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Tuesday, November 3, 2026




 



दीयों की मांग घटी, मोमबत्तियों की मांग बढ़ी
-तेल, घी एवं बाती महंगी हुई
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कनीना की आवाज।
दीपावली पर खुशियों को व्यक्त करने के लिए परम्परागत रूप से जलाए जाने वाले दीयों का स्थान मोमबत्तियों ने ले लिया है। एक जाति विशेष कुम्हार जाति, के लोगों द्वारा दीये बनाकर अपनी रोटी रोजी कमाने वालों का तो मानो धंधा ही चौपट हो गया है। सस्ती, सुलभ तथा अविलंब प्रकाशमान होने वाली मोमबत्तियां दीपावली पर भारी संख्या में बिकती हैं।
     दीपावली के आगमन से करीब एक माह पूर्व ही कुम्हार जाति के लोग मिट्टïी लाकर दीपक बनाते हैं तत्पश्चात उन्हें पकाकर घर-घर बेचते हैं। एक जमाना था जब दीपावली के शुभ दिन पर घी के दीये जलाते थे किंतु अब दीयों के प्रति रुझान भी बदल गया है। वैसे तो माना जाता है कि श्रीराम के 14 वर्षों का वनवास पूरा करके, रावण पर विजय पाकर जब सीता सहित राम, लक्ष्मण व हनुमान अयोध्या लौटे थे तो लोगों ने खुशी के मारे घरों में घी के दीये जलाए थे और तत्पश्चात प्रति वर्ष उसी याद को दिल में संजोकर प्रतिवर्ष घी के दीये जलाते आ रहे हैं। समय के साथ-साथ दीये जलाने का रिवाज भी बदल गया है। अब तो लोग तेल के दीये भी नहीं जलाते अपितु मोमबत्ती जलाकर ही खुशी व्यक्त करते हैं। कुम्हार जाति के लोगों ने बताया कि एक वक्त था जब दीपावली के दिन इतने दीये बिकते थे कि उनके परिवार का गुजर बसर आसानी से हो जाता था किंतु अब तो रोटी रोजी के भी लाले पड़ गए हैं।  अब तो दीये बनाकर पकाने का काम भी धीमा पड़ गया है और यहां तक कि कुछ कुम्हारों ने तो अपना यह धंधा ही बदल लिया है या फिर दीये खरीदकर लाते हैं और उन्हें घरों में बेचते हैं। उन्होंने खेद जताया कि अब तो लोग मोमबत्ती से ही गुजारा चला लेते हैं।
   उधर दीपावली से कई दिन पूर्व ही दुकानों पर मोमबत्ती उपलब्ध हो जाती हैं। ये सस्ती भी मिलती हे ऐसे में लोग परम्परागत दीयों को भूला बैठे हैं। गृहणियों ने बताया कि दीयों को देशी घी से जला पाना कठिन हो गया है क्योंकि देशी घी का भाव भी 1400 रुपये से अधिक तक पहुंच गया है वहीं रुई की बाती बनानी पड़ती हैं और दीपकों को पानी में भीगोकर रखना पड़ता है ताकि वे घी कम चूसे। बाद में तेल के दीये जलाने की प्रथा चली क्योंकि तेल का भाव भी 200 रुपये किलो से कम नहीं होता है ऐसे में तेल के दीये जलाना भी आसान काम नहीं है। आदमी के आलसी होने के कारण तथा मेहनत से बचने के लिए मोमबत्ती को ही सुविधाजनक समझ लिया है और दीपावली के दिन मोमबत्तियां ही जलाई जा रही है। उधर मोमबत्ती महज एक रुपये से दस रुपये तक चल रही है। अकेला दीया 5 रुपये का पड़ रहा है।
   वैसे तो भगवान् श्रीराम के अयोध्या लौटने के बाद देशी घी के दीये जलाने का सिलसिला शुरू हुआ था किंतु हालात ये बन गए हैं कि अब मोमबत्ती जलाकर ही काम चलाया जाता है। दीये जाने से स्वास्थ्य पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है जबकि मोमबत्ती जलाने से स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ रही है। वैसे भी मोमबत्तियों को जलाने के धंधे ने कुम्हारों का व्यवसाय छीन लिया है। आगे आने वाले समय में मोमबत्तियों का स्थान कौन लेता है वक्त ही बताएगा।
 समय के साथ-साथ दिवाली मनाने के तौर तरीकों  में भी बदलाव आ रहा है। यह सब विज्ञान का चमत्कार ही कहिए क्योंकि  विज्ञान के कारण ही जहां पटाखे चलाने का रिवाज चला आ रहा है वहीं दीये जलाने के रिवाज में परिवर्तन भी आ गया है। कभी घी के दीये जलाए तांते थे फिर तेल के दीये जलाए गए। अब मोमबत्ती ही जलाकर खुशियां व्यक्त की जाती हैं यहां तक की कुछ लोग तो मोमबत्ती के स्थान पर छोटे-छोटे बल्ब जलाकर ही काम चलाते हैं।
दीपावली के दृष्टिगत बाजार में सजे हैं विभिन्न रूपों और रंगों के दीये --
दीपावली के इस पर्व पर जहां अधिकांश चाइनीज आइटम बाजार से गायब हैं। विगत वर्षों से सरकार भी इस मामले को लेकर प्रयासरत थी जिसके चलते इस सराहनीय कदम बताया जा रहा है, वहीं बाजार में इस बार अलग-अलग डिजाइन के दीयों की बहार आ गई है। विभिन्न रंग और रूप और देखने में मन को मोहने वाले दीये नजर आते हैं।
महेंद्र एवं जितेंद्र नामक व्यक्ति ने बताया कि ये दीये मिट्टी के बने हैं किंतु इनको शंख, गुलाब के फूल में दीये तथा विभिन्न डिजाइन रंगो एवं आकार के दीये बनाए गए हैं। जिनमें विभिन्न रंग लगाकर संजोकर इनको और भी शानदार बनाया गया है जिसके चलते ये मन को मोह लेते हैं। बाजार में इनकी कीमत बड़े दीये एक सौ रुपये तक जबकि छोटे दिए पांच रुपये तक मिल रहे हैं।
फोटो कैप्शन 03: दीयों की दुकानों पर बहार





