Not sure how to add your code? Check our installation guidelines **KANINA KI AWAZ **कनीना की आवाज**

Wednesday, June 17, 2026



 



मोटरसाइकिल सवार को मारी टक्कर घायल, मामला दर्ज
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कनीना की आवाज।
 कनीना उप-मंडल के गांव सीहोर निवासी विकास कुमार ने कंटेनर चालक के विरुद्ध मामला दर्ज करवाया है। उन्होंने कहा है कि 6 जून 2026 को शाम के करीब 7 बजे वह अपनी मोटरसाइकिल पर सवार होकर आरपीएस स्कूल से सीहोर गांव आ रहा था क्योंकि वह आरपीएस स्कूल में कंप्यूटर आपरेटर है। जब वह कनीना छितरोली सड़क मार्ग पर आरआरसीएम स्कूल से थोड़ा आगे पहुंचा तो एक कंटेनर चालक अपने कंटेनर जिसमें पीछे मुर्गियों का जाल लगा था, बड़ी तेज रफ्तार से लापरवाही से चलाता आया और साइड में चलते हुए उनको सीधी टक्कर मार दी। जिससे वह मोटरसाइकिल सहित रोड पर गिर गया। कंटेनर चालक अपने कंटेनर को भगा ले गया। घटनास्थल पर पीडि़त के स्वजन आए। उन्होंने इलाज के लिए उन्हें महेंद्रगढ़ भर्ती करवाया और उनके पैर का आपरेशन हुआ है। अब तक वह इलाज महेंद्रगढ़ करवाता रहा है। अब उन्होंने कंटेनर चालक के विरुद्ध मामला दर्ज करवा दिया है। कनीना पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।





बाबा सुंदरपुरी की पंच धूणी तपस्या जारी
-41 दिनों तक चलेगी तपस्या
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कनीना की आवाज।
कनीना उपमंडल के गांव स्याणा के ऋषि चाउंड मंदिर परिसर में इन दिनों बाबा सुंदरपुरी महाराज  की तपस्या जारी है। 13 मई से आगामी 22 जून तक 41 दिवसीय पंच धूणी की तपस्या सुबह 10 बजकर 15 मिनट से शुरू हो कर दोपहर बाद 2 बजकर 15 मिनट तक चलती है।
 बुधवार को तपस्या का 36वां दिन था। हर रोज की तरह आज भी गांव स्याणा व पास पड़ोस के गांवों की सैकड़ों महिलाओं ने पंच धूणी की परिक्रमा दी और भजन कीर्तन करके धार्मिक आस्था को बढ़ाया। इस पावन अवसर पर महंत  श्रद्धानंद महाराज स्याणा, जगदीश काकट्यान नौताना, हंसराज मिस्त्री चिडिय़ा,जय सिंह आदमपुर ढाडी, मास्टर बिरेंद्र कैमला, कार्तिक डागर, कैलाश सांवलिया,जले सिंह, सूबेदार रोहतास डागर सहित गांव के सैकड़ों गणमान्य भक्तजनों ने सेवाएं दी और सनातन संस्कृति को जीवित रखने का भी प्रण लिया।
फोटो कैप्शन 04: स्याणा में तप करते सुंदरपुरी





