*कावड़ पर विशेष पठनीय आलेख--
99 प्रतिशत भक्त नहीं निभा रहे कावड़ के नियम
-अब तो किराए के व्यक्ति भी लाने लगे हैं कावड़
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कनीना की आवाज। कनीना के डा. होशियार सिंह यादव पत्रकार एवं लेखक 2010 से लगातार हरिद्वार से पदयात्रा करते हुए बाघेश्वर धाम पर कावड़ अर्पित करते आए हैं। कावड़ के बहुत से नियम होते हैं, हो सकता है कुछ नियम नहीं भी सुने गए हो। बुजुर्गों ने कावड़ के नियम बड़ी सोच समझ के बाद ही बनाए थे। लेकिन जिन नियमों को निर्धारित किया गया उनका पालन अधिकांश भक्त नहीं कर रहे हैं। बड़ा दुख होता है कि या तो कावड़ लानी नहीं चाहिए और अगर लाए तो पूरे लग्न, जोश और नियमों में बंधकर लानी चाहिए।
जहां वर्ष 2026 में कावड़ लाने वालों की संख्या कुछ अधिक देखने को मिली किंतु जिन नियमों का पालन करना चाहिए उनका पालन नहीं करते देखे गए। सबसे बड़ी दुख भरी बात है कि कम से कम 60 प्रतिशत भक्त बीड़ी, सिगरेट, हुक्का ,चिलम आदि प्रयोग करते देखे गए। नशे का प्रयोग करते हुए बस एक ही बात कह रहे हैं कि शिवभोले भी नशा करते थे। बड़ा अफसोस होता है कि त्रिनेत्रधारी ने कभी नशा नहीं करते थे। लेकिन जिस प्रकार के गीत और भजन सुनने को मिले उन में बस एक ही बात अधिकांश सुनने को मिली शिव भोले ने पी ली एक बाल्टी भांग, भांग पिला दे, भांग घोट दे, ठेके पर भांग ला दे। न जाने क्या-क्या उल्टे सीधे गाने बनाए गए हैं जिनसे लगता है कि सच्चे भक्तों की धार्मिक आस्था पर ठेस लगती है। शिव भोले ने जब तप किया कई कई कल्प चला। उन्होंने कभी किसी प्रकार का नशा नहीं किया। अपने ही देव पर लांछन लगाना बहुत बुरी बात है। कावडिय़े जमकर बीड़ी, सिगरेट पीते देखे गए। बहुत से कावडिय़े तो शराब पीते देखे गए क्योंकि शराब के ठेके पर थोड़ा प्रतिबंध होने से बोतल तक थैले में साथ लेकर गए और होटल में खोलने नजर आए। कावडिय़े तो ऐसा भी काम करते देखे गए कि पुरानी कावड़, अपने तन के कपड़े, गंदगी सब गंगा में बहा रहे थे। वैसे तो गंगा बहुत मालिन होती जा रही है क्योंकि मलमूत्र भी वही त्याग रहे जो गंगाजल में मिल रहा है। बड़ा अफसोस होता है कि जिस गंगा को पवित्र माना जाता है, भागीरथ के प्रयासों से गंगा धरती पर आई आज वह गंगा कितनी दूषित कर दी है। गंदे नाले मिल रहे हैं, लोग न जाने क्या-क्या गंदगी गंगा में डाल रहे हैं। जब कावडिय़े चलते हैं तो रास्ते में एक नया ही नजारा देखने को मिला। जंगली भांग के पौधों से हाथ रगड़कर और उसका मैल उतार कर सिगरेट ,बीड़ी भरकर खूब केस लेते देखे गए। दुख दर्द उन भक्तों को हुआ जो बीड़ी, सिगरेट नहीं पीते। उनका जीना ही हराम हो गया। बारिश का मौसम हो तो सिगरेट की धुआं और इसकी बदबू कोसों दूर तक जाती है। शिविरों में भी जमकर भक्त बीड़ी, सिगरेट पीते देखे गए। जहां बैठना भी कठिन हो जाता है। कैसे-कैसे कावडिय़े देखे गए। कुछ कावडिय़े तो मलमूत्र त्याग कर हाथ भी नहीं धोते, उठाकर कावड़ चल देते हैं। अधिकांश