किसान जुटे एक बार फिर से सरसों बिजाई के कार्य में
-वर्षा से तबाह  हो गई थी बिजाई
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कनीना की आवाज।
कनीना क्षेत्र में किसान एक बार फिर जोर-शोर से सरसों की बिजाई में जुट गए हैं। गत 29 अक्टूबर को हुई भारी वर्षा ने क्षेत्र के अनेक किसानों की सरसों की फसल को नुकसान पहुंचाया था। खेतों में पानी भरने और मिट्टी में नमी अधिक होने के कारण छोटी सरसों की पौध खराब हो गई, जिससे किसानों के सामने दोबारा बिजाई करने की मजबूरी पैदा हो गई है।
किसानों के सामने अब असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि वे गेहूं की बिजाई करें या फिर सरसों की दोबारा बुवाई करें। पहले ही हजारों रुपये खर्च कर चुके किसान अब आर्थिक नुकसान उठाने के बावजूद दोबारा सरसों की बिजाई में जुट गए हैं। किसानों का मानना है कि जितनी जल्दी बिजाई हो जाएगी, उतना ही फसल के बेहतर उत्पादन की संभावना बनी रहेगी।
किसान सूबे सिंह, राजेंद्र सिंह, अजीत कुमार सहित अनेक किसानों ने बताया कि वर्षा ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया है। अब उनके पास दोबारा बिजाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
पूर्व कृषि वैज्ञानिक डा. देवराज यादव ने बताया कि इस समय किसान लेट वैरायटी की सरसों की बिजाई कर सकते हैं। किसानों को मौसम और खेतों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए जल्द बिजाई करनी चाहिए, ताकि फसल को आगे बढऩे के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
फोटो कैप्शन 02:कनीना क्षेत्र में वर्षा से फसल खराब होने के बाद खेत में दोबारा सरसों की बिजाई करते किसान।



अब तक अनाज मंडी में खरीदा गया 3.75 लाख क्विंटल बाजरा
-4 नवंबर को कई गांवों के किसान बेचेंगे बाजरा
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कनीना की आवाज।
 कनीना की नई अनाज मंडी स्थित चेलावास में बाजरे की खरीद तेजी से जारी है। अब तक मंडी में करीब 3 लाख 75 हजार क्विंटल बाजरे की खरीद हो चुकी है। खरीद कार्य में करीब 10 निजी एजेंसियां लगी हुई हैं, जो किसानों से बाजरा खरीद रही हैं। हालांकि, अभी तक सरकारी स्तर पर बाजरे का एक दाना भी नहीं खरीदा गया है।
एक ओर जहां किसान खेतों में सरसों और गेहूं की बिजाई के कार्य में जुटे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी बाजरे की फसल बेचने के लिए भी मंडी पहुंच रहे हैं। किसान निर्धारित शेड्यूल के अनुसार ट्रैक्टर-ट्रालियों में बाजरा लेकर चेलावास मंडी आ रहे हैं। खरीद प्रक्रिया लगातार जारी रहने से मंडी में किसानों की आवाजाही बनी हुई है।
सचिव अजीत सिंह ने बताया कि  जारी शेड्यूल के अनुसार 4 नवंबर को खरकड़ा बास, खेड़ी, खैराना, कोका, कोटिया, मानपुरा, मोहम्मदपुर, मुंडिया खेड़ा, नांगल, नौताना, पड़तल,पोता, रामबास, रसूलपुर, स्याणा, सेहलंग, सिहोर सुंदराह, तलवाना, उच्चत, उन्हाणी और ढाणा गांवों के किसान अपना बाजरा बेचने के लिए मंडी पहुंचेंगे। किसानों को निर्धारित तारीख के अनुसार ही बाजरा लेकर आने की सलाह दी गई है, ताकि खरीद कार्य सुचारू रूप से चलता रहे।
फोटो कैप्शन 04: चेलावास अनाज मंडी में बाजरे की फसल बेचने के लिए पहुंचे किसान एवं ट्रैक्टर-ट्रालियां।


