कुतरूं के कारनामे-24 पढ़े मंगलवार को
-शकी स्वभाव ने गिराई स्टाफ में कद्र
-जैसा किया वैसा फल पाया
तापमान पहुंचा 39 डिग्री, लू का हुआ आभास
--खान पान का रखे ध्यान-डा. मोरवाल
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कनीना की आवाज। अप्रैल माह में ही तापमान 39 डिग्री पार कर गया है। दिन में घर से बाहर निकलना कठिन हो जाता है। ऐसे में डाक्टरी सलाह जरूरी है। गर्मी से बचने के लिए डाक्टर सलाह दे रहे हैं-
डा.जितेंद्र मोरवाल कनीना उप-नागरिक अस्पताल बताते हैं कि गर्मी बढ़ जाने से जहां 10 प्रतिशत तक मरीज बढ़ जाते हैं। जहां लू लगना, उल्टी, बुखार दस्त आदि की शिकायत बढ़ जाती है। धूप से बचना बहुत जरूरी है।
कैसे बचा जाए तपन से-
डा. जितेंद्र मोरवाल बताते हैं की धूप से बचने का सबसे सरल उपाय है घर में छुपकर बैठे रहे। हवादार कमरे में रहे। यदि बाहर जाना पड़े तो पानी की बोतल साथ लेकर जाए तथा पूरे कपड़े शरीर पर पहने, हाथ पैर सर सभी ढके हुए होने चाहिए। पैरों में चप्पल जूते होने चाहिए ताकि गर्मी और तपन से बचा जा सके। इस दौरान तरल पदार्थ जैसे पानी, जूस, लस्सी ,दूध आदि अधिक प्रयोग करना चाहिए। जंक फूड से इस समय बचना चाहिए, ठोस भोजन कम से कम प्रयोग करना चाहिए। हो सके तो कूलर की हवा में बैठना चाहिए। जब सुबह और शाम ताप कम हो जाए उस समय यदि कोई जरूरी काम हो तो बाहर निकलना चाहिए उनका कहना है कि गर्मी और नवतपा से धूप, लू लग जाती है, बुखार आ जाता है और इसमें बचाव में ही बचाव है। उन्होंने बताया घर पर ग्लूकोस वगैराह प्रयोग करें तथा साथ में ओआरएस का बनाकर रखे। ओआरएस घोल बनाना बहुत सरल है। नमक चीनी और थोड़ा सा नींबू का रस भी डाले तो बेहतरीन स्वाद का घोल तैयार हो जाता है। पानी अधिक से अधिक प्रयोग करें, शरीर में पानी की कमी ना आने दे।
उधर श्रीकिशन वैद्य क्षेत्र में लंबा अनुभव रखते हैं। उनका कहना है कि अगर धूप लग जाए, लू लग जाए तो उससे बचने के लिए पुराने समय से बुजुर्ग कच्चे आम को भूनकर उसका रस, नमक ,चीनी आदि मिलाकर पीते आए हैं जो धूप और गर्मी से बचाता है। यह भी ओआरएस की भांति काम करता है।
फोटो कैप्शन: डा. मोरवाल
30.42 लाख रुपए से भरा जाएगा सेहलंग माता खीमज जोहड़
-त्वरित गति से चल रही है कार्रवाई, लोगों में खुशी लहर
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कनीना की आवाज। कनीना उपमंडल के गांव सेहलंग में स्थित माता खिमज मंदिर के पास खिमज जोहड़ का नहर के पानी से भरा जाएगा। एक दो रोज में काम पूर्ण हो जाएगा तथा नौतना माइनर से आने वाले पानी से लबालब भर दिया जाएगा। कनीना उपमंडल में एकमात्र पहाड़ी वाला गांव सेहलंग है जिसकी चोटी पर माता खिमज मंदिर स्थित है। यह पहाड़ी अरावली पहाड़ी शृंखला का एक भाग है।
मिली जानकारी अनुसार आरसीसी पाइपलाइन द्वारा 30.42 लाख की लागत से करीब आधा किलोमीटर दूर से गुजर रही नौतना माइनर से जोहड़ को जोडऩे का कार्य त्वरित गति से जारी है। इस आधा किलोमीटर दूरी में भूमिगत पाइप लगा दिए गए हैं और जल्द ही नहर में पानी आने के बाद जोहड़ भर जाएगा ताकि पशु और पक्षियों को गर्मी से राहत मिलेगी।