 अंतरराष्ट्रीय पिकनिक दिवस
-प्रकृति की गोद में भोजन करना ही पिकनिक दिवस
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कनीना की आवाज।
पिकनिक दिवस का अर्थ प्रकृति की गोद का आनंद भोजन के संग लेना होता है। विशेष रूप से बच्चे पिकनिक मनाने के बड़े ही उत्सुक होते हैं। प्रकृति की गोद में जाकर खाना खाना पिकनिक-डे का वास्तविक अर्थ होता है।
कनीना के सुरेश कुमार बताते हैं खाना तो हर दिन बच्चे सुबह सुबह-शाम खाते हैं लेकिन प्रकृति की गोद में जाकर खाना खाए तो पिकनिक माना जाता है।
भीम सिंह बताते हैं कि अक्सर बच्चे पिकनिक के बड़े शौकीन होते हैं। जब कभी पिकनिक मनाने का वक्त आता है तो अपने-अपने घर से खाना लेकर जाते हैं परंतु आजकल पिकनिक की बजाए लोग चिडिय़ाघर या अन्य स्थानों पर घूमने के लिए अधिक जाते हैं। पिकनिक का अर्थ है प्रकृति की गोद में जाकर उसका आनंद लेना साथ में वहां बैठ कर खाना खाना।
 डाक्टर जगदीश चंद्र बसु वैज्ञानिक ने सिद्ध कर दिया था कि पेड़ पौधे सभी सजीव होते हैं। वो हमारी तरह सुख-दुख महसूस करते हैं। ऐसे में पेड़ पौधों के संग दोस्ती करना, उनके संग जीवन बिताना पिकनिक का असली आनंद लेना है। पेड़ पौधे भी अच्छा और बुरा व्यवहार करते हैं तथा इंसान से दोस्ती करते हैं। ऐसे में पेड़ पौधों को लगाना चाहिए। पेड़ पौधे अधिक लग रहे हो वो स्थल सुंदर लगता है। ऐसे स्थल पर गर्मियों में बैठने में बड़ा आनंद आता है। यही पिकनिक डे का अर्थ है।
 उधर भीम सिंह बताते हैं कि पिकनिक दिवस पर किसी जंगल में जाना चाहिए और वहां पर बैठकर बच्चों को या बड़ों को खाना खाना चाहिए ताकि हमें अपनी प्रकृति से दोस्ती करने का पता चल जाए, प्रकृति अमूल्य धरोहर है। इसके संग बैठकर अपने आप में एक विशेष आनंद आता है। प्रकृति के साथ ही आनंद लेना चाहिए।
महेश इस कुमार बोहरा, शिव कुमार,दुलीचंद साहब, रविंद्र कुमार आदि बताते हैं कि पिकनिक मनाने के पीछे बच्चों में प्रकृति के प्रति चेतना जागृत करना है। प्रकृति ही सब कुछ है बाकी इसी पर आश्रित होते हें। ऐसे में प्रकृति को साफ सुथरा रखना हम सभी का फर्ज बनता है। यदि प्रकृति हमारे साथ देगी तो हम एक दिन महान बनेंगे। यदि प्रकृति साथ नहीं देती तो इंसान मिट्टी में मिल जाएगा। ऐसा ही जैव वैज्ञानिक डार्विन ने लिखा है। अब विभिन्न स्कूलों में पिकनिक दिवस मनाने का एक महत्व होता है। अक्सर बच्चों को पिकनिक पर ले जाते हैं लेकिन पिकनिक के बजाय आजकल बच्चे मोबाइल से अधिक जुड़े मिलते हैं। पिकनिक की बजाय आजकल बच्चे मोबाइल से लग गए हैं और  मोबाइल को गले लगा रहे हैं।
फोटो कैप्शन: सुरेश कुमार एवं भीम सिंह





 सस्टेनेबल गैस्ट्रोनामी दिवस-18 जून
-किसान की मेहनत को याद करके भोजन का खाना चाहिए
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कनीना की आवाज।
 भोजन कैसे और कहां से प्राप्त होता है, भोजन को प्राप्त करके इंसान कैसा महसूस करता है। ये बातें सर्व विदित है परंतु अनाज को पैदा करके, प्रोसेस करके भोजन के रूप में उसको थाली तक पहुंचाना, यह सस्टेनेबल गैस्ट्रोनॉमी के तहत आता है। इस कार्य का केंद्र बिंदु किसान होता है। किसान के बल पर ही भोजन तैयार किया जाता है। अनाज पैदावार किया जाता 
है। अनाज की पैदावार लेने में किसान सूबे सिंह बताते हैं की सबसे कठिन कार्य अनाज की पैदावार लेना है। भूमि की जताई करके अनाज को कठिन परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है तब जाकर कहीं अनाज प्राप्त किया जाता है। किसान दिन रात खेत में लगा रहता है तब जाकर अनाज पैदावार होती है। अनाज पैदावार होने के बाद बाजार तक पहुंचाया जाता है और उसे खरीद कर खाने वाले उसे अपनी प्लेट तक भोजन के रूप में लेते हैं। किसान सुरेंद्र सिंह तथा महेंद्र सिंह बताते हैं कि अनाज की पैदावार सबसे कठिन कार्य है। सर्दी हो या गर्मी किसान अपने खेतों में जुटा रहता है और खेतों में कृषि पद्धतियों के सहारे पैदावार करता है। इसी अनाज को खाने वाले बहुत अधिक होते हैं। अनाज को खरीद कर प्रोसेस करके और उसे भोजन  के रूप प्रयोग में लेते हैं।
सुनील कुमार, रविंद्र कुमार, भीम सिंह, महेश कुमार, रामअवतार बताते हैं कि लोग भोजन को बहुत खराब कर देते हैं जबकि उन्हें यह ज्ञान में होना चाहिए भोजन बड़ी कठिनाई से किसान पैदा करते हैं और यह भोजन लंबे समय तक विभिन्न विधियों से प्रोसेस करके खाने वाले की थाली में पहुंचता है। किसान विभिन्न तकनीक अपनाते हैं ताकि अधिक से अधिक पैदावार लेने की सोचते ताकि सभी का पेट भरा जा सके। कृषि पद्धतियों की सहायता से लेकर अनाज पैदा करते हैं और बाजार में बेच देते हैं। किसान सर्दी गर्मी बारिश समय अपने खेतों में ही बिताते हैं और वही अनाज पैदा करके घर तक पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि किसान की मेहनत किसान जानता है। ऐसे में इंसान को ध्यान रखना चाहिए कि जिस अनाज के एक-एक दाने को पैदा करने के लिए किसान को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, उसे अच्छे ढंग से प्रभु का आशीर्वाद समझकर खाना चाहिए।
फोटो कैप्शन: रविंद्र, सूबे सिंह