कावड़ तो इधर-उधर गंदगी से छूती देखी गई परंतु भक्त अपनी कावड़ को फिर भी संभाले चले जा रहे थे। बहुत से ऐसे कावड़ यह देखें जो खाना खाने के बाद,सोने के बाद भी बिना स्नान किए कावड़ उठाकर चल रहे थे क्योंकि मौसम ठंडा था, पानी ठंडा था। इसलिए हाथ पैर भी ढंग से नहीं धो रहे थे। जहां शिविरों में इस कदर भीड़ थी कि पैर रखने की भी जगह नहीं मिली। कावड़ को लेकर कुछ भक्त भागते देखे गए। कावड़ कंधे पर किधर घुमानी चाहिए यह भीभक्तों को मालूम नहीं था। कुछ कावडिय़े ऐसे भी नजर आए जो कावड़ सहित पानी पीते, जूस पीते देखे गए। कुछ भक्तों ने तो मौसमी के जूस में काला नमक मिलाकर जमकर पिया। नियमानुसार सेंधा नमक के अलावा कोई अन्य नमक प्रयोग करता है तो कपड़े धोकर या नए कपड़े नहाकर पहनने चाहिए किंतु कुछ को यही मालूम नहीं है कि काला नमक सेंधा होता है या नहीं। काला नमक लाहौरी नमक कहलाता है जो प्राकृतिक नहीं है। केवल सेंधा नमक जो पहाड़ों के रूप में प्राप्त होता है, को सेंधा नमक कहते हैं जो अक्सर व्रतों में प्रयोग होता है। कावड़ को जिस शुद्धता से लाना चाहिए उनका बहुत कम भक्त ही पालन करते देखे गए। सबसे बड़ी आफत टोकना कावड़ और डाक कावड़ बन गई है। वो तो समझते हैं कि उनके लिए पूरा रास्ता खाली हो, कोई सड़क मार्ग पर न चले। उनके लिए तो प्रधानमंत्री से भी बढ़कर सुरक्षा हो। एक लिटर से 2 लीटर गंगाजल लेकर 50-50 भक्त दौड़ रहे हैं, क्या यह कावड़ का रूप है? कितने ही तेज रफ्तार से बिना साइलैंसर के वाहन चला रहे, शोर मचा रहे थे। डीजे तो ऐसे ऐसे लगे हुए थे जिनकी आवाज से आदमी क्या दीवार भी ढहने के कगार पर पहुंच जाती थी। जो भक्त शांत मन से भोले को याद करना चाहे तो संभव ही नहीं था। न किसी नियम का पालन होता और न प्रशासन के आदेशों का पालन होता। सबसे बड़ी समस्या टोकना कावड़ बन गई। इस बार दनकी संख्या बढ़ गई। जब ये चलते हैं तो दोनों तरफ कोई व्यक्ति नहीं होना चाहिए वरना इनसे चला नहीं जाएगा और सबसे बड़ी बात है कि ये सड़क के बीच में ही कावड़ को रख देते हैं। कोई भी कांवडिय़ा या भक्त इधर-उधर ध्यान हो तो सड़क पर रखी कावड़ से जरूर टकराएगा। बहुत से ऐसे कावडिय़े भी देखे जो कावड़ कंधे पर ले रहे हैं और जमकर गालियां, एक दूसरे को गंदी बातें सुनते और सुनाते नजर आए। कुछ भक्तों ने तो कावड़ के थैले में ही सिगरेट, बीड़ी तथा नशीले पदार्थ रख रखे थे। अफसोस होता है की जिस शिव भोले के प्रति जितनी आस्था होनी चाहिए उसको भक्त खुद ही कम करते जा रहे हैं। सच्चे इंसान तो जब इन घटनाओं को देखते हैं तो उन्हें सचमुच दर्द होता है और वो कहते नजर आए कि इससे बेहतर तो कावड़ नहीं लाई जाए।
कुछ लोगों ने तो नाम कमाने के लिए बिहार एवं यूपी के लोगों को किराए पर ला रखा था जो शिविरों में फलों पर ऐसे धावा बोलते देखे गए जैसे चील एवं गिद्ध हो। कावड़ लाने के पीछे अपने शरीर को कष्ट देना होता है न कि किराए के लोगों को। इसका तो फल भी किराए के कावडिय़ों को मिलेगा।