उल्लेखनीय के माता खिमज मंदिर सेहलंग का करीब 800 साल से भी पुराना पहाड़ी पर स्थित मंदिर है। 213 सीढिय़ो से चढ़कर इस मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। यहां पर नाना प्रकार के जगली जीव जंतु पाए जाते और अधिक संख्या में पक्षी मिलते हैं जो इस जोहड़ के पानी का उपयोग कर पाएंगे। अभी तक इसमें गंदा पानी भरा हुआ है और नाममात्र पानी है।
इस संबंध में विजयपाल सेलंगिया पूर्व प्राध्यापक एवं खजांची, अशोक कुमार प्रधान, नेतराम, डाक्टर सत्य प्रकाश, गोनू उर्फ दीपक आदि ने बताया कि उनके लंबे समय से मांग चली आ रही थी और इस मांग का पूरा कर दिया गया है। इसके बाद अब खीमज मंदिर वाले जोहड़ को साफ नहरी पानी से भरा जाएगा और पशु ,पक्षी और जंगली जीव जंतु इस पानी से अपनी प्यास बूझा पाएंगे और उन्हें गर्मी से राहत मिलेगी। उन्होंने खुशी जताई की कि सरकार ने उनका यह बेहतरीन कार्य किया है।
फोटो कैप्शन 5: नौताना नहर से पाइपलाइन बिछाते हुए
पील बनी पुराने जमाने के फल
- बुजुर्ग पील को याद कर हो जाते हैं खुश, गरीबों के हैं ये अंगूर
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कनीना की आवाज। कनीना में कभी आधा दर्जन बणिया(जंगल) होती थी। बणी में जाल पेड़ों का साम्राज्य मिलता है, जो हजारों वर्ष पुराने होते हैं। जब गर्मी आती है तब जाल के पेड़ों पर विभिन्न रंगों हरी, सफेद, पीली, लाल, नारंगी तथा विभिन्न रंगों के फलों से लद जाते थे। वास्तव में अंगूर की भांति यह फल होते हैं जिनको आज से 30 साल पहले लोग बड़े चाव से खाते थे। आज बेशक युवा पीढ़ी जंगल में जाने से जंगली जीवों और जानवरों से डरती हो किंतु बुजुर्गों का जीवन जंगलों में बीता था और वहीं जाल के पेड़ों से फल तोड़कर घर पर लाते थे। इन्हें फांका मारकर खाते थे, जिससे एक अलग ही स्वाद आता था। बुजुर्गों के समक्ष जब आज भी चर्चा चलती है तो बस इतना ही कहते हैं कि पील का जमाना लद गया। मौसम परिवर्तन के कारण इन जाल के पेड़ों पर कोई भी फल नहीं लगता। कभी कभार इक्का-दुक्का फल मिल भी जाता है तो उस पर लोगों की नजरें टिक जाती है परंतु एक जमाना था बहुत अधिक मात्रा में फल लगते थे।
कैसे तोड़ कर लाते थे पील-
राजेंद्र सिंह, सूबे सिंह, राम सिंह, कृष्ण कुमार आदि बताते हैं जब स्कूलों में गर्मी की छुट्टियां होती थी तब अपने गले में सिंडोरा(पील इक_ा करने का बर्तन) बांधकर जंगल की ओर चले जाते थे। यह किसी एक घर से नहीं बल्कि लगभग हर घर से पील तोड़कर लाने के लिए चल देते थे। दिनभर आपस में वार्तालाप करते हुए जाल के पेड़ पर चढ़कर पील तोड़ते थे और अपने सिंडोरे में डालते थे। जब सिंडोरा भर जाता था, जाल के पेड़ से नीचे उतरते और घर तक पहुंचते थे। घर के सारे सदस्य बैठकर इन पीलों को फांका मारकर खाते थे। यहां तक कि इन फलों में, बीज वाले अंगूरों की भांति बीज होते थे जिनको खाते समय जीभ से निकाल दिया जाता था।
अंगूर के थे विकल्प -
बुजुर्ग बताते हैं कि अंगूर के विकल्प का विकल्प पील होते थे। अंगूर गरीब आदमियों को नहीं मिल पाते थे अमीरों के लिए अंगूर होते थे और गरीब लोगों के लिए पील खाने को मिलती थी। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में जहां गर्मियों में नीम की निबोरी छोटे आम के रूप में खाई जाती थी जो गरीबों के आम कहलाते हैं जबकि अमीर लोग बड़े-बड़े आम खाते रहे हैं।
