कनीना मंडी में रामपुरी नहर के पुलिया निर्माण को मिली मंजूरी
- बहुत जल्द हो सकता है काम शुरू
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स्रनीना की आवाज। कनीना के लिए लगातार विकास की बात करने वाली स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव के प्रयासों से रामपुरी डिस्ट्रीब्यूटरी पर पुल का निर्माण कार्य को हरी झंडी मिल गई है। मंडी रोड पर बहुत जल्द कार्य शुरू हो सकता है।
कनीना में पुरानी अनाज मंडी जाने वाले रोड पर नहर महेंद्रगढ़ रोड़ से रेवाड़ी रोड़ पर जाने वाले मिनी बाईपास पर पुलिया रोड़ के दोनों साइड से बाहर निकला हुआ है जिससे दुर्घटना होने का अंदेशा बना रहता है। जिस कारण राहगीरों को भारी परेशानी उठानी पड़ रही है। इस रास्ते पर अनेकों दुर्घटनाएं भी हो चुकी है।
कनीना मंडी निवासी योगेश अग्रवाल, मनोज कुमार, सुरेश कुमार आदि ने बताया कि आए दिन नहर के पास कोई न कोई हादसा होता ही रहता है। स्थानीय लोगों ने समाधान के लिए अनेकों बार प्रशासन के आला अधिकारियों को पत्र के माध्यम से अवगत भी करवा चुके है। अब उस काम के लिए विभाग द्वारा ग्रांट पास कर दी गई है। जल्द ही निर्माण कार्य की कार्रवाई पूर्ण करके काम की शुरुवात कर रोड को चौडा किया जाएगा। पुल निर्माण की सूचना मिलने से क्षेत्र वासियों में खुशी की लहर है कस्बा वासियों ने प्रशासन का आभार व्यक्त किया है।
दीपक चौधरी ने जताया आभार-
कनीना के पार्षद दीपक चौधरी ने खुशी जताते हुए कहा कि कनीना के लिए लगातार विकास की बात करने वाली स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव के प्रयासों से विकास के कार्यों को करवाने जैसे कनीना समान्य बस स्टैंड का कार्य, जुडिशियल परिसर भवन कनीना, उन्हानी में रामपरी नहर के पुलिया का निर्माण, करीरा रोड जो बरसों से रुका हुआ था उसका निर्माण, कनीना की अनेक योजनाएं डी प्लान के तहत निर्माणाधीन, जोहड़ की सफाई ,कनीना सिविल अस्पताल को एफआरयू का का दर्जा ,पांच से छह नये प्रशिक्षित डाक्टरों की टीम भिजवाना, डायलिसिस की सुविधाओं का शुरू होना, बाल्मीकि धर्मशाला में टीन शेड और कमरे का निर्माण, बस स्टैंड की जमीन में अनेक दुकानदारों को राहत आदि अनेक कार्यों को विकास के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने मंत्र का आभार जताया है।
फोटो कैप्शन 05: कनीना मंडी पुल जिसकी हालात सुधरेगी
सूचना मिलने के महज 14 घंटे में गुमशुदा नाबालिग को सकुशल बरामद कर परिजनों को सौंपा
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स्रनीना की आवाज। महेंद्रगढ़ पुलिस ने त्वरित कार्रवाई और सतर्कता का परिचय देते हुए गुमशुदा नाबालिग बच्चे को सूचना मिलने के मात्र 14 घंटे के भीतर सकुशल बरामद कर उसके परिजनों को सौंपदिया। पुलिस की इस संवेदनशील एवं तत्पर कार्यवाही से परिजनों के चेहरे पर फिर से मुस्कान लौट आई।
दिनांक 09 जुलाई को एक नाबालिग बच्चा अपने माता-पिता की डांट से नाराज होकर शाम करीब 06 बजे बिना किसी को बताए घर से चला गया। परिजनों ने अपने स्तर पर रिश्तेदारों, पड़ोसियों तथा आसपास के संभावित स्थानों पर काफी तलाश की, लेकिन बच्चे का कोई सुराग नहीं लग सका। बच्चे के घर नहीं लौटने पर परिजनों की चिंता बढ़ गई और उन्होंने पुलिस से संपर्क किया।