मंदिर निर्माण में भगत सिंह ने दिए 51 हजार रुपए
-कमेटी ने स्मृति चिह्न से किया सम्मानित
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कनीना की आवाज। समाजसेवी भगत सिंह पूर्व प्रधान गौशाला कनीना ने बाबा मोलडऩाथ मंदिर निर्माण कार्य में किया। उन्होंने 51 हजार रुपए की राशि मंदिर निर्माण कार्य के लिए दी।
मंदिर कमेटी प्रधान दिनेश यादव ने जानकारी देते हुए बताया कि भगत सिंह समाज सेवा में हमेशा तैयार रहते हैं, चाहे वह स्कूल में बोरवेल का काम हो बाबा मोलडऩाथ मंदिर हो। उन्होंने पहले मीठे पानी के एक बोर भी करवाई थी और आज सहयोग राशि देकर सहयोग किया। उसके लिए पूरी कमेटी ने भगत सिंह का स्वागत व सम्मान किया।
भगत सिंह ने भी कमेटी की तारीफ करते हुए कहा कि मंदिर का कार्य सराहनीय किया जा रहा है। बहुत ही सुंदर और भव्य मंदिर निर्माण कार्य का कमेटी द्वारा किया जा रहा है। इसमें मैं अपना यह छोटा सा योगदान देकर पुण्य का भागीदार बनना चाहता हूं। उन्होंने कमेटी के सभी सदस्यों से विशेष तौर पर आग्रह किया किया बाबा का मंदिर बहुत ही आस्था का केंद्र है। आने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी तरह से परेशानी नहीं होगी क्योंकि मंदिर निर्माण बहुत आधुनिक और हवादार बनाया जा रहा है। इसमें गांव के सभी लोगों ने अपना योगदान दिया है। प्रधान दिनेश कुमार यादव ने पूरे कनीनावासियों का दिल से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे ही दानदाताओं की बदौलत यह निर्माण कार्य संपूर्ण होगा।
इस मौके पर उनके साथ गौशाला समिति के पूर्व कार्यकर्ता रामपाल यादव, मास्टर रामप्रताप, होशियार सिंह सत्संगी, बाबी यादव, दीनदयाल साहब, दुलीचंद साहब, दिलावर साहब,महेंद्र साहब आदि का का मंदिर कमेटी में स्वागत किया। जिनमें मंदिर कमेटी प्रधान दिनेश यादव, रमेश, शिवचरण, सुरेंद्र सिंह, संजय यादव, सतबीर यादव मास्टर अनिल यादव, बलवीर साहब, प्रकाश साहब, जानी यादव, हेडमास्टर अश्विनी, महेंद्र यादव, अरविंद यादव, शिवकुमार एवं अनेक गणमान्य लोगों उपस्थित रहे।
फोटो कैप्शन 10: भगत सिंह को स्मृति चिह्न भेंट करते हुए
कावड़ लाने वालों के हौसले बुलंद
-आंधी एवं वर्षा में भी नहीं डगमगाए कदम
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कनीना की आवाज। कंधे पर कावड़ लाने वालों के हौसले बुलंद होने के कारण सड़कों पर दिनरात अब तो बम-बम भोले की गूंज सुनाई पड़ती है और युवा से लेकर वृद्ध तक 350 किमी से भी अधिक दूरी तय करने के बाद भी उसी रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं जिस रफ्तार से चलना शुरू करते हैं। दिल में अपार श्रद्धा एवं भक्ति या फिर दिलों में किसी मनोकामना को लेकर सावन माह में शिवभक्त कांवड़ ला रहे हैं। वर्षा एवं आंधी उनके कदमों को नहीं रोक पाई। चाहे छाले पड़ गए किंतु वे आगे बढ़ते जा रहे हैं।