ओवरफ्लो सीवरों से गलियों में फैली गंदगी, बदबू और बीमारी का खतरा,
-जनस्वास्थ्य विभाग पर उठे सवाल
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कनीना की आवाज।
कनीना शहर की कई गलियों में सीवर ओवरफ्लो होने की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। घरों के शौचालयों और नालियों का गंदा पानी निकालने के लिए बनाई गई सीवर व्यवस्था अब जगह-जगह जाम होने लगी है, जिसके कारण गंदा पानी सीवरों से बाहर निकलकर गलियों और आसपास के क्षेत्रों में फैल रहा है। इससे न केवल दुर्गंध का माहौल बना हुआ है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
 लोगों के अनुसार सीवरों से उठने वाली तेज बदबू घरों के अंदर तक पहुंच रही है, जिससे लोगों को सांस लेने में परेशानी हो रही है। छोटे बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों के लिए यह स्थिति और भी अधिक चिंताजनक बन गई है।
समस्या की शिकायत मिलने के बाद जनस्वास्थ्य विभाग की ओर से सफाई कर्मचारी मौके पर पहुंचे और उपलब्ध संसाधनों के साथ सफाई का प्रयास किया।
सफाई कर्मचारियों के अनुसार, कनीना में सीवरों की गहन सफाई के लिए उपयोग की जाने वाली मशीन फिलहाल खराब पड़ी हुई है, जिसके कारण जमे हुए कचरे और गाद को पूरी तरह निकालना मुश्किल हो रहा है।
लोगों का यह भी कहना है कि कुछ क्षेत्रों में गंदा पानी वापस रिहायशी इलाकों और घरों की ओर आने लगा है, जिससे लोगों की परेशानी और बढ़ गई है। पिछले कुछ समय से मौसम का मिजाज लगातार बदल रहा है। कभी तेज गर्मी, कभी बादल छा जाते हैं और कभी अचानक वर्षा शुरू हो जाती है। लोगों का कहना है कि जब भी अचानक बारिश होती है तो शहर के कई हिस्सों में पानी जमा होने लगता है, जिससे पहले से दबाव झेल रही सीवर व्यवस्था पर अतिरिक्त भार पड़ता है।
क्षेत्रवासियों का मानना है कि यदि वर्षा के मौसम से पहले सीवर लाइनों की नियमित सफाई, खराब मशीनों की मरम्मत और जल निकासी व्यवस्था की समीक्षा कर ली जाए तो ऐसी समस्याओं को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
मामले को लेकर जनस्वास्थ्य विभाग के एसडीओ श्री राजीव कुमार यादव से संपर्क करने का प्रयास किया। जई से संपर्क करना चाहा तो उन्होंने भी फोन नहीं उठाया।
लोगों की मांग है कि प्रभावित क्षेत्रों में फागिंग, कीटनाशक छिड़काव और विशेष स्वच्छता अभियान चलाया जाए। वर्षा के मौसम को देखते हुए जल निकासी और सीवर व्यवस्था की विशेष समीक्षा की जाए।
फोटो कैप्शन एक व दो: सीवर लाइन का ओवरफ्लो




जन्म दिवस पर दिए 11000 दान,खिलाया गायों को हरा चारा
- गोशाला में आए दिन दान दाताओं का लगा रहता है तांता।
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कनीना की आवाज।
श्रीकृष्ण गोशाला कनीना में सतीश गेरा ने अपनी पुत्री पूजा का जन्म दिवस मनाया। उन्होंने गायों को हरा चारा खिलाया और 11000 रुपए की राशि गोशाला को दान दी।
प्रधान भगत सिंह ने कहा कि हिन्दू धर्म में गाय को माता के समान दर्जा दिया गया है और सबसे पवित्र माना है। उन्होंने बताया कि प्राचीन समय में भारत वर्ष में हर घर में गाय पाली जाती थी। जिस से सारा आंगन महकता रहता था। अब एक बार फिर से गायों को घर घर पालने की जरूरत है। इस अवसर पर गौशाला प्रधान भगत सिंह,पूर्व पार्षद राजेंद्र सिंह, जय प्रकाश, अमीर सिंह आदि मौजूद रहे।
फोटो कैप्शन 03: कनीना गोशाला में जन्म दिन मनाते हुए























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