत की बारिश देखने को मिलेगी जिसकी वजह से भारतीय मौसम विभाग ने सम्पूर्ण इलाके पर येलो अलर्ट जारी कर दिया है। आज सोमवार को भी हरियाणा एनसीआर दिल्ली में सबसे अधिक उच्चतम तापमान जिला महेंद्रगढ़ का रहा है । पहले स्थान पर महेंद्रगढ़ 43.8  डिग्री सेल्सियस और दुसरे पायदान पर नारनौल 42.4 डिग्री सेल्सियस के साथ काबिज है। साथ ही साथ सम्पूर्ण हरियाणा एनसीआर दिल्ली में आज न्यूनतम तापमान में भी जिला महेंद्रगढ़ प्रथम पायदान पर रहा है। आज जिला महेंद्रगढ़ में नारनौल और महेंद्रगढ़ का न्यूनतम तापमान क्रमश: 31.3 डिग्री सेल्सियस और 29.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है।जो सामान्य तापमान से 6.0 डिग्री सेल्सियस अधिक बना हुआ है। यानि जिला महेंद्रगढ़ के दिन और रात दोनों ही गर्म बने हुए हैं और साथ ही कमजोर नमी वाली हवाओं की वजह से पसीने और उमस भरी गर्मी अपने तीखे तेवरों से  जिला महेंद्रगढ़ पर आगाज किये हुए है और सम्पूर्ण इलाके का आमजन को आफ़त भरी गर्मी से रूबरू होना पड रहा है।
फोटो साथ हैं।







हरियाणा पावर  कॉरपोरेशन अनुसूचित जाति व पिछड़ा वर्ग कर्मचारी यूनियन की परिचय बैठक का आयोजन
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कनीना की आवाज। सोमवार को कार्यकारी अभियंता दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम नारनोल से हरियाणा पावर  कॉरपोरेशन अनुसूचित जाति व पिछड़ा वर्ग कर्मचारी यूनियन की परिचय मीटिंग बड़े सौहार्द पूर्ण माहौल में संपन्न हुई। इस बारे में जानकारी देते हुए राजेंद्र कपूरी ने बताया कि इस मीटिंग की अध्यक्षता  सर्कल सचिव  राजेंद्र सिंह कपूरी एवं सर्कल ऑर्गेनाइजर जय सिंह ने की । यूनिट प्रधान वेद प्रकाश जेई व यूनिट सचिव सुनील कुमार निनानिया ने कर्मचारियों की मुख्य  समस्याओं पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर अधिकारी ने कर्मचारियों की समस्याओं का निवारण  समय रहते हुए करने का आश्वासन दिया । यूनिट वरिष्ठ उप प्रधान महेश गोमला, उप प्रधान इंद्रजीत सिंह, उप प्रधान वीर सिंह, फोरमैन खजांची गोकल चंद, सब यूनिट सचिव लखनलाल, संगठन कर्ता राजेश कुमार रामपुरा, सचिव सत्यवान, बाबूलाल सब यूनिट खजांची, राजेश कुमार श्यामपुरा, प्रेस सचिव वेद प्रकाश, शंकर लाल जेई संगठन करता यूनिट एवं सतपाल आदि कर्मचारी उपस्थित रहे। इस अवसर पर कार्यकारी अभियंता ने समय रहते सभी समस्याओं के निवारण का आश्वासन दिया।
फोटो कैप्शन 5: परिचय में कर्मियों का सम्मान करते हुए पावर कर्मी।




धारावाहिक-09
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दूर-दराज तक विख्यात कनीना का खाटूश्याम धाम
-2018 में स्थापित हुई थी मूर्ति
डा होशियार सिंह यादव/कनीना की आवाज
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प्रदेश के प्रसिद्ध संत, संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ आश्रम के बिल्कुल पास उत्तर दिशा में करीब पौने दो करोड़ की लागत से खाटूश्याम धाम बनाया गया है। इसकी नीव 6 दिसंबर 2014 को रखी और महज 4 सालों में बनकर तैयार हो गया जिसमें मूर्ति की स्थापना 27 अप्रैल 2018 को की गई। वास्तव में धाम की नींव की ईंट सूबेदार दुलीचंद के हाथों रखी गई। इस मौके पर ललित मोहन आचार्य महेश चंद पथसारिया आदि मौजूद थे। तब से लेकर आज तक खाटू श्याम मंदिर लोगों को आकर्षित करता आ रहा है। भारी संख्या में प्रतिदिन आरती के समय भक्त पहुंचते हैं। प्रदीप कुमार शास्त्री वर्ष 2018 से मंदिर में पूजा अर्चना करते आ रहे हैं।
 कैसे आया खाटू श्याम बनाने का विचार-
 खाटू धाम बनाने के पीछे खाटू शिविर लगाया जाना माना जा रहा है। श्याम सेवा मंडल द्वारा चार शिविर फागुन के समय खाटू श्याम मेले के वक्त भक्तों के लिए लगाए। इन शिविरों में भक्तों की भीड़ बढ़ती ही चली गई जिसको देखते हुए श्याम सेवा मंडल ने यहां एक धार्मिक स्थल खाटूधाम बनाने की सोची। तत्पश्चात इसके लिए एक कमेटी का गठन किया जिसका नाम सेवक श्री श्याम मंडल रखा गया। जब शिविर लगाए जाते थे उस समय सूबेदार दुलीचंद, अनिल सिंगला, रामपाल, कैलाश और विकास महज 5 सदस्य टीम होती थी। किंतु बाद में प्रधान संदीप माहेश्वरी की अध्यक्षता में 25 सदस्य कमेटी का गठन किया गया जो इस वक्त धाम के रखरखाव ,देखरेख निर्माण कार्य,भक्तों के आवागमन, उनकी सेवा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है।
किसने निर्मित किया खाटूधाम-
 करीब 11000 स्क्वायर फीट क्षेत्रफल  में बने इस खाटूश्याम मंदिर को मिस्त्री सूबे सिंह ठेकेदार तथा फूल सिंह ठेकेदार द्वारा निर्मित किया गया। जब मंदिर निर्मित हो गया तत्पश्चात बड़ा जागरण आयोजित किया गया तथा श्याम शीश को जयपुर से लाया गया। जबकि मंदिर में चार स्थानों पर स्थापित राधा कृष्ण मंदिर, हनुमान जी मंदिर, गणेश जी मंदिर, शिव परिवार को गोला का बास बांदीकुई के पास से लाया गया। जयपुर से खाटू शीश को खाटू श्याम नगरी खाटू धाम ले जाया गया जहां से इसे कनीना लाया गया तथा ज्योति प्रज्वलित करके से कनीना तक आदर एवं सम्मान के साथ पहुंचाया गया। इस प्रकार कनीनावासियों, आसपास के लोगों के अतिरिक्त कमेटी के फल स्वरूप वर्तमान भव्य खाटूधाम बनकर तैयार है। जहां हर वर्ष 27 अप्रैल स्थापना दिवस पर विशाल जागरण होता है वही जन्माष्टमी,निशान यात्रा ,फागुन एकादशी पर शिविर लगाया जाता है जहां हजारों भक्त यहां धाम में रुकते हैं, शीश के दानी के दर्शन कर आगे गुजरते हैं। जिनकी बेहतर सेवा की जाती है।
श्याम कुंड-
 यूं तो देश के दो प्रसिद्ध खाटू धाम हैं जिनमें रींगस से 17 किलोमीटर आगे खाटूधाम में सबसे पुराना धाम है जहां कई लाख भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं वहीं हुडिय़ा जैतपुर में भी पुराना खाटू धाम स्थित है जहां पर भारी संख्या में भक्त पहुंचते हैं किंतु शीश के दानी खाटू के प्रति अगाध आस्था और भक्तों की संख्या बढ़ती चली जा रही है जिसके चलते विभिन्न गांवों में खाटू धाम बनाए जाने लगे हैं। इसी कड़ी में खाटू धाम तथा हुडिय़ा जैतपुर धाम से प्रभावित होकर कनीना का खाटू धाम बनाया गया है। वास्तव में मंदिर को अंदर
 बेहद सुंदर निर्मित किया गया है।  खाटू श्याम का शीश दूर दराज से भक्तों को आकर्षित करता है। जहां पूजा के लिए बड़ा स्थान, दूर-दराज तक घंटियों की आवाज, आरती के समय भक्तों का जुटना तथा जेहन में आस्था देखने को मिलती है। खाटू धाम वास्तव में मन को मोह लेता है और जब फागुन एकादशी आती है उस समय न केवल कनीना का संत मोलडऩाथ मेला लगता है अपितु खाटू धाम के लिए भारी संख्या में लोग इधर से गुजरते हैं और अपने को धन्य समझते हैं। खाटू धाम अपने आप में निराला है और लोगों को आकर्षित करने वाला है।
 श्याम कुंड और श्याम बगीची खाटू धाम के अहम अंग माने जाते हैं। श्याम बगीची अभी निर्मित की जा रही है जबकि श्याम कुंड 32 लाख रुपये की लागत से निर्मित हो चुका है। वास्तव में यह कुंड कभी तड़ाग का रूप लिए हुए था। इस जोहड़ में विक्रमी  संवत 2006 तक और इसके कुछ साल बाद तक साफ पानी भरा होता था। यहां कहने को तो  छोटी बणी होती थी जो सीहोर- छितरौली रोड, कनीना के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, कालरवाली जोहड़ तथा बस स्टैंड, बीडीपीओ कार्यालय आदि सभी इसी के बणी के तहत आते थे। विशालकाय जाल के पेड़ मन को मोह लेते थे। इसी जगह एक जाल के नीचे संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ ने अपना आश्रम निर्मित किया था। उनका तालाब/जोहड़ आज भी चला रहा है जो संत की याद दिलाता है। यह जोहड़ कनीना पालिका प्रधान सतीश जैलदार द्वारा पक्का करवाया है तथा इसे मोलडऩाथ जोहड़ तथा श्यामकुंड सम्मिलित नाम दिया जा रहा है। यह जोहड़/कुंड अंदर से पक्का किया गया है तथा इसमें अधिक मात्रा में भरा हुआ पानी बोर द्वारा भूमिगत हो जाएगा तथा इसमें जितना पानी आवश्यकता है उतना भरा जा सकेगा। वर्तमान में यह तड़ाग बनकर तैयार है किंतु इसमें अभी तक पानी नहीं भरा गया है। इसमें नहर से पानी लाने की योजना बनाई जा रही है। कनीना मंडी से गुजरने वाली नहर करीब डेढ़ किलोमीटर दूरी पड़ती है वहां से पानी लाने की योजना बनाई जा रही है जो अभी तक सिरे नहीं चढ़ी है। यह योजना सिरे नहीं चढ़ पाई तो इसे साफ पानी से भरा जाएगा। तब तो क्षेत्र और मनमोहक बन जाएगा। एक और जहां बाबा मोलडऩाथ आश्रम लोगों के भक्ति और श्रद्धा का केंद्र है और इसके पास एक दर्जन विभिन्न धार्मिक स्थान हैं और उनमें सर्वोपरि खाटू धाम आता है। पास में बस स्टैंड होना  यात्रियों के लिए यहां पहुंच का सबसे सुलभ मार्ग बनता है। पूर्व पालिका प्रधान के समय जोहड़ को गंदे पानी से भर दिया गया था किंतु व नगर पालिका द्वारा ही सुुध लेकर इसका गंदा पानी निकाल दिया गया और साफ पानी भरने की योजना बनाई है। पास में बस स्टैंड और खाटू धाम मंदिर के बीच में कुछ जगह गंदगी का साम्राज्य है जिसे राज्य परिवहन विभाग मिट्टी से भरवाकर बेहतरीन बनाने की योजना बन रही है।
 आने वाले समय में यह खाटू धाम लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र होगा। क्योंकि पास में तालाब/कुंड बहुत सुंदर निर्मित किया गया है इसके चारों ओर लाइट का प्रबंध किया है, घूमने फिरने, बुजुर्गों के लिए भी इसके चारों ओर सुबह सवेरे घूमने का मार्ग बनाया गया है। कुल मिलाकर बाबा मोलडऩाथ आश्रम आने वाले समय में हरियाणा का ही नहीं अपितु भारत का एक अग्रणी दर्शनीय स्थल होगा।                 
               श्री खाटू श्याम का जीवन परिचय
  द्वापर युग में जब विष्णु भगवान् श्रीकृष्ण रूप में पृथ्वी लोक पर पापों एवं पापी जनों का अंत करने के लिए आए तब एक दिन श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा से किसी मुद्दे पर वार्तालाप कर रहे थे तो इंद्र देव ने आकर सूचना दी कि प्रागज्योतिषपुर(वर्तमान आसम) के राजा नरकासुर ने देव माता अदिति के कुंडल एवं वरुण देव का छत्रक चोरी कर लिया हे। इन दोनों का धारण करके वे कुंआरी कन्याओं का स्त्रीत्व नष्ट करने पर आमादा है। उन्होंने 16,100 कन्याएं भी बंदी बना ली थी।