कुछ भक्तजन तो कई-कई वर्षों से ही कावड़ ला रहे हैं और उनके हौसले बुलंद हैं। वे कहते हैं कि जब तक शिवभोले की उन पर कृपा रहेगी वे कांवड़ यूं ही लाते रहेंगे। चंद कावडिय़ों से कांवड़ लाने एवं बाघेश्वर धाम पर चढ़ाने के पीछे वजह के बारे में चर्चा हुई। सभी का लगभग एक ही जवाब था कि वे महज शिवभक्ति के चलते कांवड़ ला रहे हैं।
इस संबंध में 72 वर्षीय प्रसिद्ध शिवभक्त सुमेर सिंह ने बताया कि यह उनकी 45वीं कावड़ है। बचपन से ही शिवभक्त होने के कारण वे कांवड़ लाकर शिवालय पर चढ़ा रहे हैं और जब तक उनके कदमों में दम है तब तक वे कावड़ यूं ही चढ़ाते रहेंगे। वे दिल में किसी प्रकार की शिवभोले से मनोकामना नहीं रखते हैं। उनका कहना है कि शिव कृपा से उनके कदम अभी तक नहीं रुके हैं। आगे भी कांवड़ लाते रहने का प्रण है।
भक्त वेद बोस की उम्र 43 वर्ष है और वे 6वीं कांवड़ लेकर आए हैं। उनके मन में शिवभोले के प्रति अपार श्रद्धा है और वे किसी प्रकार की मनोकामना को लेकर कांवड़ नहीं ला रहे हैं। उनका कहना है कि वे लगातार यूं ही कांवड़ लाना चाहते हैं। उनके दिल में जरा भी थकान नजर नहीं आई। वे शिवभोले के पक्के भक्त बताते हैं।
वेद प्रकाश की उम्र 51 वर्ष है किंतु वे 26वीं कांवड़ लेकर आए हैं। उनके दिल में भी किसी प्रकार की शिवभोले से प्राप्त करने की तमन्ना या मनोकामना नहीं है। उनका कहना है कि वे निरंतर कांवड़ लाते रहेंगे और भविष्य में एक रिकार्ड बनाएंगे। उनमें भी किसी प्रकार की थकान या परेशानी नहीं झलकती है। वे कांवड़ लाकर खुश हैं।
दलीप सिंह 20वीं कांवड़ ला रहे हैं संदीप 5वीं कांवड़ ला रहे हैं। सभी के हौसले बुलंद है और सभी भविष्य में भी इसी प्रकार का और लाना चाह रहे हैं । सभी का कहना है कि शिव भोले के नाम लेकर थकान बल में ही मिट जाती है।
भरत सिंह कनीना ने बताया कि वर्षों से कावड़ लाकर बाघेश्वर धाम पर बिना किसी मनोकामना के ला रहे हैं। बस दिल में भक्ति भावना है। देशराज ने बताया कि वे 3 कावड़ ला चुके हैं और आगे भी कावड़ लाते रहेंगे।
उधर संदीप, योगेश, संजय, अरुण कुमार, संजय भारद्वाज आदि ने बताया कि वे नीलकंठ पर जाकर कावड़ अर्पित करते आए हैं वहीं बाघेश्वर धाम पर भी कावड़ अर्पित करते आए हैं।
फोटो कैप्शन 09:कावड़ लाने वाले भक्त
बाबा के योगदान पर किया ट्रस्ट ने होशियार सिंह को सम्मानित
-मोलडऩाथ पर लिख चुके कई कृतियां
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कनीना की आवाज। कनीना निवासी डा. होशियार सिंह यादव ने साढ़े 5 दिनों में हरिद्वार से कावड़ लाकर बाघेश्वर धाम पर अर्पित कर दी तथा कनीना पहुंचकर संत मोलडऩाथ आश्रम पर बाबा का आशीर्वाद लिया। उन्होंने अपनी श्रद्धा अनुसार दान पुण्य भी किया।