ज्ञान भवन नई दिल्ली में गूंजी कनीना की आवाज
-सचिन कुमार ने किया दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम का मंच संचालन ।
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कनीना की आवाज।
विश्व हिंदी परिषद के तत्वाधान में देश की राजधानी नई दिल्ली के प्रतिष्ठित विज्ञान भवन में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यक्रम भारत रत्न अटल -हिंदी, राष्ट्रवाद एवं सुशासन में कनीना निवासी प्रवक्ता सचिन कुमार ने लगातार दो दिनों तक मंच संचालन कर क्षेत्र का गौरव बढ़ाया।
पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी को समर्पित इस कार्यक्रम में उनके व्यक्तित्व, राष्ट्र के प्रति समर्पण, हिंदी भाषा के उत्थान तथा सुशासन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को स्मरण किया गया। हिंदी, राष्ट्रवाद और सुशासन के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने की भावना इस आयोजन के केंद्र में रही।
कार्यक्रम में भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति  एम वेंकैया नायडू, विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा, पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे, पूर्व राज्यसभा सांसद केसी त्यागी, पूर्व गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार, पद्मश्री एवं पद्म भूषण से सम्मानित प्रख्यात साहित्यकार आचार्य यर्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद, बिहार विधान परिषद के सदस्य एवं पूर्व मंत्री श्री संजय पासवान, प्रख्यात स्तंभकार एवं सदस्य, वित्त एवं ऊर्जा मंत्रालय, भारत सरकार डा. विपिन कुमार, सदस्य, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार श्री देवी प्रसाद मिश्र तथा भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के सदस्य सचिव प्रोफेसर सच्चिदानंद मिश्र सहित अनेक प्रतिष्ठित हस्तियां शामिल हुईं।
इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में अनेक वर्तमान एवं पूर्व मंत्री, सांसद, विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर एवं शिक्षाविद्, विभिन्न मंत्रालयों के राजभाषा अधिकारी, प्रतिष्ठित साहित्यकार तथा पद्मश्री एवं पद्म भूषण से अलंकृत विभूतियों ने भाग लिया। लगभग 20 देशों से आए गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय गरिमा प्रदान की। अपने शानदार मंच संचालन के लिए सचिन कुमार को विशेष रूप से सम्मानित भी किया गया।
गौरतलब है कि सचिन कुमार अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मंच संचालन कर चुके हैं। विज्ञान भवन में उनके शानदार मंच संचालन और सम्मान से कनीना क्षेत्र गौरवान्वित है। वर्तमान में सचिन कुमार रेवाड़ी जिले के नांगल तेजू स्थित मॉडल संस्कृति विद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हैं।
फोटो कैप्शन 01: सचिन शर्मा संबोधित करते हुए


सरसों की





बीजाई नष्ट, मिले आर्थिक सहायता
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कनीना की आवाज। जिला के किसानों द्वारा बोई गई सरसों की 70 प्रतिशत बिजाई गत 29, 30 अक्टूबर को हुई बरसात के कारण रपट (खराब) हो गई। किसानों को दोबारा बिजाई करनी पड़ रही है। इस सम्बन्ध में बसपा के नेता अतरलाल एडवोकेट ने राज्य सरकार से प्रभावित किसानों को दस हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से विशेष आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की मांग की है।
    अतरलाल ने कहा कि उन्हें मुंडिया खेड़ा, दौंगड़ा जाट, दौंगड़ा अहीर, सिलारपुर, अटाली तथा जिला के अनेक गांवों के किसानों से शिकायत मिली है कि उन्होंने सरसों की जो बिजाई की थी वह गत 29-30 अक्टूबर को लगातार हुई बरसात के कारण खराब हो गई है। बरसात के कारण खेतों में जलभराव हो गया और बोए गए सरसों के बीज अंकुरित होने से पहले ही मिट्टी में दब गए। इस प्राकृतिक आपदा के कारण प्रभावित किसानों को मजबूरन दोबारा बिजाई करनी पड़ रही है। इस तरह किसानों को प्रति एकड़ आठ-दस हजार रूपए का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि जिला में करीब 2 लाख एकड़ भूमि में सरसों की बिजाई की जाती है। इसमें से 70 प्रतिशत रकबे में सरसों की बिजाई रपट खराब होने से किसान चिंतित तथा उदास हैं। इसलिए सरकार तथा कृषि विभाग तत्काल खराब हुई सरसों की बिजाई का सर्वे करवाकर प्रभावित किसानों को दस हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से विशेष आर्थिक सहायता उपलब्ध कराए।





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