  इंद्र देव ने नरकासुर के सेनापति के बारे में भी जानकारी दी जो अति बुद्धिमान एवं मायावी था। उन्होंने नरकासुर के साम्राज्य की सुरक्षा के लिए आकाशीय बिजली को पकड़ कर बांध रखा था तथा कटारें लगा रखी थी। कोई भी इन विद्युत रश्मियों को काटने में सक्षम नहीं था। इस प्रकार नरकासुर का किला अभेद था। इसके अतिरिक्त सेनापति मूर अति शक्तिशाली था। मूर की पुत्री मौरवी जिनका वास्तविक नाम कामकटंककटा था, मां कामाख्या देवी से प्राप्त वरदानों के बल पर अति  ताकतवर थी।
                     कुंडल और छत्रक की कर चोरी, नरकासुर बना बलशाली,
                     मूर सेनापति का बुद्धि बल, अभेद किले की करे रखवाली।
ऐसे समय में श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा को सूर्य देव का वरदान मिला हुआ था कि वह आकाशीय बिजली को भी प्रभावहीन करके उसे काट सकती थी। श्रीकृष्ण के आदेश पर सत्यभामा ने नरकासुर के साम्राज्य की सीमा पर बंधी कटारों तथा आकाशीय बिजली को काट डाला। तत्पश्चात दैत्यराज नरकासुर का श्रीकृष्ण ने वध कर डाला। इसके बाद नरकासुर का सेनापति मूर, श्रीकृष्ण से युद्ध करने के लिए आगे बढ़ा तो उनका भी वध श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से कर डाला जिसके चलते श्रीकृष्ण का नाम मुरारी पड़ा। उधर नरकासुर द्वारा बंदी बनाई गई कन्याओं को मुक्त कराया।
                  नरकासुर का वध किया, मार डाला मूर,
                  मूर का संहार करने से, श्रीकृष्ण बने मुरारी।
श्रीकृष्ण द्वारा मूर सेनापति का वध कर देने के बाद मूर की बलशाली पुत्री नाग कन्या मौरवी(कामकटंककटा)श्रीकृष्ण से युद्ध करने मैदान में आई। श्रीकृष्ण से भयंकर युद्ध करने के बाद जब कामख्या देवी की खडग़ से श्रीकृष्ण पर प्रहार करना चाहा तो श्रीकृष्ण ने उनका वध सुदर्शन चक्र से करना चाहा किंतु उस वक्त कामख्या देवी प्रकट हुई और श्रीकृष्ण से उन्हें माफ करने की प्रार्थना की। कामख्या देवी ने मौरवी से कहा-श्रीकृष्ण ही तुम्हारे भावी ससुर होंगे। तीनों लोकों के स्वामी को प्रणाम करो। मौरवी ने तब श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी और उनसे एक सुंदर पति ढूंढने की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण ने उन्हें वचन दिया कि वे उनके लिए एक अति बलशाली एवं बुद्धिमान पति जल्द ही ढूंढकर ला देंगे।
                     माफ किया मौरवी को, वचन दिया अमर,
                     बुद्धि और बलशाली सा ,ला देंगे एक वर।
उधर हिडिंबा राक्षसी जो अति मायावी थी और दस हजार हाथियों के बल वाले भीम की एक संतान घटोत्कच अब जवानी की ओर कदम रख चुका था। श्रीकृष्ण ने घटोत्कच को नाग कन्या अहिलावती या मौरवी के पास जाकर उनको बुद्धि एवं बल द्वारा हराने एवं उनसे शादी करने का आदेश दिया। घटोत्कच कामदेव द्वारा बसाई हुई अति सुंदर नगरी प्राज्ञज्योतिषपुर गया तो बड़ा प्रसन्न हुआ। उन्होंने निश्चय किया कि इस नगरी की मौरवी को जरूर बुद्धि एवं बल से हराएंगे और उनसे विवाह करेंगे।
जब मौरवी से आमना सामना घटोत्कच का हुआ तो मौरवी ने उनकी बुद्धि एवं बल की परीक्षा लेने के लिए कुछ प्रश्न किए जिनका घटोत्कच ने उत्तर दे दिया। अब बारी प्रश्न पूछने की घटोत्कच की थी। घटोत्कच में अपनी मां हिडिंबा की बुद्धि एवं पिता भीम का बल था। उन्होंने मौरवी को हरा दिया। इसके बाद दोनों के बीच युद्ध चला जिसमें भी मौरवी को हार हाथ लगी जिसके चलते मौरवी ने उनसे विवाह करना पड़ा।
                   बुद्धि और बल में हार गई, मौरवी ने मानी हार,
                   घटोत्कच से हुई शादी, बढ़ गया उनका प्यार।।
मौरवी एवं घटोत्कच के एक सुंदर संतान हुई जिसके बाल अति घने एवं घुंघराले होने के कारण हिडिंबा ने उनका नाम बर्बरिक रखा जो संस्कृत शब्द से लिया गया है। बर्बरिक को चंडील, हारे का सहारा, लख दातार, नीले घोड़े वाला,तीन बाण धारी, खाटू श्याम आदि नामों से जाना जाता है। जब बर्बरिक का जन्म हुआ तभी एक दिन महर्षि वेद व्यास ने हिडिंबा को बताया कि उनका पुत्र अति पराक्रमी होगा जिसके चलते उनके कुल का नाम तीनों लोकों में सम्मान से लिया जाएगा। इतना सुनकर उनका लालन पालन उनकी मां मौरवी ने बड़े ही प्यार से किया। जब बर्बरिक युवा अवस्था की ओर अग्रसर हुआ तो हिडिंबा ने उन्हें हर प्रकार की अस्त्र-शस्त्र विद्या प्रदान की। मां एवं दादी के शिक्षा देने से बर्बरिक अति बलशाली बन गया। वह नीले घोड़े की सवारी करने लगे।
                      नीले घोड़े पर सवार हो, बर्बरिक बना बलशाली,
                       हर योद्धा उनसे हारा, वार ना गया कभी खाली।
 एक दिन बर्बरिक ने अपनी मां मौरवी तथा दादी हिडिंबा से तीनों लोकों में अजय होने की शिक्षा मांगी। उन्होंने जगत में एकमात्र श्रीकृष्ण को यह शिक्षा देने में सक्षम बताया। बर्बरिक श्रीकृष्ण के पास यही प्रश्न लेकर गया। श्रीकृष्ण ने उन्हें तीनों लोकों में विजय पाने के लिए एक ब्राह्मण गुरू विजय सिद्धसेन के पास जाने का आदेश दिया। बर्बरिक ने श्रीकृष्ण को यहीं से प्रथम गुरू मान लिया और समय आने पर गुरुदक्षिणा देने का वचन दिया।
                        राह दिखाई श्रीकृष्ण ने, पहुंचा सिद्धसेन के पास,
                        दिल में उमंग लिए हुए थे, अजय होने की थी आश।
जब विजय सिद्धसेन से बर्बरिक मिला तो विजयसेन ने उन्हें उनके पास आने का कारण पूछा। बर्बरिक ने उन्हें श्रीकृष्ण द्वारा भेजा हुआ और शिक्षा लेने के लिए आया बताया। उन्होंने विश्व में अजय होने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की। सिद्धसेन ने उन्हें अपना शिष्य एक शर्त पर बनाने का वचन दिया-अगर तुम मेरी सात दिन एवं सात रात राक्षसों से रक्षा करके मेरी तपस्या पूर्ण करवा देंगे तो वे सहर्ष शिष्य बना लेंगे। उस वन में मांसभक्षी राक्षसों का जोर था किंतु बर्बरिक के सामने एक भी राक्षस नहीं टिक सका। आखिरकार विजय की विजय हुई और तप पूरा होने पर उन्हें मां चामुंडा ने उन्हें वरदान दिया। तत्पश्चात विजय सिद्धसेन ने बर्बरिक को अपना शिष्य बना लिया और घोर तप करने का आदेश दिया। तीन वर्षों तक घोर तप करने के बाद ही चामुंडा देवी ने बर्बरिक को तीन बाण दिए जिनके बल पर वो विश्व में सबसे बलशाली वीर बन गया। यहीं से बर्बरिक का नाम तीन बाणधारी पड़ गया। एक अन्य प्रसंग के अनुसार शिवभोले की घोर आराधना करने के बाद ही बर्बरिक को विश्व विजेता बनने के लिए तीन बाण प्राप्त हुए। एक अन्य प्रसंग के अनुसार तीन वर्षों तक नव दुर्गा की महीसागर में उपासना एवं तप करने के बाद ही भगवती मां ने उन्हें तीन बाण देकर अजय बना दिया था। साथ में अग्रि देव ने उन्हें धनुष दिया। तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने में सक्षम होने के कारण उन्हें 'चंडीलÓ नाम दिया गया। वे ताउम्र ब्रह्मचारी रहे और महाभारत के युद्ध के बाद वैराग्य धारण कर लिया।
                          घोर तप करके, बर्बरिक को मिला एक वरदान,
                           अजय जगत में हो गए, शीश दे दिया जब दान।
तीन बाणों के बल पर बर्बरिक तीनों लोको को पर विजय प्राप्त कर सकते थे। उनके बाणों की विशेषता थी कि वे लक्ष्य को बेंधकर वापस तरकश में आ जाते थे। पहला बाण सभी छुपे हुए लक्ष्य को एकत्रित कर देता था और दूरा बाण उन्हें पल में समाप्त कर देता था। तीसरे बाण की तो जरूरत ही नहीं पड़ती थी। एक प्रसंग अनुसार पहला बाण उन सभी लक्ष्यों को ढूंढ लेता था जिन्हें बर्बरिक नष्ट करना चाहता था और दूसरा बाण उन्हें पल में नष्ट कर देता था। तीसरे बाण से उनको खात्मा किया जा सकता था जिनको अभी तब दोनों बाणों से बचे होते थे।
                     अभेद क्षमता थी बाणों की, खाली ना जाए वार,
                     जिस पर लक्ष्य साध दिया, होती सदा उसकी हार।
 इन बाणों को पाकर जहां विजय सिद्धसेन प्रसन्न हुए वहीं बर्बरिक अति प्रसन्न हुआ। अपार बुद्धि एवं भावी सोच रखने वाले विजय सिद्धसेन ने यह सोचकर कि कहीं इनका दुरुपयोग न हो जाए, बर्बरिक से दो वचन मांगे। पहले वचन में इन बाणों का उपयोग केवल युद्ध में ही करने और दूसरे वचन में केवल दुर्बल का पक्ष लेेना था। अपने गुरु विजय सिद्धसेन को बर्बरिक ने दोनों वचन अति निष्ठा से निभाने का वादा किया। तीन बाण लेकर बर्बरिक जब अपनी मां नाग कन्या मौरवी तथा हिडिंबा के पास गया तो उन्होंने बताया कि कुरुक्षेत्र में युद्ध होने की संभावना बढ़ गई है। ऐसे में बर्बरिक को अपने बाणों का प्रयोग करने का इससे बेहतर अवसर और कहीं नहीं मिल सकता था। हिडिंबा ने बताया कि यह जग का सबसे बड़ा युद्ध होगा जिसमें एक से बढ़कर एक बलशाली योद्धा लड़ेगा। ऐसा युद्ध भाई-भाई के बीच न कभी हुआ है और न कभी भविष्य में होगा। जब बर्बरिक ने यह सुना तो उनकी युद्ध देखने की तमन्ना और भी बलवती हो गई।
                      जगत में ऐसा भीषण युद्ध, हुआ न होगा कभी,
                      सोच-सोच परेशान हुए, रणक्षेत्र के योद्धा सभी।
 उधर शकुनी मामा अपनी बहन का अंधे धृतराष्ट्र के साथ गांधारी का विवाह करने का बदला लेने के लिए पासे फेंकने की तैयारी में था। वो अपनी बहन को अंधे के संग विवाह करने के लिए दोषी पांडु पुत्रों को मान रहे थे। वहीं हुआ जो नहीं होना चाहिए था। युधिष्ठिर धन, राज्य और आखिरकार पत्नी को भी पासों के दाव पर लगा सब कुछ हार चुका था। जैसे तैसे करके अज्ञात स्थान पर 13 वर्ष बिताने के बाद हस्तिनापुर का राज मांगा फिर पांच गांव मांगे और अंतत: एक सुई के बराबर भी जगह न देने पर विवाद बढ़ चुका था और यह विवाद युद्ध में तबदील हो गया। श्रीकृष्ण ने इस युद्ध को टालने का भरसक प्रयास किया किंतु सफलता नहीं मिली। वैसे तो युद्ध का अंदेशा पांचाली के चीर हरण से ही शुरूआत हो गई थी और एक के बाद एक महान हस्थी इस घटना को देखता रहा और मुख से एक शब्द भी नहीं कहा। अंतत: दोनों कौरव एवं पांडव कुरुक्षेत्र के मैदान में सेना सहित युद्ध के लिए तैयार हो गए। इसी जगह बर्बरिक अपने तीन बाण लेकर युद्ध के मैदान में पहुंच गया। जब श्रीकृष्ण की नजर बर्बरिक पर पड़ी तो श्रीकृष्ण ने युद्ध में आने का कारण पूछा।
जब बर्बरिक ने युद्ध करने के लिए आना बताया तो श्रीकृष्ण ने पूछा कि वे किसका साथ देंगे?