इस मौके पर ट्रस्ट के प्रधान दिनेश कुमार यादव ने बताया कि डा. होशियार सिंह यादव वर्ष 2010 से लगातार कावड़ लाकर बाघेश्वर धाम पर अर्पित करते आ रहे हैं। यही नहीं समय-समय पर विभिन्न धार्मिक स्थानों की पदयात्रा करते आ रहे हैं। 2010 से ही खाटू श्याम एवं जैतपुर आदि धामों की निशान पद यात्रा करते आए हैं तथा साइकिल मैन के नाम से प्रसिद्ध हैं। विश्व रिकार्ड धारक होशियार सिंह ने संत मोलडऩाथ पर अनेक कृतियां प्रकाशित की है। उनका योगदान हमेशा याद रहेगा। उन्होंने जहां संत मोलडऩाथ की आरती, मोलडऩाथ की कृति, मोलडऩाथ चालीसा तथा मोलडऩाथ के जीवनवृंत्त एवं उदात गुणों का वर्णन किया है। उनके आलेखों में मोलडऩाथ समाए हुए हैं। उनके सराहनीय योगदान के चलते उन्हें स्मृति चिह्न देकर ट्रस्ट ने सम्मानित किया।
इस मौके पर मंदिर कमेटी प्रधान दिनेश यादव, पूर्व प्रवक्ता अश्विनी कुमार, सुरेंद्र सिंह भेलिया, शिवकुमार, लाल सिंह, रमेश कुमार, जानी यादव, मास्टर अनिल कुमार, शिवचरण, अरविंद यादव, नरेश कुमार, सुभाष यादव, सोनू यादव, पवन कुमार, अशोक डीपी, सतवीर यादवआदि उपस्थित रहे।
फोटो कैप्शन 08: होशियार सिंह को सम्मानित करती ट्रस्ट
स्कूल प्रांगण में त्रिवेणी लगाकर तिरंगा यात्रा का शुभारंभ किया बीइओ कनीना सुरेश कुमार ने
--पेड़ों के गिनाए गए लाभ
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कनीना की आवाज। राजकीय माध्यमिक विद्यालय कैमला में खंड शिक्षा अधिकारी सुरेश कुमार यादव ने विद्यालय में त्रिवेणी लगाकर हर घर -घर तिरंगा यात्रा का हरी झंडी दिखाकर शुभारंभ किया।
विद्यार्थियों को उन्होंने कहा कि तिरंगा हमारे देश की अस्मिता का प्रतीक है। हम सबको तिरंगे का मान, सम्मान के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। यह हमारा राष्ट्रीय प्रतीक है, इसकी सुरक्षा, रक्षा करना हमारा नैतिक कर्तव्य है।
विद्यालय में बरगद ,पीपल, नीम त्रिवेणी लगाकर एक पेड़ मां के नाम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि हम सबको अपने- अपने घर पर प्रत्येक सुअवसर पर एक पौधा लगाना चाहिए जिससे वातावरण स्वच्छ, हरा- भरा रहेगा और हमें शुद्ध आक्सीजन प्राप्त होगी जो हमें अनेकों रोगों से छुटकारा दिलाने में सहायक होगी।
कार्यालय अधीक्षक ओम प्रकाश शर्मा ने विद्यार्थियों को शिक्षा ,संस्कार और संस्कृति पर आधारित गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर बल देते हुए कहा कि हमें हमेशा अनुशासन में रहकर निरंतर पढ़ाई करनी चाहिए। विद्यालय की ओर से मौलिक मुख्याध्यापक वीरेंद्र सिंह जांगिड़ ने विद्यार्थियों से अपील की की हमें हर पल प्रकृति का संरक्षण, संवर्धन के लिए तैयार रहना चाहिए और उचित सहयोग देना चाहिए। हमें राष्ट्रधर्म को सेवा धर्म मानना चाहिए।
इस अवसर पर मनवीर सिंह, सुनील कुमार, देवेंद्र यादव ,राजेश कुमार,भगत सिंह, गरीमा रानी,सुनील कुमार डीटीएच चौकीदार, सूबे सिंह पूर्व प्रधान, तारामणि देवी, पिंकी देवी, बबली देवी सतपाल साहब, राजकुमार पंच आदि उपस्थित रहें।
फोटो कैप्शन 07: पेड़ लगाकर तिरंगा यात्रा का शुभारंभ करते बीइओ कनीना सुरेश कुमार
आज लगेगा शिवरात्रि पर बाघोत में विशाल मेला
-पौराणिक इतिहास समेटे हैं बाघोत
-सावन के सोमवारों को रहती है भीड़