क्या क्या कहते हैं पर्यावरणविद-
डा. होशियार सिंह यादव पर्यावरणविद से इस संबंध में चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि मौसम में बदलाव के कारण पील लगनी बंद हो गई है। उन्होंने बताया कि जिस प्रकार कैर पर टींट एवं पीचू खत्म चुका हो गए हैं उसी प्रकार जाटी पेड़ से सांगर और झींझ लुप्त हो गई है। ठीक उसी प्रकार जाल के पेड़ से पील गायब हो गई हैं। उन्होंने बताया कि इस वक्त मौसम इतना दूषित हो चला है, कि गर्मी अधिक बढ़ गई है जिसके कारण पील पैदा नहीं होती। पील एक निश्चित ताप तक ही पैदा होती है तथा इसके लिए साफ-सुथरी जलवायु की आवश्यकता होती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में गर्मियों का विशेष पेय है राबड़ी
-जौ के आटे व छाछ से बनती है राबड़ी
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कनीना की आवाज। सेहत के दृष्टिगत विशेषकर गर्मियों में खानपान का ग्रामीण क्षेत्र के लोग विशेष ध्यान रखते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सुविधाएं कम होती है किंतु सेहत के प्रति उनका रवैया बेहतरीन देखने को मिलता है। गर्मियों के दिनों में जहां ठोस आहार कम काम में लिए लेते हैं वही तरल आहार अधिक से अधिक प्रयोग किया जाता है। गर्मियों के दिनों में रोटी के रूप में मेसी रोटी खाई जाती है। चना,गेहूं या जो आदि की बनी होती है। ऐसी रोटियां ग्रामीण क्षेत्र के लोग कभी से प्रयोग करते हैं अपितु जब चने की पैदावार अधिक होती थी चने की रोटी खाते थे जो सेहत के लिए बहुत जरूरी है। यहां तक कि बासी मेसी रोटियां भी राबड़ी के साथ विशेष खाद्य पदार्थ ग्रामीण क्षेत्रों का है। क्या कहते हैं जानकार-
** राबड़ी जो छाछ, जौ का आटा आदि हांडी में पकाकर बनाया जाता है। यह एक ऐसा पदार्थ है जो छाछ में बनाया जाता है तथा छाछ डालकर ही इसे प्याज और बासी रोटी के साथ खाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्र के लोग इस मामले में कभी से राबड़ी प्रयोग करते आ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र के लोग कभी राबड़ी को नहीं भूलते। चाहे वर्तमान पीढ़ी कोल्ड ड्रिंक पीने लग गई और चाय अधिक सेवन करती है किंतु ग्रामीण बुजुर्ग राबड़ी को अहमियत देते हैं। इस वक्त गर्मियों के दिनों में धाणी एवं भुगड़ा नाम से विशेष खाद्य पदार्थ का खाते हैं।
--सूबे सिंह,कनीना
ग्रामीण लोग जौ को भुनवाकर धाणी तो चने को भुनवाकर भुगड़ा बनाते हैं जिनको गर्मी के दिनों में बड़े चाव से खाया जाता है। यहां तक कि कुछ लोग जौ की धाणी का सत्तू भी बनाकर पीते हैं।
--भीम सिंह,कनीना मंडी
ग्रामीण ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का प्याज का विशेष लगाव रहा है। यहां तक कि हर घर में नींबू रखते हैं जिससे शिकंजी पीते हैं तथा प्याज के साथ बासी रोटी खाते हैं ताकि गर्मी से बचा जा सके। बुजुर्ग पुराने खानपान को आज भी नहीं भूले हैं।
-- --दुलीचंद साहब,कनीना
जब भी कोई मेहमान आता है तो उसको चाय की बजाए राबड़ी या छाछ का गिलास थमाते हैं जो खाने में बेहतरीन होता है। कुछ शहर से आने वाले व्यक्ति भी बड़े चाव से लस्सी को पीते हैं, चाय को दूर भगाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में खाने-पीने की आदतें अच्छी है। घर में प्याज जरूर खरीदी जाती है जिसे वर्ष भर खाते हैं। प्याज का राबड़ी के साथ विशेष संबंध माना गया है।