बर्बरिक ने अपने गुरू एवं अपनी मां को दिए गए वचन का स्मरण कराते हुए हारने वाले का पक्ष लेने की बात कही। श्रीकृष्ण ने उनके तीन बाणों की परीक्षा लेने का निर्णय लिया।
                           परीक्षा का निर्णय लिया, ली परीक्षा कठोर,
                           पेड़ के पात छेद दिए, अजय का बजा शोर।
    जब श्रीकृष्ण ने परीक्षा बतौर सामने खड़े एक वट वृक्ष के सभी पत्ते एक ही बाण से बेंधने के बारे में कहा तो बर्बरिक ने पहला बाण छोडऩे की तैयारी की। इसी बीच श्रीकृष्ण ने एक पत्ते को अपने पैर के नीचे छुपाकर यह देखने का प्रयास किया कि क्या किसी को अन्यत्र छुपाने से वो बच पाता है कि नहीं? पहले बाण ने अपना लक्ष्य निर्धारित कर दिया और दूसरा बाण छोड़ा तो सभी पत्ते बेंध डाले और बाण श्रीकृष्ण के पैर की ओर चलने लगा। बर्बरिक ने श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि पैर को हटा ले। एक अन्य प्रसंग अनुसार बाण श्रीकृष्ण के पैर से पार होकर पत्ते को बेंधने में सफल हुआ और श्रीकृष्ण का पैर उस बाण से कमजोर हो गया। यहीं से श्रीकृष्ण की शक्ति क्षीण होने लगी थी। वैसे भी दुर्वासा ऋषि के वरदान अनुसार श्रीकृष्ण के पैर के अलावा सभी अंग किसी भी अस्त्र शस्त्र के प्रभाव से परे थे। महज उनके पैर ही कमजोर थे। अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को बचाने में भी श्रीकृष्ण की आधी शक्ति क्षीण हो चुकी थी। यही कारण था कि मौसुला पर्व के समय जरा शिकारी श्रीकृष्ण के चमकते हुए पैर को हिरण समझकर निशाना लगा दिया और श्रीकृष्ण की मौत हो गई।
                     बर्बरिक के बाण से पड़ गया कमजोर पैर निशान,
                      जरा शिकारी के बाण से उड़ गए श्रीकृष्ण प्राण।
  आखिरकार श्रीकृष्ण ने समझ लिया कि अब युद्ध जीत पाना कठिन हो गया है क्योंकि जब तक बर्बरिक रहेंगे युद्ध नहीं जीता जा सकता।
जब श्रीकृष्ण ने पूछा कि वे किसका साथ देंगे तो बर्बरिक ने साफ शब्दों में बताया कि उनकी माता एवं गुरु को दिए गए वचन के अनुसार वे केवल दुर्बल पक्ष का साथ देंगे।
 श्रीकृष्ण ने बर्बरिक से कहा कि इसका अर्थ यह हुआ कि पहले माना पांडव कमजोर होंगे तो उनका साथ देंगे और कौरव कमजोर पड़े तो उनका साथ देंगे। इस प्रकार कभी पांडवों का तो कभी कौरवों का साथ देते हुए दोनों ओर के सभी वीर समाप्त हो जाएंगे और अकेला बर्बरिक बचेगा और उनका वचन ही उनके लिए श्राप बनकर रह जाएगा।
बर्बरिक ने जब श्रीकृष्ण के विचार सुने तो उसे सच्चाई का अहसास हुआ और श्रीकृष्ण से ही इसका उपाय पूछा। श्री कृष्ण ने जवाब दिया-या तो आप युद्ध से दूर चले जाओ या फिर एक ओर उपाय और अंतिम उपाय हे।
बर्बरिक ने जवाब दिया-आप मेरे पहले मार्गदर्शक एवं गुरू हो और मैं युद्ध से दूर नहीं जा सकता। ऐसे में दूसरा उपाय हो तो बताओ?
श्रीकृष्ण ने पांडवों से बर्बरिक को दूर रखते हुए वचन लिया कि वो जो भी उपाय बताएंगे वो गुरू दक्षिणा बतौर वो देंगे।
                    संशय में पड़ गया बर्बरिक, पूछा श्याम से उपाय,
                    पैरों में गिर पड़े तो, श्रीकृष्ण ने लिया गले लगाय।
 जब बर्बरिक वचनों में बंध गया तो श्रीकृष्ण ने उनका शीश मांग लिया। यहां एक अन्य प्रसंग के अनुसार एक बार जब बर्बरिक विगत जन्म में यक्ष के रूप में थे तो देव सभा में राक्षसों का अंत करने की बात चली तो ब्रह्मा जी ने विष्णु को धरा पर भेजने की बात कही किंतु यक्ष ने कहा कि यह काम तो वे पल में कर सकते हैं।  इस प्रकार सभा में अधिक बोलने पर ब्रह्मा ने उन्हें श्राप दिया था कि जब विष्णु भगवान् धरती के पाप मिटाने के लिए धरती पर श्रीकृष्ण का रूप लेंगे तो उनका शीश सबसे पहले धड़ से अलग करेंगे।
                            पूर्व जन्म में यक्ष थे, दिया ब्रह्मा ने अभिशाप,
                           पाप मिटाने विष्णु आएंगे, तब तक करना जाप।
शीश देने की बात सुनकर बर्बरिक संकोच में पड़ गये। श्रीकृष्ण के पूछने पर पर बर्बरिक ने उत्तर दिया-आप जैसे गुरू को प्राणों से कम अगर दक्षिणा दी जाए तो वो दान का अपमान होगा किंतु मैं यह युद्ध देखने का इच्छुक था। लगता है कि अब यह युद्ध मैं नहीं देख पाऊंगा।
श्रीकृष्ण ने इस अवसर पर जवाब दिया-तुम्हारा धड़ एवं शीश अलग होने पर भी शीश हर बात को सुनने, देखने, परखने की क्षमता होगी। माना जाता है कि शुक्ल पक्ष फाल्गुन माह के 12वें दिन मंगलवार के दिन बर्बरिक ने शीश दिया था। शीश देने के कारण ही बर्बरिक महात्मा बर्बरिक कहलाए।
                               वचनों में फंसकर ही, दिया शीश का दान,
                               महात्मा बन गए बर्बरीक, बढ़ी उनकी शान।
बर्बरिक की मायूसी तोडऩे व कारण का पता लगाने के बाद श्रीकृष्ण ने कहा-यदि आप युद्ध देखना चाहते हैं तो वह काम मैं करवाऊंगा। आपका शीश युद्ध का सारा हाल अति बारीकी से देख सकेगा और हर घटना को बखूबी से देख व सुन सकेगा। इतना सुनकर बर्बरिक ने अपना शीश देने के लिए श्रीकृष्ण के आगे झुक गए और कहा-आप मेरे शीश को ले सकते हैं।
 श्रीकृष्ण ने इस अवसर पर कहा-हे दानवीर, दान लिया नहीं जाता है अपितु दिया जाता है। ऐसे में आप स्वयं अपना शीश काटकर दे।
इतना सुनकर बर्बरिक ने अपना शीश धड़ से अलग करके श्रीकृष्ण् को दान दे दिया। तब कहीं जाकर पांडवों को युद्ध में जीत की संभावना नजर आने लगी।
                           दान दे दिया शीश, पांडव हुए सफल,
                           देंगे उत्तर युद्ध में, होने वाला है कल।
इसके बाद रणभूमि में प्रकट हुई 14 देवियों के द्वारा अमृत से सिंचित करके ऊंचे स्थान पर रखवाया गया था। बर्बरिक का सिर एक ऊंची पहाड़ी पर कुरुक्षेत्र के पास रख दिया जहां से बर्बरिक युद्ध का सारा हाल देख व सुन सकता था। तत्पश्चात शुरू हुआ जग का सबसे बड़ा और सबसे महान योद्धाओं के बीच युद्ध। इस युद्ध में लाखें महिलाएं बेवा हो गई और चारों ओर सन्नाटा छा गया। कर्ण, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, दुर्योधन, जयद्रथ और कितने ही महान योद्धा एक के बाद एक मरते हुए देखे। भारी रक्तपात हुआ। चारों ओर धुआं और किलकारियां सुनाई पडऩे लगी। कहीं भीम को कौरवों का लहू पीते हुए देखा तो कहीं अभिमन्यु जैसे बालक पर एक नहीं अपितु सात-सात महारथियों द्वारा एक साथ वार करते और जान लेते हुए देखा।  
इतना भीषण युद्ध हुआ जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह युद्ध अहंकार, अधर्म, अत्याचार ,अन्याय तथा न्याय, धर्म, एवं नम्रता के बीच चला। यह युद्ध 18 दिनों तक चलता रहा। इस युद्ध के शुरू होने से पूर्व एक बार श्रीकृष्ण ने सभी महारथियों से युद्ध समाप्त करने का समय पूछा था तो द्रोणाचार्य ने कहा था कि वे 25 दिन में युद्ध समाप्त कर देंगे। कर्ण ने यही युद्ध 24 दिनों में अर्जुन इसे 28 दिन में समाप्त करने की बात कर रहे थे किंतु बर्बरिक से जब युद्ध समाप्ति की अवधि पूछी तो उनका उत्तर था कि वे एक मिनट में युद्ध समाप्त कर सकते हें। इससे भी श्रीकृष्ण बर्बरिक से अति प्रसन्न हुए थे। यहीं पर श्रीकृष्ण के मुख से एक शब्द निकला-क्षत्रियों में सबसे बहादुर बर्बरिक था।
                       क्षत्रियों में सबसे बहादुर, श्रीकृष्ण ने किया उच्चार,
                       तीनों लोकों में सबसे धनुर्धर, नहीं होगी कभी हार।
जब युद्ध समाप्त हो गया तो सभी पांडव विजय श्री का श्रेय अपने सिर लेना चाहते थे। ऐसे में किसे सच्चा नायक कहा जाए , एक समस्या बनकर खड़ी हो गई। ऐसे में श्रीकृष्ण सहित सभी मिलकर इसका न्याय करवाने के लिए बर्बरिक के शीश के पास गए और सही नायक बताने की प्रार्थना की।
इस समय शीश ने कहा- इस युद्ध में केवल दो ही चीजें नजर आ रही थी। एक तो श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र जो हर योद्धा के साथ था वहीं द्रोपदी का काल रूप लहू पीते नजर आया। इन दोनों के अलावा और कुछ भी नहीं था। बर्बरिक के सच्चे न्याय से श्रीकृष्ण अति प्रसन्न हुए और उनका शीश धड़ से जोड़कर पुन: जीवित कर गले से लगा लिया और कहा-कलियुग में आप मेरे नाम से ही पूजे जाएंगे और आप श्याम बाबा अर्थात खाटू श्याम नाम से प्रसिद्ध होंगे।
                  दे दिया वरदान पूजे जाओगे कलियुग में श्याम,
                 शीश के दानी, महावीर तुमने कर दिया वो काम।
जब बर्बरिक को फिर से जीवन मिल गया तो उनकी दादी हिडिंबा एवं मां नाग कन्या मौरवी ने उन्हें घर पर चलने की प्रार्थना की किंतु उन्होंने अपने परिजनों को को अपने छोटे भाई मेघवान को सौंपते हुए कहा कि अब मेरा मन इतना भयंकर दृश्य देखकर ऊब चुका है और अब मैं तप करना चाहता हूं। श्रीकृष्ण ने एक बार फिर से मार्ग दर्शन करते हुए तप करने के लिए जंगलों में जाने की अनुमति दे दी। इसी से ही बर्बरिक एक महात्मा कहलाए।
                     उद्वेलित हुआ मन, बर्बरिक बन गए महात्मा,
                     युगों-युगों तक नाम रहेगा, परम पुनीत आत्मा।
एक अन्य प्रसंग के अनुसार युद्ध का असली नायक जब शीश ने बताया तो सभी ने उन्हें प्रणाम किया और भगवान् श्रीकृष्ण ने उन्हें प्रणाम करते हुए कलियुग में उनके नाम से पूजे जाने का वरदान दिया और शीश को एक नदी में बहा दिया जो बहकर वर्तमान खाटू श्याम में पहुंचा जहां आज भी पूजा की जाती है।
                           कलियुग के भगवान्, तीन बाणधारी,
                           हिडिंबा दादी थी, मौरवी मां प्यारी।
एक अन्य प्रसंग यह भी मिलता है कि जब शीश ने सच्चा न्याय करते हुए युद्ध का असली नायक बता दिया तो भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें खाटू में दफना दिया। श्रीकृष्ण ने कहा-वक्त आएगा जब तुम पुन: शीश के रूप में अवतार लोगे और तुम्हारी पूजा मेरे ही नाम के रूप में होगी।