दिनांक 10 जुलाई को रात करीब 11 बजे पुलिस थाना सदर कनीना को नाबालिग के लापता होने की सूचना प्राप्त हुई। सूचना मिलते ही पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए थाना सदर कनीना की एक विशेष टीम का गठन किया तथा बच्चे की तलाश के लिए तत्काल अभियान शुरू किया।
पुलिस टीम ने तकनीकी संसाधनों का प्रभावी उपयोग करते हुए त्वरित कार्रवाई की और लगातार प्रयासों के परिणामस्वरूप सूचना मिलने के महज 14 घंटे के भीतर नाबालिग बच्चे को रेवाड़ी से सकुशल बरामद कर लिया।
बच्चे को सुरक्षित बरामद करने के बाद पुलिस उसे थाना सदर कनीना लेकर आई, जहां आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के उपरांत उसे उसके परिजनों को सौंप दिया गया। अपने बच्चे को सकुशल वापस पाकर परिजनों ने महेंद्रगढ़ पुलिस की त्वरित, संवेदनशील एवं सराहनीय कार्यशैली के लिए पूरी पुलिस टीम का हृदय से आभार व्यक्त किया।
कनीना गौशाला की गौचर भूमि पर स्टेडियम बनाने का प्रस्ताव, विरोध में उतरी गौशाला समिति
- 1500 गौवंश के संरक्षण और चारा भंडारण के लिए भूमि सुरक्षित रखने की उठी मांग
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स्रनीना की आवाज। कनीना नगर पालिका द्वारा श्रीकृष्ण गोशाला की गोचर भूमि पर खेल स्टेडियम बनाने का प्रस्ताव पारित कर उच्च अधिकारियों को भेजे जाने के बाद रोष पनपा है। गोशाला समिति, प्रधान भगत सिंह तथा कस्बे के अनेक लोगों ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव से हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि खेल मैदान के लिए कस्बे में अन्य स्थान उपलब्ध हैं, लेकिन गोशाला की भूमि को किसी भी स्थिति में कम नहीं किया जाना चाहिए।
प्रधान भगत सिंह ने कहा कि खेल स्टेडियम बनाने पर इसी जगह मरे हुए गोवंशों की दुर्गंध और उडऩे वाली धूल में कैसे खिलाड़ी तैयार होंगे। इससे अच्छा है कस्बे में बहुत खेल मैदान है उन्हें ही स्थापित कर स्टेडियम बनाया जाए।
गौशाला समिति के अनुसार वर्ष 2003 में पूर्व प्रधानों, ग्रामीणों और गोभक्तों के सहयोग से श्रीकृष्ण गौशाला की स्थापना हुई थी। वर्तमान में यहां लगभग 1500 गोवंश का पालन-पोषण किया जा रहा है। गौवंश की देखभाल के लिए वर्षों की मेहनत से लगभग 15 एकड़ भूमि पर हरे चारे की खेती, चारा भंडारण की व्यवस्था, ट्यूबवेल, गोदाम और अन्य आवश्यक सुविधाएं विकसित की गई हैं।
प्रधान भगत सिंह ने बताया कि गौशाला से मात्र 10 मीटर की दूरी पर रेलवे लाइन गुजरती है। इसी कारण गोवंश की सुरक्षा के लिए चारों ओर तारबंदी की गई, ताकि कोई गोवंश रेलवे ट्रैक पर जाकर हादसे का शिकार न हो। उन्होंने कहा कि यह भूमि केवल खाली मैदान नहीं, बल्कि गोवंश की सुरक्षा और उनके पालन-पोषण की आधारभूमि है।
समिति ने बताया कि हर वर्ष फसल कटाई के समय लगभग 1200 ट्राली सूखा चारा (कड़वी) एकत्रित किया जाता है। इसे सुखाकर ट्रैक्टर की सहायता से काटकर गोदामों में सुरक्षित रखा जाता है, जिससे पूरे वर्ष गौवंश के लिए चारे की व्यवस्था बनी रहती है। इसके लिए लगभग 15 एकड़ भूमि की आवश्यकता पड़ती है।
समिति ने यह भी बताया कि मृत गौवंश और कस्बे के गोवंशों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए लगभग 10 एकड़ भूमि की जरूरत होती है। यदि यह व्यवस्था नहीं रहेगी तो खुले में पशुओं के शव डालने से दुर्गंध और संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाएगा। इसके अतिरिक्त हरे चारे की खेती के लिए भी करीब 15 एकड़ भूमि आवश्यक है।