---सुनील कुमार, समाजसेवी
फोटो कैप्शन: सुनील कुमार, सूबे सिंह, दुलीचंद, भीम सिंह
श्रीकृष्ण गोशाला कनीना में कई लोगों ने दिया दान
-भगत सिंह प्रधान ने जताया आभार
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कनीना की आवाज। श्रीकृष्ण गोशाला कनीना में गोसेवा के प्रति समर्पण और समाज सेवा की एक प्रेरणादायक मिसाल देखने को मिली। गोशाला में आए श्रद्धालुओं ने गौमाता की सेवा हेतु उदारतापूर्वक सहयोग राशि भेंट की तथा सेवा कार्यों में भाग लिया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रेम कुमार भोजवास के पुत्र निर्मल कुमार और उमेश कुमार द्वारा गोशाला में 51000 रुपए की सहायता राशि भेंट की।
इसके साथ ही बिजेंद्र सिंह हेडमास्टर ने अपने पिता स्वर्गीय मातादीन की पुण्य स्मृति में 5100 रुपए का योगदान देकर गोसेवा के इस पवित्र कार्य में भागीदारी निभाई। इस अवसर पर उपस्थित गौसेवकों प्रधान भगत सिंह, रामकुमार, सतीश कुमार, दिलावर सिंह, रामप्रताप, राज सिंह, बलवान आर्य, रविन्द्र बंसल, नीलम देवी लिली, ओमप्रकाश आर्य आदि समाज के गणमान्य व्यक्तियों ने कहा कि गौसेवा भारतीय संस्कृति की पहचान है और इस प्रकार के सहयोग से न केवल गौशालाओं का संचालन सुदृढ़ होता है बल्कि समाज में सेवा और संस्कार की भावना भी विकसित होती है।
गोशाला प्रबंधन ने सभी दानदाताओं एवं सहयोगकर्ताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इसी प्रकार समाज का सहयोग मिलता रहा तो गोमाता की सेवा और बेहतर ढंग से की जा सकेगी। इस मौके पर गायों को गुड़ व चारा खिलाया।
फोटो कैप्शन 02: गायों को गुड़ खिलाकर दान करते हुए।
रेवाड़ी से सतनाली वाया कनीना फोरलेन मार्ग बनाया जाए
-बार-बार मांग उठी किंतु दफन हुई
- वाहनों का दबाव बढ़ा
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कनीना की आवाज। कनीना से महेंद्रगढ़ तथा कनीना से रेवाड़ी मार्गों पर जहां वाहनों का दबाव बढ़ रहा है। बाईपास की सख्त जरूरत है वह भी नहीं बन पाया है। यहां तक की चरखी दादरी से अलवर वाया कनीना, काठूवास- नीमराना रेलवे लाइन का भी अभी निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ है। ऐसे में सबसे प्रमुख मार्ग रेवाड़ी से सतनाली का फोर लेन बनाये जाने की है। यह मार्ग रेवाड़ी से शुरू होकर कनीना, महेंद्रगढ़, सतनाली तक जाता है। अगर यह मार्ग फोर लेन का बन जाए तो लोगों को सुविधा मिलेगी वही वाहनों का दबाव घट जाएगा। एक और जहां हिसार तक पहुंचने में करीब 2 घंटे का समय कम लगेगा वहीं लोगों को भारी सुविधा मिलेगी। कई वर्षों से यह मांग बार-बार उठाई जा रही है किंतु मामला अधर में लटका हुआ है। एक बार तो स्टेट हाईवे 21 नंबर के बोर्ड भी कनीना बस स्टैंड के आसपास गाड़ दिए गए थे। लोगों को खुशी हुई थी कि अब निर्माण कार्य शुरू होगा। राव इंद्रजीत सिंह केंद्रीय मंत्री ने भी यह मांग उठाई थी और आशा की जा रही थी जल्द ही निर्माण कार्य शुरू होगा लेकिन आज तक मामला अधर में लटका हुआ है।