 एक बार एक गाय उस स्थान पर खड़ी थी जहां खाटू श्याम का शीश दफनाया गया था। गाय के थनों से दूध स्वत: धारा के रूप में बह निकला। जब लोगों ने यह घटना देखी तो अचंभित हो गए और उस स्थान को खुदवाया गया। कई दिनों तक खुदाई चली तो उस जगह एक शीश निकला जो खाटू श्याम का अर्थात बर्बरिक का था। पूजा अर्चना करके एवं विधि विधान अनुसार उसे कार्तिक माह की एकादशी को मंदिर में रखा गया और उसी दिन को श्याम बाबा का जन्म दिन मानकर मनाया गया। इस भव्य मंदिर का निर्माण 1027 ई. में रूप सिंह चौहान एवं उनकी पत्नी नर्मदा कंवर ने बनवाया था किंतु वर्ष 1720 में मारवाड़ के ठाकुर के दीवान अभय सिंह ने जीर्णोद्धार करवाया गया जो आज तक चला आ रहा है।
                    सुनकर कथा बर्बरिक की, सिर श्रद्धा से झुक जाए,
                    मन्नत दिल में लेकर आए, वो खुश होकर लौट जाए।
खाटू श्याम जी नेपाल में यलांबार नाम से जाने जाते हैं। हिमाचल प्रदेश में मंडी जिले के कामरू पर्वत पर सुंदरनगर में वे कामरूनाग नाम से पूजे जाते हैं। पूरे विश्व में प्रसिद्ध एवं पूजे जाने वाले खाटू श्याम की महानता के किस्से हर इंसान की जुबान पर है जिसके चलते आज भी उन्हें श्रद्धा से याद करते हुए भक्तजन दूर दरज से आकर उनकी पूजा करते हैं और ध्वजा चढ़ाते हैं। उन सभी भक्तों की मनोकामना पूर्ण हो जाती है।
                       कई रूपों में पूजे जाए, विश्व में हैं विख्यात,
                        हारे का सहारा प्रभु, दुखिया का देता साथ।
आज भी श्याम बाबा को विभिन्न नामों से भक्तजन जानते हैं जिनमें 'श्याम प्यारेÓ, 'बरबरिकाÓ, 'कलियुग के अवतारीÓ, 'तीन बाणधारीÓ, 'खाटू नरेशÓ, 'लख दातारीÓ, 'शीश के दानीÓ, 'हारे का सहाराÓ आदि कई नाम प्रसिद्ध हैं। भक्तजन विभिन्न नामों से पुकारते हुए निशान लेकर अपने घर से चलते हैं और खाटू श्याम मंदिर पहुंचते हैं।
मंदिर के पास ही श्याम बगीची है जहां से भक्तजन फूल तोड़कर श्याम बाबा को अर्पित कर मन्नत मांगते हैं। इसी बगीची में श्याम बाबा के प्रसिद्ध भक्त आलू सिंह की समाधि बनी है। पास में ही गोपीनाथ एवं गौरीशंकर मंदिर हैं। ये मंदिर अति प्राचीन बताए जाते हैं। यूं तो यहां प्रतिदिन हजारों भक्तजन आते हें जिनमें विदेशी भी प्रमुख होते हैं। यहां पर मुंडन संस्कार आयोजित होते हैं वहीं नव विवाहित को आशीर्वाद लेने के लिए आना पड़ता है। विभिन्न पर्वों पर यहां भक्तजन खुशी मनाते हैं जिनमें कृष्ण जन्माष्टमी, होली, बसंत पंचमी एवं कुछ अन्य पर्व शामिल हैं। फाल्गुन मेले के पर्व पर श्याम कुंड में स्नान का अति महत्व बताया जाता है। इस कुंड से ही श्याम बाबा का शीश प्राप्त हुआ था। इस कुंड का जल कई रोगों में लाभकारी बताया जाता है। यूं तो बाबा मंदिर के द्वार खुलने का एक समय होता है किंतु फाल्गुन मेले पर द्वार 24 घंटे खुले रहते हैं। मेले में खीर एवं चूरमा का प्रसाद वितरित किया जाता है।
                          श्याम कुंड निराला, फाल्गुन मेला मतवाला,
                          बाबा का प्रसाद बांट दो, घर में हो उजाला।   
सावधान--
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धारावाहिक -10
धारावाहिक -10 में पढ़ेंगे कनीना के हाथीखाने का इतिहास
सभी स्थलों की फोटो साथ हैं।


Sunday, June 26, 2022

 
 गजराज मोड़ी ने उगाए एक एक किलो से अधिक वजनी बैंगन
-अंदर से है कच्चे
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 कनीना की आवाज। कनीना उपमंडल के गांव मोड़ी निवासी गजराज सिंह किसान यूं तो वर्षों से कृषि पर प्रयोग कर रहे हैं और समय-समय पर भारी और वजनी सब्जी उगाकर नाम कमाते रहे हैं। विगत दिनों एक-एक किलोग्राम के टिंडा पैदाकर नाम कमाया है। हाल ही में उनके खेत में करीब एक एकड़ में बैंगन लगे हुए हैं। उन्होंने पत्रकारों के समक्ष दिखाया कि पांच बैंगन 5 किलो 490 ग्राम के है। यद्यपि देखने में यह पक्के लगते हैं किंतु उन्होंने काट कर दिखाया कि सभी बैंगन अंदर से बिल्कुल सब्जी योग्य कच्चे हैं। उन्होंने बताया कि सिर्फ 2 दिन में ही इनका वजन इतना बढ़ जाता है, यदि 100 ग्राम का बैंगन छोड़ दिया जाए तो आगामी 2 दिनों में एक किलो तक बढ़ जाते हैं। इसके बाद अंदर से पकने शुरू हो जाते हैं और फिर उनका वजन घटने लग जाता है। गजराज सिंह ने बताया कि उनका पूरा परिवार सब्जी उगाने में जिनमें अजय और कांता प्रमुख रूप से भूमिका निभा रहे हैं। बाजार में भारी-भरकम बैंगनों की कोई कदर नहीं होती, खरीदार नहीं मिलते। ये गौशाला को ही भेज दिए जाते हैं ताकि गायों के काम आए।
 फोटो कैप्शन 01: 5 किलो बैंगन  5 किलो 490 ग्राम के दिखाते हुए
दो: अंदर से कच्चे हैं, काटकर दिखाते हुए गजराज मोड़ी।





सम्पूर्ण हरियाणा एनसीआर दिल्ली में  जिला महेंद्रगढ़ का अधिकतम तापमान अधिक
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कनीना की आवाज। पिछले कई दिनों से मानसून की गतिविधियों में सुस्ती देखने को मिल रही थी ।लेकिन जल्द ही एक बार फिर से सुस्त मानसून रफ्तार पकडऩे की संभावनाएं बन रही है। सम्पूर्ण मैदानी राज्यों राजस्थान पंजाब उत्तर प्रदेश हरियाणा एनसीआर दिल्ली में राहत की झमाझम बारिश की प्रबल संभावनाएं बन रही है।
   राजकीय महाविद्यालय नारनौल के मौसम विशेषज्ञ डॉ चंद्रमोहन ने बताया कि करीब एक सप्ताह से सम्पूर्ण मैदानी राज्यों राजस्थान हरियाणा एनसीआर दिल्ली और विशेषकर जिला महेंद्रगढ़ में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पश्चिमी शुष्क और गर्म हवाओं का प्रभाव से तापमान में बढ़ोतरी के साथ उमस व पसीने वाली गर्मी अपना आगाज किये हुए है। जिसकी वजह मानसून गतिविधियों में सुस्ती देखने को मिल रही है।परन्तु जल्द ही सम्पूर्ण इलाके से पश्चिमी हवाओं का रूख बदल जाएगा और सम्पूर्ण इलाके पर बंगाल की खाड़ी से नमी वाली दक्षिणी पूर्वी हवाओं का रुख का आधिपत्य हों जाएगा । जिसकी वजह आगामी दिनों में बंगाल की खाड़ी से आने वाली पूर्वी हवाएं प्रभावी होने से मानसून के आगे बढऩे के लिए परिस्थितियां अनुकूल बन जाएगी और मानसून  रफ्तार  पकडऩे की संभावनाएं बन रही है साथ ही उत्तरी मध्य प्रदेश और दक्षिणी उत्तर प्रदेश पर एक निम्न वायु दबाव का क्षेत्र बनने की संभावना बन रही है। जिसकी वजह से उत्तरी मैदानी राज्यों में राजस्थान  पंजाब हरियाणा एनसीआर दिल्ली में आगामी 3-4 दिनों  के बाद मानसून गतिविधियों  में तेजी दर्ज की जाएगी। 28 जून से ही हरियाणा एनसीआर दिल्ली में अधिकतर स्थानों पर हवाओं का रूख बदल जाएगा और सम्पूर्ण इलाके पर पूर्वी नमी वाली हवाओं की वजह से बादल अपना डेरा जमा लेंगे। हालांकि एक कमजोर पश्चिमी विक्षोभ की वजह से 29 तारिख को  हरियाणा  और एनसीआर दिल्ली में बारिश की गतिविधियां देखने को मिलेगी साथ ही साथ इन गतिविधियों से 30 जून को हरियाणा एनसीआर के अधिकतर स्थानों पर बारिश की गतिविधियां देखने को मिलेगी इन सभी कारणों से जुलाई के पहले सप्ताह की शुरुआत से ही सम्पूर्ण हरियाणा एनसीआर दिल्ली सम्पूर्ण मैदानी राज्यों में धीरे धीरे मानसून रफ्तार पकडऩे की प्रबल संभावनाएं बन रही । आज रविवार को हरियाणा एनसीआर दिल्ली में अधिकतर स्थानों पर अधिकतम तापमान 37.0 डिग्री सेल्सियस से  44.3  डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज किया गया है जबकि हरियाणा एनसीआर में अधिकतर स्थानों पर न्यूनतम तापमान 25.0 डिग्री सेल्सियस और  29.0डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है। आज जिला महेंद्रगढ़ में सुबह से सूर्य देव की उष्ण किरणों का असर देखने को मिला साथ ही साथ दोपहर बाद स्थानीय मौसमी प्रणाली की वजह से जिला महेंद्रगढ़ पर आंशिक बादलवाही और तेज़ गति से धुल भरी हवाएं देखने को मिलीं परन्तु मौसम शुष्क और गर्म बना हुआ रहा साथ ही तापमान में बढ़ोतरी दर्ज हुई है और सम्पूर्ण जिला महेंद्रगढ़ में आमजन उमस और पसीने वाली गर्मी से रूबरू होना पड रहा है। आज जिला महेंद्रगढ़ में नारनौल और महेंद्रगढ़ का अधिकतम तापमान क्रमश:  43.0 डिग्री सेल्सियस और 44.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है।जो सामान्य तापमान से 5.0 डिग्री सेल्सियस उपर दर्ज किया गया है। जबकि जिला महेंद्रगढ़ में नारनौल और महेंद्रगढ़ का न्यूनतम तापमान क्रमश: 27.6 डिग्री सेल्सियस और  26.0 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है।  पश्चिमी पवनों के प्रभुत्व से  जिला महेंद्रगढ़ में दिन और रात फिर से उष्ण और गर्म बने हुए हैं । इसी प्रकार की मौसम स्थितियां रहने की वजह से अगले दोनों तक  जिला महेंद्रगढ़ में एक बार फिर से हीट बेव लू की आशंकाएं भी बन रही है। परन्तु अगले दो तीन दिनों के बाद सम्पूर्ण हरियाणा एनसीआर दिल्ली और विशेषकर जिला महेंद्रगढ़ में पूर्वी हवाओं का रूख होने पर सम्पूर्ण इलाके से उमस और पसीने वाली गर्मी का सफाया हो जायेगा  और विपरीत हवाओं के मिलन से सम्पूर्ण इलाके पर बादल अपना डेरा जमा लेंगे और राहत भरी बारिश की बूंदे आमजन को राहत पहुंचाने की प्रबल संभावनाएं बन रही है।






नशे की लत जिसने डारी अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी-मा.राजेश उन्हाणी
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कनीना की आवाज। अंतर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस पर लोगों को जागरूक करते हुए शिक्षक व स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी उन्हाणी निवासी मा. राजेश ने कहा कि नशा मनुष्य जीवन का नाश करता है। बेहतर जीवन के लिए नशे से दूर रहना ही समझदारी है।नशा करने वाला व्यक्ति स्वयं अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का बेदर्दी से भरा कार्य करता है।
राजेश ने जानकारी देते हुए बताया की संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने 42/112 संकल्प को पारित कर हर साल 26 जून को अन्तरराष्ट्रीय नशा मुक्ति निवारण दिवस मनाने का फैसला किया इस दिवस का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ाते हुए उन प्रयासों को मजबूत बनाना है जिससे अंतरराष्ट्रीय समाज पूरी तरह से नशा मुक्त हो सके.