गौशाला समिति का कहना है कि जिस भूमि पर नगर पालिका स्टेडियम बनाने का प्रस्ताव लाई है, उसका पिछले 23 वर्षों से गोशाला द्वारा उपयोग किया जा रहा है। यहां दो ट्यूबवेल, आरपीएस स्कूल संस्थापक स्व. डा.ओमप्रकाश यादव द्वारा उद्घाटित गोदाम, सांसद निधि से निर्मित 50 बाइ 200 फीट का गोदाम, आरपीएस ग्रुप के सहयोग से विकसित अन्य निर्माण, शौचालय, 20 बाइ200 फीट का टीन शेड तथा पानी की पाइपलाइन जैसी स्थायी सुविधाएं पहले से मौजूद हैं। इसी क्षेत्र से पूरी गोशाला व गोवंशों को पानी की आपूर्ति भी की जाती है।
समिति के अनुसार लगभग 30 एकड़ क्षेत्र में चारदीवारी के लिए पिल्लर लगाए जा चुके हैं। खुले क्षेत्र में नंदी स्वतंत्र रूप से विचरण करते हैं, जिससे उन्हें पर्याप्त स्थान मिलता है और उनका स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है। यदि इस भूमि पर स्टेडियम बनाया जाता है तो गोवंश के संरक्षण और गौशाला के संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
उन्होंने मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव से मांग की है कि गोचर भूमि को सुरक्षित रखा जाए तथा खेल स्टेडियम के लिए कस्बे में उपलब्ध किसी अन्य उपयुक्त स्थान का चयन किया जाए। उनका कहना है कि गोसेवा और खेल दोनों महत्वपूर्ण हैं, लेकिन गोवंश के संरक्षण के लिए वर्षों से विकसित संसाधनों को नुकसान पहुंचाए बिना समाधान निकाला जाना चाहिए।
फोटो कैप्शन 04: गोवंश के लिए जगह जहां स्टेडियम बनना है
लड़का गुम, गुमशुदगी का मामला दर्ज
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स्रनीना की आवाज। कनीना उप-मंडल के गांव खेड़ी तलवाना का 11वीं कक्षा पढऩे वाले युवक 9 जुलाई से घर नहीं पहुंचा है। उसके पिता ने पुलिस में मामला गुमशुदगी का मामला दर्ज करवाया है।
अर्जुन खेड़ी तलवाना निवासी ने कहा है कि उनका पुत्र अंकुश 11वीं कक्षा में एसडी स्कूल खेड़ी में पढ़ता है। वह 9 जुलाई से घर से लापता है। उन्हें शक जताया है कि किसी व्यक्ति ने उसका अपहरण कर लिया है। कनीना पुलिस ने अर्जुन की शिकायत पर गुमशुदगी का मामला दर्ज कर लिया है और जांच जारी है।
रास्ते पर किया कब्जा, शिकायत, कनीना पुलिस ने किया मामला दर्ज
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स्रनीना की आवाज। कनीना उप-मंडल के गांव सुंदरह निवासी महावीर की शिकायत पर मनोज नामक व्यक्ति के विरुद्ध रास्ते पर कब्जा करने और गाली गलौज देने का मामला दर्ज कर लिया है।
महाबीर सिंह ने बताया कि उन्होंने अपनी जमीन पर पक्का मकान बना रखा है तथा और भी लोगों के पक्के मकान उनकी जमीन पर बने हुए हैं। लाखों रुपए की लागत से ट्यूबवेल बनाए हुए हैं। आने जाने के रास्ते पर मनोज नामक व्यक्ति ने जिनका कोई यहां लेना देना नहीं है जबरदस्ती रास्ते पर कब्जा कर लिया है। 19 अप्रैल को एलसी करवाई गई जिसमें उसने 5335 वर्ग गज पर अवैध कब्जा किए पाया गया। उन्होंने आम रास्ते को रोक कर अवरोध पैदा किया है। यदि उसे कब्जा हटाने के बारे में कहते हैं तो गाली गलौज करता है। उनकी शिकायत पर मनोज कुमार नामक व्यक्ति के विरुद्ध विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है।
भूल जाओ अब दाल रोटी को
-महंगा हो चला है दाल रोटी का खाना
-टमाटर व प्याज हुए महंगे