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कनीना की आवाज। कनीना उपमंडल के गांव बाघोत पर 11 अगस्त को शिवरात्रि मेला लगेगा। यहां अपार भीड़ जुटती है तथा हजारों कावड़ अर्पित की जाती हैं। एक सप्ताह से कावड़ अर्पित करने का सिलसिला भी शिवरात्रि को रुक जाएगा। वर्ष में दो बार यहां मेला लगता है। सावन त्रयोदशी शिवरात्रि पर कावड़ मेला लगेगा। महाशिवरात्रि जो सर्दी के दिनों में आती है, कावड़ कम अर्पित होती हें। बाघोत जिसे बाघेश्वर धाम नाम से पूरे भारत में जाना जाता है, का पौराणिक महत्व एवं अपने में इतिहास समेटे हुए है।
हरयेक वन था पुराना नाम--
बाघोत का नाम बाघ के आधार पर पड़ा है।
बाघोत का पुराना नाम हरयेक वन था। यहां पीपलाद ऋषि का आश्रम भी तो यही था। उनके कुल में राजा दलीप के कोई संतान नहीं थी। वे दु:खी थे और दुखी मन से अपने कुलगुरु वशिष्ठ के पास गए। उन्होंने अपना पूरा दु:ख का वृतांत मुनिवर को सुनाया। वशिष्ठ ने उन्हें पीपलाद ऋषि के आश्रम में नंदिनी नामक गाय एवं कपिला नाम की बछिया निराहार रहकर चराने का आदेश दे दिया। राजा ने गाय व बछिया को निराहार रहकर चराते वक्त एक दिन भगवान् भोलेनाथ ने बाघ का रूप बनाकर राजा की परीक्षा लेने का निर्णय लिया। बाघ ने बछिया पर धावा बोल दिया। गाय को बचाने के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने को राजा तैयार हुए। परंतु जब वे ऐसा करने लगे तो बाघ के स्थान पर शिवभोले खड़े थे। बाघ के कारण ही गांव का नाम बाघोत पड़ा। प्रारंभ में बाघेश्वर शिवालय का निर्माण कणाणा के राजा कल्याण सिंह रैबारी ने करवाया था जिसका समय समय पर उद्धार होता रहा है।
संतान पाने वाले भी आते हैं दूर दराज से-
बाघोत स्थित शिवालय उन भक्तों के लिए भी प्रसिद्ध माना जाता है जिनके कोई संतान नहीं होती है। मेले में आकर दंपति अपने हाथों से एक विशाल वटवृक्ष को कच्चा धागा बांधकर सुंदर संतान होने की कामना करता है। जब संतान हो जाती है तो यहां आकर ही धागा खोलता है। यही कारण है कि शिवलिंग के पास ही खड़ा एक वटवृक्ष कच्चे धागों से लदा मिलता है।
पुस्तकों में भी वर्णित है इतिहास-
हरियाणा सरकार की पुस्तकों में भी बाघोत का छोटा उल्लेख है वहीं लेखक एचएस यादव की कृति में संपूर्ण इतिहास दिया गया है।
अनेक धर्मशालाएं--
बाघोत के शिवालय का शिवलिंग स्वयंभू होने के कारण यहां अपार भीड़ भक्तों की वर्षभर चलती है। छोटा सा गांव है किंतु ठहरने के लिए अनेक धर्मशालाएं हैं। प्राकृतिक शिवलिंग के भक्त दर्शन कर प्रसन्न हो जाते हैं।
स्वयंभू है शिवलिंग-
बाघोत का शिवलिंग स्वयंभू है। यही कारण है कि शिवरात्रि एवं महाशिवरात्रि पर यहां अपार भीड़ जुटती है। हरिद्वार एवं ऋषिकेश से गंगाजल लाकर अर्पित करते हैं।
कई जगह लगेंगे मेले-
महाशिवरात्रि पर जहां कनीना एवं बाघोत के अलावा तथा विभिन्न स्थानों पर मेले लगते हैं। विभिन्न गांवों में शिवालय बने हुए हैं जहां महाशिवरात्रि पर मेले लगते हैं। भंडारे भी लगते हैं।
सजाया गया है शिवालय को-