विश्व की गम्भीर समस्याओं में प्रमुख है नशीले पदार्थों का उत्पादन, तस्करी और सेवन की निरंतर हो रही वृद्धि। नई पीढ़ी इस जाल में बुरी तरह कैद हो चुकी है। आज हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी नशे का आदी हो चुका है। नशीले पदार्थों के छोटे-छोटे पाउच से लेकर तेज मादक पदार्थों, औषधियों तक की सहज उपलब्धता इस आदत को बढ़ाने का प्रमुख कारण है। इस दीवानगी को ओढऩे के लिए प्रचार माध्यमों ने भी भटकाया है।
आगे उन्होंने कहा की नशा करने वाला व्यक्ति अपना कितना धन व सम्मान नशे में खो देता है, उसे स्वयं ही मालूम नहीं होता। नशे की लत छूटने उपरांत उसे इसके दुष्परिणामों का एहसास होता है तथा पश्चाताप करता है कि उसने यह नशे की लत पहले ही क्यों नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा कि व्यक्ति शौक के तौर पर नशीली वस्तुओं का सेवन करने लग जाता है तथा उसको स्वयं नही पता चलता कि उसका यह शौक कब आदत में तबदील हो गया।
भावी पीढ़ी को नशा मुक्त समाज प्रदान करना है,हमें  भी एकजुट हो कर इसको समाप्त करना होगा। नशे के परिवार के सभी सदस्यों को परेशानी होती है दूसरी तरफ यह दुर्घटना का कारण भी बनता है आज आए दिन जो सड़क दुर्घटनाएं होती है उसका मुख्य कारण नशा है। नशा भले ही शान और लत के लिए किया जाता हो, पर यह जिंदगी की बेवक्त आने वाली शाम का भी मुख्य कारण है, जो कब जीवन में अंधेरा कर जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। आप इसका मजा भले ही दिनभर के कुछ सेकंड के लिए लेते हैं, लेकिन यह मजा, कब आपके लिए जिंदगी भर की सजा बन जाए, आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते।
पिछले कुछ सालों में भारत के साथ ही पूरे विश्व भर में नशा करने और उससे पीडि़त लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है जो बेहद चिंता का विषय है । इस गंभीर लत ने कई लोगों को मौत का ग्रास तक बना दिया। इनके गंभीर परिणामों को देखते हुए नशे के नुकसान के प्रति जागरुक करने के लिए कई संस्थाएं भी आगे आई हैं हम सब को भी नशा के नुकसान के बारे में लोगों को जागरूक करना चाहिए ।
फोटो कैप्शन: राजेश कुमार





लारी की जगह का अवैध कब्जा छुड़वाने के लिए दी सीएम विंडो पर शिकायत
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कनीना की आवाज। कनीना उपमंडल के गांव भडफ़ के बस स्टैंड की एक कनाल जगह जो लारियों अर्थात बसों के ठहराव के लिए छोड़ी हुई है जिस पर अवैध कब्जे कर डाले हैं। भडफ़ के ओमप्रकाश ने सीएम विंडो पर शिकायत दर्ज करवाई है। उन्होंने बताया कि उनकी यह पहली बार नहीं अपितु पहले भी सीएम विंडो पर शिकायत दर्ज करवा चुके हैं। हाल ही में उन्होंने जिला उपायुक्त सहित उच्च अधिकारियों को पत्र लिखा है जिसमें कहा है खसरा नंबर 146 जो लारियों की जगह है, पर अतिक्रमण हो गया है जिसके चलते आवागमन और वाहनों के ठहराव को समस्या बन गई है। दुर्घटनाएं बढ़ गई हैं। उन्होंने अविलंब इस जगह को खाली करवाने की मांग की है ताकि लारी वहां से आ जा सके, खड़ी हो सके।



धारावाहिक-08
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एक दर्शनीय स्थल के रूप में उभर रहा है बाबा मोलडऩाथ आश्रम
-कनीना के प्रमुख संत हुये हैं मोलडऩाथ            
 डा होशियार सिंह यादव/कनीना की आवाज
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  संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ को बालक नाथ, ओघड़ बाबा नाम से जाना जाता है वही कनीनावासी खेड़ा वाला नाम से भी जानते हैं। कनीना का कुल गुरु बाबा मोलडऩाथ है। बस स्टैंड के पास भरने वाले मेले की तैयारियां पूर्ण हो चुकी है। रंग रोगन किया जा चुका है। इस मेले में पूरे ही कस्बा के लोग शक्कर का प्रसाद अर्पित करते हैं ऊंट और घोडिय़ों की दौड़ पूरे प्रदेश में विख्यात है। विक्रमी संवत 2006 में संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ ने सिरसवाला जोहड़ में समाधि लगाई थी और वे स्वस्थ होकर  समाधिस्थ तो गए थे। उनकी याद में हर वर्ष यहां भारी भीड़ जुटती है और मेला लगता है। अब तो कनीना का बाबा मोलडऩाथ आश्रम श्रद्धा एवं भक्ति का आश्रम बन गया है। इसके आसपास कम से कम एक दर्जन अन्य मंदिर स्थापित हो गए हैं जिसके चलते यह दर्शनीय स्थल भी बन गया है। इसी स्थान पर छह मार्च को शक्कर मेला लगने जा रहा है। कबड्डी तथा ऊंट घोड़ों की दौड़ के अलावा यहां दंगल भी आयोजित होते हैं। यह मेला कनीना के पूर्वजों ने चलाया था जो आज भी चला आ रहा है।
बाबा मोलडऩाथ बाल साधु एंव तपस्वी थे।  बाबा को अपनी आंखों से देखने वाले अनेकों व्यक्ति जीवित हैं। प्रत्यक्षदर्शियों अनुसार जहां आज मन्दिर है वहां कभी विशालकाय जाल का वृक्ष था और पास में विशाल जंगल था। तपस्वी ने विशाल जाल के नीचे ही अपना निवास एवं तप स्थल बनाया। जब से उन्होंने यहां पदार्पण किया तभी से किसी प्रकार के रोग तथा आपदायें नहीं आई।
 बताया जाता है कि हैजे के रोग तथा ओलावृष्टि को भगाने की शक्ति थी। यही कारण है कि आज की भी ये रोग फैलने की आशंका होती है तो उन्हीं का नाम श्रद्धा से लिया जाता है। बाबा उस वक्त विचरने वाले गीदड़ों तथा मोरों को चुग्गा देतेे थे। विक्रमी सवंत 2006 में बाबा ने ठण्डे पानी की समाधि लगायी। कई घण्टे पानी में रहने के कारण उन्हें ठंड लग गई और वे अस्वस्थ रहने लगे। फाल्गुन एकादशी को उन्होंने चोला त्याग दिया। चोला त्यागने से पूर्व उन्होंने इच्छा जाहिर की थी कि जिस भी अवस्था में प्राण त्यागे जाये उसी अवस्था में दफनाना। पूरे कस्बा में बाबा की झांकियां निकाली और मन्दिर स्थल पर दफनाया गया। तभी से उन्हीं की याद में प्रत्येक वर्ष फाल्गुन एकादशी को विशाल मेला लगाता है। बाबा मोलडऩाथ जिन्हें बालकनाथ नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने मांदी, कांवी भोजावास, रोड़वाल, मानसरोवर, नीमराणा आदि स्थानों पर भी तप किया किंतु उनका प्रमुख स्थल कनीना में ही है।
तीन दिनों तक चलता मेला चलता है जिसमें मेले की पूर्व संख्या पर जागरण, अगले दिन मेला तत्पश्चात संतों को भोजन करवाकर तीसरे दिन भेजा जाता है।
होशियार सिंह का योगदान-
यूं तो बााबा मोलडऩाथ की संपूर्ण जीवनी कनीना के लेखक होशियार सिंह का नाम प्रसिद्ध है वहीं उन्होंने कनीना के भीम सिंह को प्रेरित कर बाबा की प्रतिमा लगवाई। होशियार सिंह ने बाबा मोलडऩाथ पर छह पुस्तकें जिनमें से एक आइएसबीएन नंबर की निकाली वहीं बाबा चालीसा, बाबा कैलेंडर, बाबा करी आरती आदि भी निकाली हैं तथा बाबा के लिए आज भी समर्पित हैं। पहली बाबा की पुस्तक 2005 में आई थी।
बाबा मोलडऩाथ बाल साधु एवं तपस्वी थे।  बाबा को अपनी आंखों से देखने वाले अनेकों व्यक्ति जीवित हैं। प्रत्यक्षदर्शियों अनुसार जहां आज मन्दिर है वहां कभी विशालकाय जाल का वृक्ष था और पास में विशाल जंगल था। तपस्वी ने विशाल जाल के नीचे ही अपना निवास एवं तप स्थल बनाया। जब से उन्होंने यहां पदार्पण किया तभी से किसी प्रकार के रोग तथा आपदायें नहीं आई।
 बताया जाता है कि हैजे के रोग तथा ओलावृष्टि को भगाने की शक्ति थी। यही कारण है कि आज की भी ये रोग फैलने की आशंका होती है तो उन्हीं का नाम श्रद्धा से लिया जाता है। बाबा उस वक्त विचरने वाले गीदड़ों तथा मोरों को चुग्गा देतेे थे। फाल्गुन एकादशी को उन्होंने चोला त्याग दिया। चोला त्यागने से पूर्व उन्होंने इच्छा जाहिर की थी कि जिस भी अवस्था में प्राण त्यागे जाये उसी अवस्था में समाधि दी जाए। पूरे कस्बा में बाबा की झांकियां निकाली और मन्दिर स्थल पर समाधि दी जाये। तभी से उन्हीं की याद में प्रत्येक वर्ष फाल्गुन एकादशी को विशाल मेला लगाता है। बाबा मोलडऩाथ जिन्हें बालकनाथ नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने मांदी, कांवी भोजावास, रोड़वाल, मानसरोवर, नीमराणा आदि स्थानों पर भी तप
  विक्रमी संवत 2006 फाल्गुन शुक्ल एकादशी को उन्होंने चोला त्याग दिया। जिस स्थान पर उन्होंने चोला त्यागा उसी स्थान पर बाबा को समाधि दी गई। आज बाबा की समाधि पर कनीना के समाजसेवी भीम सिंह द्वारा निर्मित करवाई हुई उनकी प्रतिमा शोभा बढ़ा रही है। बाबा की मूर्ति का निर्माण भीम सिंह ने 2007 में करवाया।
    उधर बाबा के मेले के दिन ही सुबह सवेरे सिहोर मार्ग  पर भीड़ जुटने लग जाती है। दूसरे राज्यों से आने वाले घोड़ी दौड़ व ऊंट दौड़ के प्रतिभागी अपना जौहर दिखाते हैं। शक्कर को बांटने के लिए आने वाले श्रद्धालु बाबा के नाम पर पास से ही मिट्टïी छांटते हैं और जय बाबा की पुकारते हैं।
  हरियाणा, राजस्थान एवं वर्तमान उत्तराखंड में कई स्थानों पर तप करने वाले बाल ब्रह्मचारी एवं बाल तपस्वी संत थे जिनकी वाणी से निकला हुआ एक-एक शब्द अमृतमय एवं शत् प्रतिशत सत्य साबित हुआ। ऐसे महान संत पर सबसे पहले कनीना के लेखक होशियार सिंह यादव ने वर्ष 2005 में  संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथÓ नाम से पहली पुस्तक प्रकाशित करवाई जिसमें उन्होंने बाबा के उदात गुणों एवं चरित्र का विस्तार से वर्णन करते हुए बाबा की विस्मृतियों को स्मरण पटल पर लाकर सराहनीय कार्य किया। तत्पश्चात उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हुई।  दर्शनीय स्थल के रूप में उभरा -
कनीना का बाबा मोलडऩाथ आश्रम एक दर्शनीय स्थल के रूप में उभर रहा है। एक दर्जन मंदिर बाबा आश्रम के पास में निर्मित हो चुके हैं। बाबा मोलडऩाथ आश्रम पर फरवरी-मार्च में फाल्गुन एकादशी को विशाल मेला लगता है।
 बाबा स्थल को चार चांद लगाने के लिए बाबा के स्थल के पास ही अनेकों धार्मिक स्थलों का निर्माण होता जा रहा है। बाबा के आश्रम के पास ही 21 फुट ऊंची शिव प्रतिमा वाला शिवालय स्थित है। इस शिवालय का निर्माण शिवभक्त भरपूर सिंह ने निर्मित करवाया है  पास में सीताराम मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। सीताराम मंदिर के पास ही राधाकृष्ण का मंदिर बना हुआ है। बाबा आश्रम के पीछे सती समाधि भी बनी हुई है। पास में पानी से भरा जोहड़ है जहां कभी बाबा जल समाधि लेते थे।  