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स्रनीना की आवाज। एक वक्त था जब दाल रोटी गरीब व्यक्ति प्रेम से खाते थे। जब भी रोटी रोजी की कोई चर्चा चलती थी तो यही शब्द कहते सुना जाता था कि दाल रोटी का जुगाड़ हो रहा है। दाल रोटी कभी होटल में अधिक प्रसिद्ध होती थी। दाल मुफ्त में मिलती थी रोटी के पैसे देने पड़ते थे। समय-समय की बात है आज के दिन दाल रोटी कोई गरीब नहीं खा सकता। अगर खाता है तो वह बहुत अमीर है क्योंकि दाल बनाने के लिए टमाटर 60 रुपए किलो से कम नहीं है, प्याज 50 रुपये किलो पहुंच गई है, लहसुन 300 रुपये किलो से कम नहीं है, तेल 170 रुपए लीटर पहुंच गया है, वही दाल चेने की 75 रुपए तो उड़द 130 रुपये किलो चल रही है। यही नहीं दाल में अगर देशी घी डाल दे तो जायका तो बदल जाएगा किंतु 1500 रुपए किलो से कम नहीं है। और भी कुछ आइटम डालते हैं तो वो भी सस्ते नहीं हैं। ऐसे में दाल बनाना बहुत कठिन कार्य हो गया है। अब तो फिर से चटनी रोटी का युग आ गया है।
एक वक्त था जब अकसर ग्रामीण क्षेत्रों में चटनी, दूध और रोटी खाई जाती थी जबकि सुबह के वक्त चटनी, छाछ एवं रोटी खाई जाती थी और वो बड़े मजे के साथ खाते थे। परंतु आजकल न तो घरों में दूध रहा और न ही छाछ रही, बहुत कम लोग हैं जिनके घरों में दूध एवं छाछ मिलेगी, वो खुशनसीब हैं। देशी घी के भाव 1500 रुपए किलो से अधिक पहुंच गए हैं। ऐसे में दूध,घी एवं छाछ अब दुर्लभ हो गए हैं। एक वक्त था जब कहावत थी- देसा में देस हरियाणा जित दूध-दही का खाना। अभी कहावत भी धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही है। न तो छाछ रही और न दूध रहा। अब तो सब्जियों के भाव आसमान छू रहे हैं। ऐसे में लोग सब्जी खाने से परहेज करने लगे हैं। बाजार में कोई भी सब्जी आज के दिन सस्ती नहीं कहीं जा सकती, अभी कुछ समय लगेगा फिर पर्याप्त मात्रा में सब्जी पैदा हो जाएगी और फिर से ये सब्जियां गरीब इंसान को नसीब होंगी। अभी तक तापमान अधिक होने के कारण सब्जियां पैदा नहीं हो रही है। घीया एवं तोरई भी 40 रुपए किलो बिक रही हैं। शहरों में सब्जी बेशक सस्ती हो ग्रामीण क्षेत्रों में सब्जी खाना अमीरी की निशानी बन गया है।
सब्जी विक्रेता इंद्रजीत शर्मा ने बताया कि प्याज 50 रुपए किलो से कम नहीं मिलती जबकि टमाटर 60 रुपए किलो चल रहे हैं। लहसुन 300 रुपये किलो चल रहा है जो दाल बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए दाल बनाना बहुत कठिन कार्य है और उनके टमाटर प्याज लहसुन की बिक्री कुछ घटी है।
इस संबंध में कुछ लोगों से चर्चा की गई --
तेल आज के दिन 170 रुपए लीटर वही दाल कम से कम 75 रुपए और अधिकतम 130 रुपए किलो मिल रही है। अधिक लोग अरहर की दाल खाते हैं जो 10 रुपए किलो है। आज के दिन दालों के भाव तेजी से बढ़ रहे हैं। यही कारण है की दालों के प्रति रुझान घटता ही जा रहा है। लोग दाल कम खरीदते हैं।
--योगेश कुमार दुकानदार
आज के दिन दाल भात जो उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार से आए हुए लोग अधिक प्रयोग करते हैं, का कम प्रयोग कर रहे हैं जबकि वो देशी सब्जियां खाटा का साग, कढ़ी, रायता आदि बनाते हैं। चटनी बनाकर भी गुजर बसर कर रहे हैं। धनिया खरीद कर लाते हैं जिसका भी भाव 300 ेरुपए किलो से कम नहीं है और यह सभी आइटम दाल में डाले जाते ताकि बेहतर दाल बने। क्योंकि देसी घी भी डालना पड़ता जो एक हजार रुपये किलो बिक रहा है। ऐसे में दाल नहीं बनाई जाती अपितु इसकी जगह चटनी, रोटी, दूध आदि से काम चलाया जाता है। वे दाल केी शौकीन है परंतु दाल से मोह भंग हो रहा है। चूंकि दाल में हरा धनिया, टमाटर ,हरी मिर्च, जीरा, लहसुन, प्याज, हींग, तेल, घी डाले जाते हैं। जो आज के दिन सबसे महंगे ऊंचे दामों पर बिक रहे हैं। ऐसे में दाल बनाना ही हम भूल चुके हैं।