बाघेश्वर धाम को सजाया गया है। कतारबद्ध भक्तों के खड़े रहने, पेयजल, पुलिस आदि का प्रबंध किया गया है वहीं भंडारे, ठहरने का प्रबंध भी किया गया है।
हरिद्वार से बाघेश्वर धाम तक लगी है भक्तों की कतार-
देवनगरी हरिद्वार से बाघेश्वर धाम तक शिव भक्तों की लंबी कतार लगी हुई है। एक ओर जहां शिवालयों में कावड़ अर्पित करने का सिलसिला विभिन्न गांवों में एक सप्ताह पूर्व से शुरू हो गया है वहीं प्राचीन शिवालयों पर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। विभिन्न शिवालयों में कावड़ अर्पित की जाती है किंतु किलोई, इंछापुरी, किरमारा, बाघोत आदि स्थानों पर भारी संख्या में कावड़ चढ़ाई जाती है।
अर्पित कर रहे हैं विभिन्न कावड़-
भक्तजन खड़ी, बैकुंठी, टोकना झूला, थैला तथा डाक कावड़ लेकर अपने गंतव्य की ओर रवाना हो रहे हैं। जहां उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश में पुलिस का व्यापक प्रबंध है वहीं हरियाणा के विभिन्न शिविरों में भी व्यापक पुलिस प्रबंध किया गया है। जहां भी देखे जयकारे, बम बम की जयघोष सुनाई पड़ रही है। भक्त आगे बढ़ते जा रहे हैं। इस बार जहां भक्तों में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, देश भक्ति कूट-कूट कर भरी देखने को मिली वहीं अपंग व्यक्ति भी कावड़ लाने में पीछे नहीं हट रहे हैं। जहां महिलाएं भी कावड़ लेकर गंतव्य मार्ग की ओर जा रही है वही बच्चे बुड्ढे और जवान भी कांवड़ ला रहे हैं। विभिन्न शिविरों में जहां युवा वर्ग का जोर है वही कावड़ लाने वालों में बुजुर्ग कम तथा अधेड़ आयु के अधिक देखने को मिल रहे हैं।
राजा दलीप की है तप स्थली-
यूं तो किवदंति के अनुसार राजा दलीप ने ही संतान प्राप्ति के लिए यहां तप किया था और व्रत एवं उपवास के बाद ही संतान प्राप्त हुई थी। तत्पश्चात तो माना जाता है कि उन भक्तों का तांता लगा रहता है जिनके कोई संतान नहीं होती है। पुराने पीपल के पेड़ के तने पर कच्चा धागा बांधकर संतान प्राप्ति की मन्नत मांगी जाती हे। माना जाता है कि उनकी मन्नतें यहां पूर्ण होती है।
रात को जगमगाता है शिवालय-
बाघोत का शिवालय रात को जगमगाता नजर आता है। रेलिंग लगाकर उनमें से भक्तों का गुजारा जाता है। शिवालय के सामने बड़ा जोहड़ है तथा भक्तों को धीरे धीरे आगे बढऩे दिया जाता है। स्वयंभू शिवलिंग पर जल अर्पित करके भक्त अपने को धन्य समझते हैं।
कई बार नवीनीकरण किया गया-
बाघोत शिवालय का कई बार नवीनीकरण हुआ है। प्रारंभ में कणाणा के राजा कल्याण सिंह ने इसे बनवाया था जिस पर ऊंटों के पैरों के निशान छपवाए गए थे किंतु बाद में पुनर्निमाण के समय ऊंटों के पैर नहीं छपवाए गए। राजा कल्याण सिंह के सैनिकों ने ही यह स्वयंभू खोजा था जहां ऊंटों पर लदा हुआ सोना चांदी लूट लिए गए थे किंतु एक दृष्टांत के बाद लुटेरों को पकड़ लिया गया था। खुश होकर राजा कल्याण सिंह ने शिवालय निर्माण कर स्वयं गंगा जल से जलाभिषेक किया था। बाद में झज्जर के नवाब ने शिवनिंग को उखड़वाना चाहा किंतु असफल होने पर उन्होंने भी यहां पूजा शुरू की। और उन्होंने भी स्वयं गंगाजल अर्पित किया।