   बाबा आश्रम के नीचे वर्तमान में प्रकटीनाथ का आश्रम बना हुआ है जो बाबा के एक कमरे के निर्माण के वक्त प्रकट हुए थे।  बाबा के पास ही बाबा डूंगरमल की समाधि, खागड़ आश्रम, मंगलदेव की कुटिया, शहीद सुजान सिंह पार्क, बाबा हनुमान की 11 फुट ऊंची प्रतिमा वाला मंदिर, बाबा हनुमान का पुराना मंदिर, बाबा भैया स्थल, शनिदेव मंदिर, मां मंदिर, माता स्थल , माता स्थल, शिरड़ी मंदिर, खाटू श्याम मंदिर, राधाकृष्ण, सीताराम मंदिर बने हुए हैं जहां समय-समय पर लोगों का तांता लगा रहता है। बाबा आश्रम के पास ही बस स्टैंड का होना भी अहं भूमिका निभा रहा है। शहीद सुजान सिंह ने 1994 में जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों का सफाया करते हुए शहादत दी थी जिन्हें मरणोपरान्त अशोक चक्रÓ से सम्मानित किया गया है। पार्क विभिन्न प्रकार के ंफूलों तथा घास के मैदान से सुशोभित है जो दर्शकों को आकर्षित कर लेते हैं। इसी पार्क में पुराना हनुमान मन्दिर स्थित है जहां मंगलवार को श्रद्धालुओं का तांता लगता है और प्रसाद चढ़ाया जाता है।
 संत आश्रम परिसर में 20 फरवरी 2010 को शनिदेव मंदिर बनकर तैयार हुआ वहीं सात मई 2002 को हनुमान मंदिर स्थापित हुआ। करीब 20 लाख रुपये की लागत से शिरड़ी मंदिर स्थापित किया गया जिसका निर्माण आलोक गोयल, सन्नी गेरा, विजेंद्र गर्ग, अंशुल गुप्ता, हेमंत मित्तल, रोहताश सिंगला आदि ने करवाया जो आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। संजीत कनीना एवं साथियों ने 2012 में मां शेरावाली का भव्य मंदिर निर्मित करवा।  उधर खटू श्याम मंदिर की 2015 में नींव रखी तथा 27 अप्रैल 2018 को स्थापित हो गया। अभी भी कितने ही छोटे छोटे मंदिर बनाये जा रहे हैं। बाबा मोलडऩाथ आश्रम के अंदर एक छोटा शिवालय भी बनाया गया है।
बाबा के  जोहड़ के पास मंगलदेव कुटिया बनी हुई है। मंगलदेव तपस्वी साधुजन हुए हैं जिन्होंने कुअंा खुदवा कर पेय जल का प्रबंध करवाया था। मोलडऩाथ स्थल के पास बनवाया गया खागड़ आश्रम भी मनमोहक है। बाब डूगंरदास की समाधि भी बनी हुई है।  पास में विशाल खाटू श्याम मंदिर एवं साई मंदिर बरबस लोगों का मन मोह रहा है। यहां भी बाबा मोलडऩाथ मेले के साथ साथ मेला लगता है। पास में साईं बाबा का मंदिर सुशोभित है जो आम जन के लिए खुला हुआ है। अनेकों अन्य धार्मिक स्थल भी यहां पर निर्मित किये जा चुके हैं। इस प्रकार कई धार्मिक स्थानों से परिपूर्ण बाबा मोलडऩाथ आश्रम दर्शनीय स्थल के रूप में उभर रहा है। मोलडऩाथ की प्रतिमा भीम सिंह कनीना ने निर्मित करवाई थी किंतु बाबा पर छह पुस्तकें कनीना के लेखक एचएस यादव की आ चुकी हैं। वर्तमान में बाबा मोलडऩाथ का प्राचीन जोहड़ फिर से खोदाई कर साफ पानी से भरा जा रहा है जिसका काम 32 लाख रुपये की लागत से करीब पूर्ण होने को है।
32 लाख रुपये की लागत से बनकर तैयार है संत मोलडऩाथ नामक जोहड़, मेले को लेकर जगमगाने लगा है
-बाबा मोलडऩाथ यहां करते थे तप
  कस्बा कनीना ऐतिहासिक जोहड़ का अब पुनरुद्धार लगभग हो चुका है। सैकड़ों वर्षों से वर्षा जल को सहेजा था, बाद में मलिन पानी भर दिया किंतु अब इसे वर्षा जल के अलावा साफ पानी से भरा जाएगा और संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ आश्रम नाम से जाना जाएगा। तत्पश्चात सैलानियों को भी आश्रम एवं जोहड़ आकर्षित करेगा। कभी यहां छोटी बणी होती थी जिसकी एक दर्जन जाल आज भी पौराणिकता को इंगित करती हैं।
जोहड़ का सौंदर्यीकरण का काम लगभग पूर्ण हो चुका है। 32 लाख लागत आई है। मोलडऩाथ आश्रम के पास के करीब एक दर्जन धार्मिक स्थलों को सीधे जोहड़ से जोड़ा गया है। जिस प्राकृतिक जोहड़ के पास बैठकर तप करते थे उसको एक बार फिर से पानी से भरा जा रहा है। इस बार पक्की चारदीवारी भी बनाई जा चुकी है। इस जोहड़ की ऐतिहासिकता को देखते हुए साफ पानी से भरने के लिए दो साल पूर्व एक मुहिम शुरू की थी जिसके तहत पालिका प्रधान ने जोहड़ का पुनरुद्धार शुरू करवाया था। छह माह से अधिक समय से इस जोहड़ पर काम चलता रहा । अब इसकी चारदीवारी बनाकर साफ पानी से भरने का निर्णय लिया है।
मोलडऩाथ का तप स्थल है जोहड़-
 जाल के पेड़ों से आच्छादित यह जंगल में जोहड़ होता था। लेखक डा एचएस यादव की पुस्तक संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ के अनुसार संत मोलडऩाथ इस जोहड़ के किनारे बैठकर तप करते थे। यह जोहड़ साफ पानी से भरा होता था। जीव जंतु यहां विचरित करते थे। 72 साल पहले यहां मोर और गीदड़, कबूतर, चिडिय़ा और नाना प्रकार के जीव जंतु बाबा के आसपास घूमते रहते थे। संत इसी जोहड़ का पानी पीता था। इसी पानी से स्नान करता था। जब जल समाधि लेनी होती तो समाधि भी लेते थे। कालांतर में बणी समाप्त कर दी।
परंतु कनीना बस स्टैंड स्थापना के बाद इस जोहड़ को मलिन कर दिया था और अब इसका पुनरुद्धार किया गया है। जोहड़ और बाबा की आस्था को ध्यान में रखते हुए इसका पुनरुद्धार किया गया है ताकि आने वाले समय में लोग जोहड़ के दर्शन कर सके और बाबा की यादों में खो जाए। वर्तमान में इस जोहड़ की खुदाई करके चारदीवारी बनाई जा चुकी है। यहां पास में ही खाटू श्याम मंदिर 2019 में निर्मित हुआ था जिसके लिए खाटू तालाब की आवश्यकता होती है। ऐसे में यह जोहड़ खाटू श्याम मंदिर के तालाब का काम भी करेगा।
सांस रोकने की क्षमता थी बाबा में-
बाबा मोलडऩाथ विक्रमी संवत 2006 में ब्रह्मलीन हो गये थे किंतु संत  को पानी में समाधि लगाने की क्षमता थी। समाधि लगाकर लंबे समय ठहरने की होड़ सिरसवाला जोहड़ में लगी थी। जहां बाबा रामेश्वरदास जोहड़ से जल्दी बाहर आ गये थे और बाबा मोलडऩाथ अधिक देर रहे थे जिसके चलते उन्हें निमोनिया हो गया था। बाद में वे ब्रह्मलीन हुये।
क्या क्या हैं योजनाएं-
यह जोहड़ साफ पानी से भरने की योजना है जो पानी को सहेजेगा। इसके पेंदे में एक बोर करवाया गया है  ताकि जल का रिचार्ज होता रहे। करीब 28 लाख की लागत से नगरपालिका इस जोहड़ को एक तरफ से खाटू श्याम तो दूसरी ओर से शिवालय,सीताराम मंदिर, हनुमान मंदिर, शिर्डी के मंदिर, शनिदेव मंदिर, माता मंदिर, मोलडऩाथ आश्रम, राधाकृष्ण मंदिरों को जोहड़ के किनारे उतरने का प्रबंध किया जाएगा। आपस में एक पुल से जोड़ा गया है ताकि कोई भी श्रद्धालु आये वो तालाब के दर्शन कर सके। नहर से जोहड़ को जोडऩे के प्रयास किये जाएंगे। यह पानी को सहेजेगा, रिचार्ज भी करेगा तथा पानी को विभिन्न कामों में लिया जाएगा। लाखों लीटर पानी स्टोर होगा।
क्या कहते हैं पालिका प्रधान-
पालिका प्रधान सतीश जेेलदार ने बताया कि यह पौराणिक जोहड़ विभिन्न धार्मिक स्थानों की सुंदरता बढ़ाएगा, शुद्ध जल को सहेजेगा तथा रिचार्ज भी करेगा। खाटू मंदिर के तालाब की भूमिका भी निभाएगा तथा मोलडऩाथ का पुराने जोहड़ के रूप में भी जाना जाएगा। करीब 32 लाख रुपये के करीब खर्चा आया है। इसमें बारिश का साफ पानी भी भरा होगा वहीं नहर के पानी से जोडऩे का प्रयास भी किया जाएगा। नहर करीब दो किमी दूर कनीना मंडी से गुजरती है। उन्होंने बताया कि मेले के दृष्टिगत इसे बोर के पानी से भरा जा रहा है। चारों ओर लाइट लगा दी गई हैं ताकि मेले पर जोहड़ जगमग करता नजर आये।
कैसे त्यागे थे संत ने प्राण--
विक्रमी संवत 2006 में संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ ने सिरसवाला जोहड़ में समाधि लगाई थी और वे स्वस्थ होकर  समाधिस्थ तो गए थे। उनकी याद में हर वर्ष यहां भारी भीड़ जुटती है और मेला लगता है। अब तो कनीना का बाबा मोलडऩाथ आश्रम श्रद्धा एवं भक्ति का आश्रम बन गया है। इसके आसपास कम से कम एक दर्जन अन्य मंदिर स्थापित हो गए हैं जिसके चलते यह दर्शनीय स्थल भी बन गया है।
बाबा मोलडऩाथ बाल साधु एंव तपस्वी थे।  बाबा को अपनी आंखों से देखने वाले अनेकों व्यक्ति जीवित हैं। प्रत्यक्षदर्शियों अनुसार जहां आज मन्दिर है वहां कभी विशालकाय जाल का वृक्ष था और पास में विशाल जंगल था। तपस्वी ने विशाल जाल के नीचे ही अपना निवास एवं तप स्थल बनाया। जब से उन्होंने यहां पदार्पण किया तभी से किसी प्रकार के रोग तथा आपदायें नहीं आई।
 बताया जाता है कि हैजे के रोग तथा ओलावृष्टि को भगाने की शक्ति थी। यही कारण है कि आज की भी ये रोग फैलने की आशंका होती है तो उन्हीं का नाम श्रद्धा से लिया जाता है। बाबा उस वक्त विचरने वाले गीदड़ों तथा मोरों को चुग्गा देतेे थे। विक्रमी सवंत 2006 में बाबा ने ठण्डे पानी की समाधि लगायी। कई घण्टे पानी में रहने के कारण उन्हें ठंड लग गई और वे अस्वस्थ रहने लगे। फाल्गुन एकादशी को उन्होंने चोला त्याग दिया। चोला त्यागने से पूर्व उन्होंने इच्छा जाहिर की थी कि जिस भी अवस्था में प्राण त्यागे जाये उसी अवस्था में दफनाना। पूरे कस्बा में बाबा की झांकियां निकाली और मन्दिर स्थल पर दफनाया गया। तभी से उन्हीं की याद में प्रत्येक वर्ष फाल्गुन एकादशी को विशाल मेला लगाता है। बाबा मोलडऩाथ जिन्हें बालकनाथ नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने मांदी, कांवी भोजावास, रोड़वाल, मानसरोवर, नीमराणा आदि स्थानों पर भी तप किया किंतु उनका प्रमुख स्थल कनीना में ही है। बाबा पर कनीना के डा. होशियार सिंह यादव ने तीन पुस्तकें प्रकाशित कर बाबा की जीवनी आम जन तक पहुंचाई वहीं भीम सिंह कनीना मंडी ने बाबा की प्रतिमा स्थापित करवाई। लियाकत अलि ने बाबा पर आरतियां एवं भजन बनाकर दूर दराज तक नाम किया। मंदिर को सजाकर तैयार कर दिया है।
50 वर्षों से जन सेवा में रत है-सत्संग मंडल
 हरियाणा प्रांत के दक्षिण में राजस्थान सीमा से सटे महेन्द्रगढ़ जिला के सुदूर पूर्व में एक छोर पर 'नाभा रियासत का कस्बा कनीना है जहां विगत 50 वर्षो से निस्वार्थ भाव से मोलडऩाथ सत्संग मंडल कार्यरत है जो प्राचीन भारतीय संस्कृति को जीवित रखने व उसका प्रचार प्रसार करता आ रहा है।
    बाबा मोलडऩाथ यहां महान तपस्वी हुए हैं जिनकी याद में होली के त्योहार पर विशाल मेला लगता है। वर्ष 1963 में राव मेहरचन्द ने बाबा की स्मृति में मोलडऩाथ सत्संग मंडल की स्थापना की जो भजन, शब्द, कीर्तन द्वारा जीव कल्याण मुक्ति मार्ग, गहन सत्य, आत्मज्ञान, शांति एवं सद्भाव का प्रचार कर रहा है।
    करीब एक दर्जन व्यक्तियों का समूह  सामान सहित कुआं पूजन, छठी की रात, भजन तथा अन्य उत्सवों पर सरल व मधुर भाषा, मुक्तकंठ अमृतमय वचनों की बौछार करता है वचनों से विभोर होकर जो दानी सज्जन श्रद्धा से बाबा के नाम पर दान दक्षिणा देते हैं उसे इकट्ठा कर 'जन सेवा में खर्च किया जाता है। अब तक सत्संग मंडल ने दो नि:शुल्क आंखों के कैम्प, बाबा आश्रम निर्माण, राजकीय स्कूल में एक कमरा व बरामदा बनवा चुका है। स्कूल में ही 50 गुणा 40 फुट का हाल व बरामदा बनवाया है।