-- सतीश कुमार कनीना निवासी
फोटो कैप्शन 03: टमाटर जो लाल हो गए साथ में सतीश कुमार और योगेश कुमार
विश्व मलाला दिवस -12 जुलाई
बच्चियों की शिक्षा पर देना चाहिए पूरा ध्यान-डा. रामानंद
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स्रनीना की आवाज। मलाला दिवस की यूं तो शुरुआत तालिबान से हुई जब 2012 में स्कूली बस में बंदूक धारी घुस गए और 15 वर्षीय लड़की के सिर में गोली मार दी। लड़की बच गई और बाद में उन्होंने पूरे ही विश्व में महिला और बच्चियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए आवाज उठाई जो आज भी मलाला दिवस के रूप में मनाई जाती है। सबसे कम उम्र की नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला बनी। इस संबंध में डा. रामानंद यादव पूर्व उप-जिला शिक्षा अधिकारी से बात हुई।
उन्होंने बताया कि मलाला दिवस दुनिया भर में शिक्षा के अधिकारों की वकालत को मान्यता देता है। कितने ही लोग मलाला संगठन से जुड़े हुए हैं ताकि बच्चियों और महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया जाए क्योंकि शिक्षा एकमात्र ऐसा साधन है जो इंसान के को अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाता है। यहां तक की शिक्षित व्यक्ति की हर जगह कद्र होती है। पुराने समय में लोग कम पढ़े लिखे होते थे उस समय भी किसी पढ़े-लिखे की कद्र होती थी क्योंकि पुराने समय से लड़कियों की शिक्षा पर कम बल दिया जाता है रहा है। लड़की के अक्सर 12 से 17 वर्ष की उम्र में स्कूल छोडऩे की अधिक घटनाएं देखने को मिलती है। ऐसे में लड़कियों की शिक्षा पर बल देने के लिए मनाया जाता है। हर देश में विद्यालय छोडऩे की घटनाएं मिलती जिनमें बच्चियों आगे होती है। ऐसे में बच्चियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। यह सत्य है कि कोविड-19 ने बहुत अधिक कुप्रभाव बच्चों की शिक्षा पर डाला। आज के दिन शिक्षा महंगी होने के कारण भी बच्चे स्कूल छोड़ जाते हैं। राजनीतिक अस्थिरता ,संघर्ष और प्राकृतिक आपदाएं भी बच्चों की शिक्षा को सीमित करती है, प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी, खराब शिक्षा का बुनियादी ढांचा अपर्याप्त सामग्री और बच्चों के घरेलू जीवन से भी शिक्षा की गुणवत्ता का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अगर बच्चों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा है तो स्कूल छोड़ जाएंगे। स्कूल जाते समय भी काम कर रहे हैं तो वो शिक्षा पर उतना ध्यान केंद्रित नहीं कर पाएंगे। आज के दिन रोटी रोजी की समस्या होने के कारण भी बच्चे काम पर लगा दिए जाते हैं। जिसके कारण शिक्षा पर ध्यान नहीं दे पाते। बच्चियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
एक और सरकार ने जहां बच्चियों की शिक्षा मुफ्त की हुई है किंतु निजी स्कूलों में जहां बच्चियों का कुछ रुझान देखने को मिलता है भारी फीस देखकर पढ़ाना मुश्किल हो जाता है। सरकार को चाहिए कि अधिक सुविधाएं दें और बच्चियों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करें।
फोटो कैप्शन: डा. रामानंद यादव
तीज उत्सव की तैयारी शुरू, हो रही है पतंगबाजी