हजारो वर्ष पुराना शिवलिंग-
यह शिवलिंग हजारों वर्ष पुराना है तथा समय समय पर यहां कावड़ अर्पित की जाती है। सोमवारों को अपार भीड़ जुटती है।
फोटो कैप्शन 02: गंगाजल अर्पित करते भक्त
03: रात को जगमगाता शिवालय
04: रेलिंग की व्यवस्था
05: बाघोत का शिवालय
06: स्वयंभू शिवलिंग
तीन लोगों पर मारपीट का केस दर्ज
-बाप-बेटे दो दुकानदारों को पीटा गया
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कनीना की आवाज। कनीना निवासी वार्ड 4 के अशोक कुमार ने थाना कनीना में तीन लोगों के विरुद्ध मारपीट का केस दर्ज करवाया है। उन्होंने पुलिस में दी शिकायत में बताया कि उन्होंने कनीना सदर थाना के पास दो दुकानें कर रखी है जिन पर फल एवं गन्ने के जूस का काम करते हैं। 2 अगस्त को जब वह अपनी दुकान पर था तो शाम को करीब 3 बजे अशोक कुमार का लड़का गौरव अपनी मोटरसाइकिल लेकर दुकान पर आया और चाबी अशोक कुमार को देकर कहने लगा कि अब आप आराम कर लो। दुकानों पर वह काम करेगा। तभी पड़ोसी ममता, उसका लड़का मनीष, एक अन्य लड़का टाइगर डंडे, लोहे की रोड आदि लेकर आए और अशोक कुमार से कहने लगे कि तुमने किराएदार अनीता कोदुकानों के पास स्कूटी क्यों नहीं खड़ी करने दी जिसने मसाज पार्लर की दुकान कर रखी है। इतना कहकर अशोक कुमार एवं गौरव को दुकान से खींचकर मारपीट शुरू कर दी जिसके चलते गौरव और अशोक कुमार घायल हो गए। उन्हें काफी चोटें आई। जब शोर मचाया तो पवन और अतुल नाम के दो व्यक्तियों ने आकर उन्हें छुड़वाया किंतु जाते समय वे जान से मारने की धमकी दे गए। उनकी शिकायत पर तीन लोगों के विरुद्ध विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज कर लिया है।
सुनील कुमार एमपीएचडब्
ल्यू ने भेंट किया एक एसी तथा 10 थ्री सीटर चेयर
---16 साल 10 महीने की सेवा करके सेवानिवृत्त
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कनीना की आवाज। कनीना निवासी एवं मिलनसार सुनील कुमार एमपीएचडब्ल्यू 31 जुलाई 2026 को सेवानिवृत्त हो गए लेकिन उन्होंने अब उप नागरिक अस्पताल के एक्सरे रूम में अपने निजी कोष से एक एसी स्थापित करवाया तथा 10 थ्री सीटर चेयर स्थापित करवाई हैं जिन पर करीब एक लाख रुपए खर्च आया है।
सुनील कुमार ने बताया कि उन्होंने पहले एएमसी बतौर 16 साल 7 महीना सेवा दी है और अगस्त 2003 में सेवानिवृत्त हुए थे। तत्पश्चात 24 सितंबर 2010 को एमपीएचडब्ल्यू कनीना उप नागरिक अस्पताल में सेवा देने शुरू की और 31 जुलाई 2026 को 16 साल 10 महीने की सेवा करके सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
उनकी सेवानिवृत्ति में डा. रेनू वर्मा एसएमओ समस्त स्टाफ उपस्थित रहा जिन्होंने सुनील कुमार के कार्यों की सराहना की और कहा कि इस प्रकार की सेवा देने वाले सुनील कुमार धन्यवाद के पात्र हैं।
फोटो कैप्शन 01: स्थापित एक एसी और दस 3 सीटर चेयर कार्यरत हालत में













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