    वर्तमान में सत्संग मंडल डा0 मेहर चन्द की अध्यक्षता में महत्वपूर्ण कार्य किये है। बाबा आश्रम में गुफा निर्माण, प्रकटनाथ स्थल निर्माण, बाबा मोलडऩाथ आश्रम जीर्णोद्धार बाबा डूंगरदास स्थल निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्य एवं विकास कर बाबा स्थल की छटा को चार चांद लगा दर्शनीय स्थल के रूप में उभारा है।
    बाबा मोलडऩाथ सत्संग मंडल अकेले कस्बा कनीना में ही नहीं अपितु समीपी ग्रामों में सत्संग का आगाज करता रहा है। मंडल मेले के वक्त एकता सौहार्द बनाने तथा प्रबंध करने का कार्य करता है, मेले में विभिन्न स्पर्धाओं में ईनाम के वक्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है तथा बाबा स्थल पर साधुओं के खान पान का प्रबंध भी करता है।
    वर्तमान में बाबा आश्रम के प्रति लोगों में अगाध आस्था पनपी है। सभी महत्वपूर्ण कार्यों के प्रारम्भ में बाबा स्थल पर धोक लगा प्रसाद चढ़ाया जाता है।
    सत्संग मंडल के डा मेहरचन्द ने एक भेंटवार्ता में बताया कि राजकीय वशिष्ठ माडल स्कूल में बनाये गये हाल की लिपाई-पुताई का कार्य पूर्ण करवा लिया गया है 30 हजार रुपये की लागत आई है। विद्यार्थियों, प्राचार्य व कस्बावासियों की बेहद मांग पर यह निर्माण कार्य पूरा करवाया गया है। हाल में खेल का अभ्यास जैसे बाक्सिंग व कुश्ती कराई जा सकती है। उन्होंने बताया कि बाबा मोलडऩाथ आश्रम पर हाल ही में निर्माण कार्य पूर्ण करवाया है।
श्रद्धालु एवं बाबा सत्संग मंडल के सदस्य ओमप्रकाश यादव का कहना है कि कस्बा कनीना का यह मंडल रजत वर्ष पार करते हुये अपार लोकप्रिय हो गया है जिसकी मांग समीप गांवों में भी होने लगी है। प्रत्येक माह मेें दो या तीन दिन कस्बा से बाहर सत्संग करने जाना पड़ता है। कुछ सज्जन तो प्रत्येक सत्संग में भाग लेते हैं।
 विगत 50 वर्षों से संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ सत्संग मंडल जन सेवा करती आ रही है। रात को विभिन्न अवसरों पर जाकर प्राप्त धन को जन सेवा में खर्च करने के अलावा संत आश्रम को चार चांद लगाने में व्यस्त है।
   प्राप्त विवरण के अनुसार कनीना के निवासी मेहरचंद नामक जो डाक्टर नाम से जाने जाते हैं ने वर्ष 1963 में कनीना के प्रसिद्ध संत मोलडऩाथ के नाम पर एक सामाजिक संस्था की स्थापना की थी जो आज भी जनसेवा में जुटी हुई है। यह मंडल प्रारंभ से ही अपने कुछ सदस्यों की सहायता से विभिन्न सामाजिक अवसरों पर विशेष कर छटी की रात को सत्संग करके प्राप्त राशि को संत आश्रम के विकास ही नहीं अपितु विभिन्न स्थानों पर जनसेवा कर रही है।
   इस संस्था ने न केवल मुफ्त आंखों के कैंप लगवाए अपितु स्कूल में कमरे एवं बड़ा हाल बनवाकर जन सेवा की। इस मंडल में जहां एक व्यक्ति हारमोनियम का वादन करता है वहीं बोतल एवं घड़ों को वाद्य यंत्र बनाकर प्रयोग किया जा रहा है। ये लोग रात भर विभिन्न प्रकार के भजनों विशेषकर खंडन मंडन पर प्रहार करते हैं और समाजसेवा करते हैं। यह मंडल आम जनता को नई दिशा दिखाता आ रहा है। इस मंडल के जन नि:स्वार्थ भाव से जन सेवा करते हैं।
 डा मेहरचंद-
सत्संग मंडल के संस्थापक मेहरचंद जी का कहना है कि वर्ष 1963 में जन सेवा एवं समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करने के उद्देश्य से सत्संग मंडल बनाया था। जब प्रारंभ में कुछ राशि प्राप्त हुई तो उन्होंने पांच सदस्यीय एक कमेटी बनाई जिसका उद्देश्य बाबा मोलडऩाथ आश्रम का उद्धार करना था।  बाद में इसमें मुखराम शर्मा, प्रहलाद शर्मा, गोसाई जी, मां. कंवर सिंह, प्रो. हंसराज, महेंद्र सिंह, रामस्वरूप साहब, होशियार सिंह, राजेंद्र प्रसाद, प्रताप सिंह, प्रभातगिरि, ख्यालीराम चेलावास, ठेकेदार मातादीन, मदन मणियार, रणजीत सिंह ठेकेदार, मुंशीराम, ओमप्रकाश यादव आदि जुड़ते चले गए।
उस वक्त इकतारा, घड़वा, खुरताल, चिमटा, मंजीरा और बाद में हारमोनियम शामिल किया गया जो साज बाज में सहायक थे। जब सत्संग मंडल बना तब इकतारा डा मेहरचंद, मुंशीराम घड़वा व सिंहराम परांत बजाते थे। अब तो सत्संग मंडल किसी पर्व पर किंतु पहले किसी भी वक्त किसी के बलाए जाने पर उनके घर जाकर साकार एवं निराकार भगवान् की वाणी या शब्द सुनाते थे जो छह घंटों तक कार्यक्रम चलता था। कबीरदास, नित्यानन्द, रैदास, मीराबाई या किसी अन्य संत के शब्द सुनाए जाते थे। उद्देश्य केवल बुराई छुड़वाना था किंतु अब वो बात देखने को नहीं मिल रही है। उस जमाने में डा मेहरचंद ने कनीना के लगभग हर घर में जाकर शब्दवाणी की थी।
कनीना का मां मंदिर
मंदिर की नींव 2009 में रखी थी तथा 2012 में बनकर तैयार हो गया। इसका निर्माण कार्य संजीत यादव कनीना के निवासी की देखरेख में संपन्न हुआ है। इस मंदिर के चारों ओर द्वार एवं विशाल सीढिय़ां हैं। दूर से ही आकर्षित करता हुआ माता मंदिर वर्तमान में विख्यात है। आधुनिक वास्तुकला का प्रदर्शन किया गया है। नवरात्रों में भीड़ रहती है।
   मंदिर की भव्य मूर्ति 51 हजार रुपये में जयपुर के प्रसिद्ध कारीगरों द्वारा निर्मित करवाकर विधि विधान से इस मंदिर में स्थापित करवाई गई थी। प्रत्येक नवरात्रों के समय मां के मंदिर को सजाया जाता है। भारी संख्या में भक्तजन यहां आते हैं। इस मंदिर की भव्यता ही इसका आकर्षण है। नवरात्रों पर समीपी गांवों के भक्तजन आते हैं और अपने साथ नारियल, मां की चुनरी, प्रसाद, मां की ध्वजा लेकर आते हैं और विधि विधान से पूजा करके ध्वजा को अर्पित कर देते हैं। करीब 61 फुट ऊंचे इस मंदिर में आकर पूजा अर्चना करते हैं। शहर का यह एकमात्र मां शेरावालीं का मंदिर है। संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ आश्रम परिसर में बने इस मंदिर में भक्तजन अधिक आने के पीछे मंदिरों  का एक समूह विकसित होना है। पास में विभिन्न देवी देवताओं के एक दर्जन मंदिर बने हैं। आकर्षण का कारण शहीद प्रतिमाओं के पास होना भी है। पार्कों से सुसज्जित दस मंदिर को दूर दराज से भी देखा जा सकता है।
भक्तों का तांता-
नवरात्रों के दिनों में यहां सेकड़ों भक्तजन आते हैं और मां के दर्शन करते हैं। इस मंदिर की देखरेख का काम भी कनीना के संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ आश्रम पर रहने वाले संत ही करते हैं। प्राचीन बाबा मोलडऩाथ आश्रम जोहड़ के किनारे पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचना आसान है क्योंकि पास में सामान्य बस स्टैंड स्थित है। वर्ष में दो बार आने वाले नवरात्रों पर भीड़ एक मेले का रूप ले लेती है।
कई नामों से जाना जाता है बाबा-
कनीना के महान संत बाबा मोलडऩाथ कई नामों से जाने जाते हैं। उन्हें बालकनाथ, मोलडऩाथ, खेड़ावाला बाबा के नामों से भी जाना जाता है। उन्होंने रोड़वाल, मानसरोवर, मांदी, कांवी भोजावास, ढाणी बाठोठा सहित एक दर्जन गांवों में रहते हुए तप किया था।  बालपन से ब्रह्मचारी एवं तपस्वी थे। बाबा गणेशनाथ उनके गुरू थे। कनीना में विक्रमी संवत 2006 में ब्रह्मलीन हुए थे। कनीना एवं आस पास के लोग जब भी कोई नया काम करते हैं तो बाबा का नाम लेते हैं।
बस स्टैंड के पास संत मोलडऩाथ आश्रम में संत की प्रतिमा देखने से ही लगती है। यह प्रतिमा कनीना मंडी के निवासी भीम सिंह एवं उनके परिजनों ने फरवरी 2007 में स्थापित करवाई थी। इससे पूर्व तो बाबा की कोई प्रतिमा भी नहीं थी। बाबा के जीवन एवं चमत्कारों पर एचएस यादव की पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है तथा प्रतिवर्ष बाबा के कलेंडर प्रकाशित किए जाते हैं।  
    बाबा स्थल को चार चांद लगाने के लिए बाबा के स्थल के पास ही अनेकों धार्मिक स्थलों का निर्माण होता जा रहा है। बाबा के आश्रम के पास ही 21 फुट ऊंची शिव प्रतिमा वाला शिवालय स्थित है। इस शिवालय का निर्माण शिवभक्त भरपूर सिंह ने निर्मित करवाया है जो हरिद्वार से कई कावड़ लाकर शिवालय बाघोत में चढ़ा चुके हैं।  शिवरात्रि के दिन यहां तांता लगता है। शिव मंदिर के पास ही पेयजल टंकी बनी हुई है। पास में सीताराम मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। सीताराम मंदिर के पास ही राधाकृष्ण का मंदिर बना हुआ है। बाबा आश्रम के पीछे सती समाधि भी बनी हुई है। पास में पानी से भरा जोहड़ होता है जहां कभी बाबा जल समाधि लेते थे।  इस जोहड़ को अटवाकर यहां विशाल खाटू मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। यह मंदिर जल्द ही बन जाने की उम्मीद है।
   बाबा आश्रम के नीचे वर्तमान में प्रकटीनाथ का आश्रम बना हुआ है जो बाबा के एक कमरे के निर्माण के वक्त प्रकट हुए थे। एक सुंदर गुफा का भी निर्माण करवाया हुआ है। बाबा के पास ही बाबा डूंगरमल की समाधि, खागड़ आश्रम, मंगलदेव की कुटिया, शहीद सुजान सिंह पार्क, बाबा हनुमान की 11 फुट ऊंची प्रतिमा वाला मंदिर, बाबा हनुमान का पुराना मंदिर, बाबा भैया स्थल, शनिदेव मंदिर, मां मंदिर, माता स्थल , राधाकृष्ण मंदिर बने हुए हैं जहां समय-समय पर लोगों का तांता लगा रहता है। बाबा आश्रम के पास ही बस स्टैंड का होना भी अहं भूमिका निभा रहा है।
बाबा आश्रम के सामने शहीद सुजान सिंह पार्क है। शहीद सुजान सिंह ने 1994 में जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों का सफाया करते हुए शहादत दी थी जिन्हें मरणोपरान्त 'अशोक चक्रÓ से सम्मानित किया गया है। पार्क विभिन्न प्रकार के फूलों तथा घास के मैदान से सुशोभित है जो दर्शकों को आकर्षित कर लेते हैं। कड़ाके की धूप में यहां बैठकर राहत मिलती है। इसी पार्क में पुराना हनुमान मन्दिर स्थित है जहां मंगलवार को श्रद्धालुओं का तांता लगता है और प्रसाद चढ़ाया जाता है।
    ्रत्येक एकादशी को जब ''बाबा पर प्रसाद चढ़ाया जाता है तो हनुमान मन्दिर में भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह भी बाबा की रौनक बढ़ा रहा है। बाबा स्थल के बिल्कुल पीछे सती समाधि है जहां श्रद्धालु मेले के दिन मिट्टी छांटते हैं। बासौड़ा के दिन महिलायें सती स्थल पर पूजा अर्चना करती हैं। समाधि के पास पास मंगलदेव कुटिया बनी हुई है। मंगलदेव तपस्वी साधु जन हुए हैं जिन्होंने कुअंा खुदवा कर पेय जल का प्रबंध करवाया था।