-छतों पर वो मारा वो काटा का शोर सुनाई पड़ा
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स्रनीना की आवाज। कनीना में 15 अगस्त तीज उत्सव की शुरूआत हो गई है। इस मौके पर मेले का आयोजन भी किया जाता है।
कनीना में हरियाली तीज के पर्व के दृष्टिगत घेवर की मिठाई खाने की रिवाज है। उधर हरियाली तीज के दिन पूरा दिन पतंगबाजी का शोर सुनाई पडऩे लगा है। छतों पर युवा, बच्चे एवं बुजुर्ग वो मारा, वो काटा करते मिलते हैं। जहां पतंगबाजी के लिए बहुत से लोग पतंग उड़ाने व पतंग की डोर को काटने का मजा लेते है तो कुछ कट कर जाने वाले पतंग को दूर से पकड़कर लाने में प्रसन्न मिलते हैं।
यह पर्व किसान भी मनाते है क्योंकि फसल लहलहाने लग जाती है। लहलहाती फसल को देखकर किसान प्रसन्न होते हैं। इस बार फसल में देरी हो गई है। अधिकांश किसानों ने बीजाई कर रखी है।
अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में दो प्रकार की पतंग हवा में उड़ाई जाती है। एक पतंग के पूंछ होती है दूसरी बगैर पूंछ की होती है। बगैर पूंछ की पतंग को पतंगबाजी के एक्सपर्ट जन ही लुत्फ उठा सकते हैं किंतु पूंछ वाली पतंग को छोटे बच्चे तक हवा में उड़ाकर लुत्फ लेते हैं। इन पतंगों के पेच लड़ाए जाते हैं। अभी से ही पतंग उड़ाने का शोर होने लगा है जो दिनोंदिन बढ़ता जाएगा।
फोटो कैप्शन 02: कनीना में छतों पर पतंग उड़ाते बच्चे।
वर्षा के बाद दिखाई दिये रेन बग
-तीज के पर्व के पास अक्सर मिलने से इन्हें कहते हैं तीज
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स्रनीना की आवाज। कनीना एवं आस पास क्षेत्रों में अब तक 47 एमएम वर्षा होने के बाद मखमली गहरे लाल रंग के जीवों के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ गया है। इन्हें ग्रामीण लोग तीज नाम से जानते हैं। तीज के पर्व पर ये निकलने के कारण ऐसा नाम दिया गया है। ये दुर्लभ जीव वर्षा के बाद ही निकलते हैं। अब तक जुलाई में 47 एमएम वर्षा हो चुकी है तथा तीज का पर्व 15 अगस्त को मनाया जा रहा है।
क्षेत्र में वर्षा होने के बाद मखमली गहरे लाल रंग के जीव जिन्हें ग्रामीण तीज नाम से जानते हैं, काफी मात्रा में निकलने लग गए हैं। ये जीव केवल वर्षा के बाद और वो भी हरियाली तीज के नजदीक आने का संकेत देते हैं जिनके कारण इन्हें तीज नाम से जाना जाता है। इन जीवों को बच्चे पकड़कर खेलते देखे गए हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि ये केवल जुलाई एवं अगस्त माह में वर्षा के बाद दिखाई देते हैं। बाकी किसी भी वर्षा में नहीं दिखाई देते हैं। वास्तव में इनका नाम रेन बग या रेड वेल्वेट माइटस भी है।
क्या कहते हैं जीव शास्त्री-
क्षेत्र के वनस्पति शास्त्री रविंद्र कुमार का कहना है कि ये रेन बग या रेड वेल्वेट माइट्स कहलाते हैं जो नर एवं मादा अलग-अलग होते हैं। ये वर्षा में निकलते हैं और दवाओं में काम आते हैं। उन्होंने बताया कि इनका वैज्ञानिक नाम ट्रोंबिडियम स्पीशिज है।
क्या कहते हैं बच्चे-
इन जीवों को बच्चे पकड़कर अपनी ज्योमेट्री बाक्स में रख लेते हैं और विद्या को बढ़ाने वाले मानते हैं। बच्चों से बात करने पर उन्होंने बताया कि ये जीव छूने पर अच्छा महसूस कराते हैं। मिट्टी से निकलने वाले ये जीव देखने में अति मनमोहक होते हैं।
फोटो कैप्शन 01: वर्षा के बाद खेतों में निकले रेन बग।













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