कनीना के आसपास यदि कोई सड़क मार्ग सबसे सघन वाहनों का है तो वह रेवाड़ी से कनीना महेंद्रगढ़ और सतनाली की ओर जाने वाला मार्ग है। इस मार्ग की अभी तक सुध नहीं ली गई है। परिणाम यह है कि जब हिसार जाना होता है तो बड़ी समस्या झेलनी पड़ती है। अगर यह सड़क मार्ग फोरलेन का बन जाए तो पहुंचना सुविधाजनक हो जाएगा। वैसे तो इसे एक बार पिलानी से मिलने की भी कोशिश की गई थी। लेकिन परिणाम जस का तस है। क्या कहते हैं इस संबंध में लोग-
** यदि रेवाड़ी से सतनाली फोरलेन मार्ग बना दिया जाए तो वाहनों का दबाव घट जाएगा। वाहन आसानी से गुजर सकेंगे और दुर्घटनाओं की आशंका घटेगी, लोगों को सुविधा मिलेगी और हिसार तक कम से कम 2 घंटे का सफर कम हो जाएगा क्योंकि अधिकांश कार्यों के लिए हिसार जाना पड़ता है। यदि यह मार्ग फोर लेन का नहीं बनता तो कई शहर और कस्बों के लोगों को परेशानी यूं ही उठानी पड़ती रहेगी। यदि यह मार्ग फोरलेन का बन जाए और चरखी दादरी से अलवर रेलवे लाइन वाया कनीना निर्माण शुरू हो जाए तो निश्चित रूप से विकास कार्यों की झड़ी लगेगी और लोगों का स्तर ऊंचा उठ जाएगा।
-- भगत सिंह प्रधान एवं समाजसेवी
रेवाड़ी से कनीना सतनाली तक का यह पुराना मार्ग है। इस मार्ग पर वाहनों की संख्या अन्य मार्गों की अपेक्षा सबसे अधिक है। यूं तो कनीना कस्बा चारों ओर से चरखी दादरी, कोसली, नारनौल, अटेली, महेंद्रगढ़ ,रेवाड़ी आदि से जुड़ा हुआ है लेकिन सबसे व्यस्त मार्ग भी रेवाड़ी से महेंद्रगढ़ सतनाली तक का है। इस समय इस बार की फोरलेन बनाने की सख्त जरूरत है ताकि आवागमन में सुविधा हो, उद्योग धंधों का विकास हो तथा गंतव्य मार्ग जैसे हिसार तक पहुंचने का समय भी कम लगेगा।
- दिनेश कुमार प्रधान मोलडऩाथ आश्रम
फोटो कैप्शन: दिनेश कुमार और भगत सिंह प्रधान तथा
फोटो कैप्शन 3/4: रेवाड़ी से महेंद्रगढ़ वाया कनीना सड़क मार्ग
त्रुटिपूर्ण सड़क को लेकर किया प्रदर्शन
-अध्यक्षता अतरलाल ने की
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कनीना की आवाज। धनौन्दा से मोहनपुर तक बनाई जा रही सड़क पर धनौन्दा पंप हाउस से निकलने वाली तीन नहरों के पुलों पर बनाए जा रहे त्रुटिपूर्ण सड़क निर्माण के खिलाफ ग्रामीणों ने जोरदार प्रदर्शन कर नारेबाजी की।
प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए बसपा नेता अतरलाल ने चेतावनी दी कि प्रशासन तथा ठेकेदार ने तीन दिन के अंदर त्रुटियों को दूर कर सड़क निर्माण सही नहीं किया तो ग्रामीण उपमंडल ना. कनीना के कार्यालय पर धरना देंगे। उन्होंने कहा कि ठेकेदार के कर्मचारियों तथा उपमंडल अधिकारी (ना.) कनीना के संज्ञान में कई बार शिकायत लाने के बावजूद भी सड़क निर्माण सही नहीं किया जा रहा है। बीच सड़क में तीन कीकर तथा खंभा छोड़ दिया गया है। जिससे किसानों के ट्रैक्टर व अन्य वाहनों की आवाजाही में दिक्कत होगी और दुर्घटनाओं का अंदेशा बना रहेगा। उन्होंने कहा कि पुलों के ऊपर से बनाई जा रही सड़क को सही लेवल में बनाने, कीकर व खंभे को हटाने तथा पुलों के ऊपर से गुजर रहे तारों को ऊपर उठा कर सड़क निर्माण करने की मांग की। इस अवसर पर किशनपाल, मीर सिंह वैद्य, वेदपाल दहिया, संजू, प्रताप सिंह, सुबेदार मदन सिंह, ओमपाल सिंह, मनोहर सिंह, आश व ग्रामीण मौजूद थे।
फोटो कैप्शन 01: सड़क मार्ग को लेकर किया प्रदर्शन













