मोलडऩाथ स्थल के पास बनवाया गया खागड़ आश्रम भी मनमोहक है। खागड़ की सीमेन्ट व लोहे की बनी प्रतिमा उधर से गुजरने वालों का मन बरबस आकर्षित कर लेती है। मुंह बोलती प्रतिमा कभी कभी यथार्थ का आभास कराती हैं। बच्चे तो जीवित खागड़ की भूल कर बैठते हैं। खागड़ के पास ही पशुओं की प्यास बूझाने के लिए 'खेल बनी हुई है। खागड़ प्रतिमा के बिल्कुल सामने बाबा डूंगरदास निवास है। बाब डूगंरदास जो दिन रात मिट्टी से खेलते नजर आते थे। बाबा डूंगर बोलते कम थे, मेहनत ज्यादा करते थे। देर रात तक वे मिट्टी की समाधि अपने निवास समक्ष बनाते थे तथा उसे फिर ढहा देते थे। किसी को यह मालूम नहीं था कि ये किस चीज का निर्माण करते थे और उन्हें स्वयं ही नष्ट क्यों कर देते थे? अपने समीप किसी गन्दगी को देखना उनकी आदत नहीं थी और वे निठल्ले व्यक्तियों के लिए शिक्षा देते नजर आते थे। 27 मई 2000 को उन्होंने चोला त्यागा था। उनको जोहड़ के किनारे ही दफनाया गया है।   यहां पर शनिदेव मंदिर एवं माता का विशाल मंदिर भी दशनीय हैं। श्रद्धालु बस द्वारा आकर बाबा स्थल के दर्शन कर सकते हैं। जिला महेन्द्रगढ़ के दर्शनीय स्थलों में से एक बाबा मोलडऩाथ बनता जा रहा है।
शिव के  प्रति अगाध आस्था ने बनवाया शिवालय
-शिवरात्रि पर किया जाता जल अर्पित
 कभी-कभी आस्था भी इंसान को बड़े से बड़ा काम करने के लिए प्रेरित कर देती है। ऐसा ही उदाहरण जिला महेंद्रगढ़ के कनीना के शिवभक्त भरपूर सिंह निर्बाण ने कर दिखलाया है। शिव के प्रति आस्था जागृत हुई फिर कावड़ लाने का सिलसिला शुरू किया तत्पश्चात उन्होंने कनीना में ही विशाल शिवालय का निर्माण करवाया।
  कनीना के मोदीका मोहल्ले का रहने वाला भरपूर सिंह पेशे से एक छोटा सा दुकानदार है किंतु उनकी आस्था विशाल है। अच्छी आमदनी न होते हुए भी उन्होंने शिव के प्रति विश्वास नहीं छोड़ी। अपने एक साथी तथा कनीना में सर्वाधिक कावड़ लाने का रिकार्ड कायम करने वाले सुमेर सिंह चेयरमैन से वे इतने प्रभावित हुए कि नीलकंठ एवं हरिद्वार से कावड़ लाने का सिलसिला शुरू कर दिया। वे लगातार 13 वर्षों तक कावड़ लाते रहे। अपनी दुकान का काम छोड़कर भी वे कावड़ लाते और कावड़ लाकर कनीना के गांव बाघोत स्थित बाघेश्वरी धाम पर चढ़ा देते। वे शिव के प्रति इतने आशक्त हो गए कि उन्होंने अपने खून पसीने की पूंजी से कनीना में विशालकाय शिवालय बनवाने का निर्णय लिया।
 कनीना के बाबा मोलडऩाथ मंदिर के पास ही भरपूर सिंह ने 21 फुट ऊंची प्रतिमा वाले शिवालय का निर्माण शुरू करवा दिया। पूरे एक वर्ष तक काम चलने और लाखों रुपये खर्च करके उनका शिवालय पूर्ण हो गया। आखिरकार शिवरात्रि के दिन वर्ष 2001 में यह शिवालय आमजन के लिए खोल दिया गया।  यहां उल्लेखनीय है कि भरपूर सिंह के इस शिवालय पर जो भी खर्चा आता है वह स्वयं वहन करता है। चढ़ावे के रूप में जो अन्न आता है उसे वह बोरों में भरकर या तो गौशाला को दान कर देता है या फिर गायों को चरा देता है।
  इस शिवालय पर प्रतिदिन सुबह सवेरे सबसे पहले भरपूर सिंह की पत्नी शकुंतला देवी, उनका पुत्र रोहित कुमार अक्सर शिवालय पर आकर पूजा करते हैं। भरपूर सिंह भी सबसे पहले अपनी दुकान पर जाने की बजाय शिवालय पर आकर पूजा करता है।
  जब-जब शिवरात्रि आती है तो यहां छोटा मेला लगता है। कनीना क्षेत्र में पहले इतना विशाल मंदिर नहीं था ऐसे में शिवरात्रि तथा सोमवार को पूजा अर्चना करने वाले भक्तजन इसी शिवालय में आते हैं। शिव के प्रति आस्था बढऩे का सिलसिला जारी है।
शुद्ध पानी को सहेजेगा ऐतिहासिक जोहड़
-संत मोलडऩाथ करते थे जोहड़ पर तप

 कस्बा कनीना ऐतिहासिक जोहड़ का अब पुनरुद्धार हो रहा है। सैकड़ों वर्षों से वर्षा जल को सहेजते आ रहा है। अब इसे वर्षा जल के अलावा साफ पानी से भरा जाएगा और संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ आश्रम नाम से जाना जाएगा। तत्पश्चात सैलानियों को भी आश्रम एवं जोहड़ आकर्षित करेगा। कभी यहां छोटी बणी होती थी जिसकी एक दर्जन जाल आज भी पौराणिकता को इंगित करती हैं।
जोहड़ का सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। 32 लाख लागत आएगी। मोलडऩाथ आश्रम के पास के करीब एक दर्जन धार्मिक स्थलों को सीधे जोहड़ से जोड़ा जाएगा। जिस प्राकृतिक जोहड़ के पास बैठकर तप करते थे उसको एक बार फिर से पानी से भरा जाएगा। इस बार पक्की चारदीवारी भी बनाई जा चुकी है। इस जोहड़ की ऐतिहासिकता को देखते हुए साफ पानी से भरने के लिए  दो साल पूर्व एक मुहिम शुरू की थी जिस पर पालिका प्रधान तक यह बात पहुंचाई गई थी और आखिरकार पालिका प्रधान ने जोहड़ का पुनरुद्धार शुरू करवा दिया है। छह माह से अधिक समय से इस जोहड़ पर काम चल रहा है। अब इसकी चारदीवारी बनाकर साफ पानी से भरने का निर्णय लिया है।
मोलडऩाथ का तप स्थल है जोहड़-
 जाल के पेड़ों से आच्छादित यह जंगल में जोहड़ होता था। संत मोलडऩाथ इस जोहड़ के किनारे बैठकर तप करते थे। यह जोहड़ साफ पानी से भरा होता था। जीव जंतु यहां विचरित करते थे। 72 साल पहले यहां मोर और गीदड़, कबूतर, चिडिय़ा और नाना प्रकार के जीव जंतु बाबा के आसपास घूमते रहते थे। संत इसी जोहड़ का पानी पीता था। इसी पानी से स्नान करता था। जब जल समाधि लेनी होती तो समाधि भी लेते थे। कालांतर में बणी समाप्त कर दी।
परंतु कनीना बस स्टैंड स्थापना के बाद इस जोहड़ को मलिन कर दिया था और अब इसका पुनरुद्धार किया जा रहा है। जोहड़ और बाबा की आस्था को ध्यान में रखते हुए इसका पुनरुद्धार किया जा रहा है ताकि आने वाले समय में लोग जोहड़ के दर्शन कर सके और बाबा की यादों में खो जाए। वर्तमान में इस जोहड़ की खुदाई करके चारदीवारी बनाई जा चुकी है। यहां पास में ही खाटू श्याम मंदिर 2019 में निर्मित हुआ था जिसके लिए खाटू तालाब की आवश्यकता होती है। ऐसे में यह जोहड़ खाटू श्याम मंदिर के तालाब का काम भी करेगा।
सांस रोकने की क्षमता थी बाबा में-
बाबा मोलडऩाथ विक्रमी संवत 2006 में ब्रह्मलीन हो गये थे किंतु संत  को पानी में समाधि लगाने की क्षमता थी। समाधि लगाकर लंबे समय ठहरने की होड़ सिरसवाला जोहड़ में लगी थी। जहां बाबा रामेश्वरदास जोहड़ से जल्दी बाहर आ गये थे और बाबा मोलडऩाथ अधिक देर रहे थे जिसके चलते उन्हें निमोनिया हो गया था। बाद में वे ब्रह्मलीन हुये।
क्या क्या हैं योजनाएं-
यह जोहड़ साफ पानी से भरने की योजना है जो पानी को सहेजेगा। इसके पेंदे में एक बोर करवाया जाएगा ताकि जल का रिचार्ज होता रहे। करीब 28 लागत से नगरपालिका इस जोहड़ को एक तरफ से खाटू श्याम तो दूसरी ओर से शिवालय,सीताराम मंदिर, हनुमान मंदिर, शिर्डी के मंदिर, शनिदेव मंदिर, माता मंदिर, मोलडऩाथ आश्रम, राधाकृष्ण मंदिरों को जोहड़ के किनारे उतरने का प्रबंध किया जाएगा। आपस में एक पुल से जोड़ा जा रहा है ताकि कोई भी श्रद्धालु आये वो तालाब के दर्शन कर सके। नहर से जोहड़ को जोडऩे के प्रयास किये जाएंगे। यह पानी को सहेजेगा, रिचार्ज भी करेगा तथा पानी को विभिन्न कामों में लिया जाएगा। लाखों लीटर पानी स्टोर होगा।
क्या कहते हैं पालिका प्रधान-
पालिका प्रधान सतीश जेेलदार ने बताया कि यह पौराणिक जोहड़ विभिन्न धार्मिक स्थानों की सुंदरता बढ़ाएगा, शुद्ध जल को सहेजेगा तथा रिचार्ज भी करेगा। खाटू मंदिर के तालाब की भूमिका भी निभाएगा तथा मोलडऩाथ का पुराने जोहड़ के रूप में भी जाना जाएगा। करीब 32 लाख रुपये के करीब खर्चा आएगा। इसमें बारिश का साफ पानी भी भरा होगा वहीं नहर के पानी से जोडऩे का प्रयास ाी किया जाएगा। नहर करीब दो किमी दूर कनीना मंडी से गुजरती है।
 दो संतों की याद दिलाता है शिरीषवाला जोहड़
-लंबे समय से सहेजे हुए है पानी
 कनीना का शिरीषवाला जोहड़ दो परम संतों की याद दिलाता है। करीब 800 सालों से यह जोहड़ सिरसवाला नाम से प्रसिद्ध है। बड़ी बणी नामक स्थान पर स्थित है जो रेलवे स्टेशन के करीब है। यहां वर्तमान में विभिन्न शिक्षण संस्थान भी बने हुए हैं किंतु प्राचीन समय में यहां केवल सिरस का पेड़ होता था जिसके कारण यह जोहड़ सिरस वाला नाम से जाना जाता रहा है।
बड़ी बणी में कनीना नगर पालिका की सबसे अधिक जगह होती थी जहां दूर-दराज तक जाल के पेड़ होते थे। धीरे-धीरे बड़ी बणी का विनाश हो गया किंतु यहां के जोहड़ का बाद में कायाकल्प कर दिया गया। कनीना बसासत के समय का यह जोहड़ चला आ रहा है। कनीन गोत्र के कान्ह   सिंह जब यहां आए थे तभी से यह  जोहड़ स्थित था। कालांतर में इस में बारिश का पानी भरा जाता था और विभिन्न जीव जंतु, जंगली जीव जल पीकर  प्रसन्न हो जाते थे। लंबे समय से यह जोहड़ यही स्थित है कालांतर में यहां रामेश्वर दास नामक संत का आगमन हुआ और उन्होंने तप स्थल यही बनाया। उधर कनीना की छोटी-बणी में संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ जोहड़ पर तप करते थे किंतु एक दूसरे के पास उनका आवागमन होता रहता था। दोनों संत समय समय पर सिरस वाला जोहड़ पर बैठते थे तो कभी रामेश्वर दास भी मोलडऩाथ आश्रम पर जाकर ज्ञान की चर्चा करते थे। सिरस वाला जोहड़ दोनों संतों की याद दिलाता है जहां का भी दोनों संतों ने इसी जोहड़ के पानी में समाधि लगाई थी और होड़ लगी थी। बुुजर्ग बताते हैं कि रामेश्वर दास जोहड़ से जल्दी बाहर आ गए थे किंतु संत शिरोमणि मोलडऩाथ लंबे समय तक इसी जोहड़ में समाधि लिए बैठे रहे। सर्दी के दिन होने से उनको निमोनिया हो गया था और  उन्होंने समाधि ले ली।
सिरसवाला जोहड़ बहुत लंबे समय से जन्माष्टमी के मेले के लिए प्रसिद्ध है। गोगा और जन्माष्टमी पर्व पर जहां जल में जाटी और गोगा नामक पौधे बहाने की परंपरा चली आ रही है। समय बदला इसी जोहड़ पर जहां रामेश्वर दास के शिष्य राधे दास ने भी तप किया और उन्होंने भी समाधि ले ली। इस जोहड़ का लंबा इतिहास चला आ रहा है। जहां समय-समय पर मेलेे भी लगते हैं तथा भंडारे भी चलते हैं। जोहड़ का पानी कभी साफ होता था किंतु बाद में इसे मलिन कर दिया गया। यह कच्चा जोहड़ पूर्व एसडीएम संदीप सिंह ने पक्का बनवा दिया गया। किंतु नहर इसके पास से गुजरने वाली नहर से जोड़ देने के कारण सदा पानी भरा रहता है ऐसे में यह जोहड़ कनीना के इतिहास की याद दिलाता है वही संतों की रमणीक स्थली की भी याद दिलाता है। यह जोड़ लंबे समय से पानी को सहेजे हुए हैं।
क्या है शिरीष-
 सिरस/शिरीष/सिरसा का बड़ा पेड़ होता है जिसके फूल बहुत कोमल होने से उन्हें सुकुमार कहा जाता है। यह अति औषधीय पौधा होता है। इस जोहड़ के तट पर भी कभी यह पेड़ मिलता था। इसी के कारण जोहड़ का नाम पड़ा है।

























































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धारावाहिक -09
धारावाहिक -09 में पढ़ेंगे कनीना का खाटू श्याम मंदिर का इतिहास