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Monday, February 16, 2026



 



दो बड़े मेलों की हो रही है तैयारियां
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कनीना की आवाज।
अपार भीड़ जुटती है। वही इन मेलों की तैयारियां जोरों पर चल रही है।
27 फरवरी को कनीना का प्रदेश भर में विख्यात संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ का मेला भरने जा रहा है। संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ को बालक नाथ, ओघड़ बाबा नाम से जाना जाता है वही कनीनावासी खेड़ा वाला नाम से भी जानते हैं। कनीना का कुल गुरु बाबा मोलडऩाथ  है। बस स्टैंड के पास भरने वाले मेले की तैयारियां चल रही है। रंग रोगन किया जा रहा है। इस मेले में पूरे ही कस्बा के लोग शक्कर का प्रसाद अर्पित करते हैं ऊंट और घोडिय़ों की दौड़ पूरे प्रदेश में विख्यात है। विक्रमी संवत 2006 में संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ ने सिरसवाला जोहड़ में समाधि लगाई थी और वे स्वस्थ होकर  समाधिस्थ तो गए थे। उनकी याद में हर वर्ष यहां भारी भीड़ जुटती है और मेला लगता है। अब तो कनीना का बाबा मोलडऩाथ आश्रम श्रद्धा एवं भक्ति का आश्रम बन गया है। इसके आसपास कम से कम एक दर्जन अन्य मंदिर स्थापित हो गए हैं जिसके चलते यह दर्शनीय स्थल भी बन गया है। इसी स्थान पर 14 मार्च को शक्कर मेला लगने जा रहा है। कबड्डी तथा ऊंट घोड़ों की दौड़ के अलावा यहां दंगल भी आयोजित होते हैं। यह मेला कनीना के पूर्वजों ने चलाया था जो आज भी चला आ रहा है।
खाटू श्याम मेला-
20 फरवरी से 4 मार्च तक जहां जैतपुर एवं खाटू श्याम (राजस्थान) के विशाल मेला लगने जा रहे हैं जिनको लेकर कनीना ही नहीं अपितु आसपास गांव में शिविर लगाने की तैयारियां चल रही हैं। खाटू श्याम तथा जैतपुर धाम पर भक्त पदयात्रा करते हुए निशान अर्पित करने जाते हैं। दोनों ही स्थानों पर एकादशी एवं द्वादशी के दिन यहां अपार भीड़ जुटती है। जहां खाटू श्याम मेला पूरे ही देशभर में विख्यात है वही जैतपुरा जयपुर स्थित खाटू श्याम मेला भी दूर दराज तक प्रसिद्ध है। कनीना के कई दल इन दोनों ही मेलों में जाकर निशान अर्पित करते हैं। कई वर्षों से निशान अर्पित करने वाले अनिल कुमार का कहना है कि यह दोनों धाम पूरे ही देश नहीं बल्कि विदेशों तक जाने जाते हैं। खाटू श्याम वास्तव में बरबरी का नाम था जो पांडवों में भीम के पौत्र थे। महज तीन बाणों से युद्ध करने के लिए महाभारत युद्ध में पहुंचे थे इसलिए उन्हें तीन बाण धारी तथा नीले घोड़े का सवारी करने वाला नाम से जाना जाता है। कलयुग के श्रीकृष्ण अर्थात श्याम बरबरीक को ही जाना जाता है। धाम पर जहां मेले के लिए विभिन्न गांव से भक्तजन पद यात्रा करने की तैयारियों में जुट गए हैं तथा भक्त रवाना होने लगे हैं।
फोटो कैप्शन 06: खाटूश्याम मुख्य गेट






जिला में बोर्ड परीक्षाओं के दौरान परीक्षा केंद्रों  
--परीक्षा 17 फरवरी से 12 अप्रैल तक जारी रहेंगी
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कनीना की आवाज।
जिलाधीश कैप्टन मनोज कुमार ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 के तहत जिले में होने वाली बोर्ड परीक्षाओं को सुरक्षित और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए निषेधाज्ञा जारी की है।
यह आदेश केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। ये परीक्षा 17 फरवरी से 12 अप्रैल तक जारी रहेंगी।
आदेशों के अनुसार जिले के सभी परीक्षा केंद्रों के 500 मीटर के दायरे में किसी भी प्रकार का हथियार ले जाना पूरी तरह वर्जित है। परीक्षा के दौरान केंद्रों के पास स्थित सभी फोटोकापी की मशीनें और कोचिंग संस्थान बंद रहेंगे।
इसके अलावा बिना वैध पहचान पत्र के किसी भी अनधिकृत व्यक्ति को परीक्षा केंद्र में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी।
यह पाबंदियां पुलिस और सरकारी ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों पर लागू नहीं होंगी। इन आदेशों का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
उन्होंने बताया कि जिला प्रशासन का मुख्य उद्देश्य परीक्षाओं को बिना किसी बाधा, फर्जी खबरों या अनुचित साधनों के पूरी पारदर्शिता के साथ संपन्न कराना है।
 सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलने वालों पर रहेगी कड़ी नजर--
हरियाणा सरकार के निर्देशानुसार जिला प्रशासन महेंद्रगढ़ आगामी 17 फरवरी से शुरू होने वाली केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं को लेकर पूरी तरह मुस्तैद हो गया है। उपायुक्त कैप्टन मनोज कुमार की ओर से जारी आदेशों के तहत जिले में निष्पक्ष, शांतिपूर्ण और नकल रहित परीक्षा सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों को विशेष जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं।
उपायुक्त ने स्पष्ट किया है कि परीक्षा केंद्रों के आसपास कानून-व्यवस्था बनाए रखना और यातायात का सुगम संचालन प्रशासन की प्राथमिकता रहेगी, जिसके लिए पुलिस अधीक्षक को पर्याप्त पुलिस बल और ट्रैफिक कर्मियों की तैनाती के निर्देश दिए गए हैं। परीक्षाओं की पवित्रता बनाए रखने के लिए जिला प्रशासन ने सख्त कदम उठाते हुए परीक्षा केंद्रों के 500 मीटर के दायरे में फोटोस्टेट की दुकानों और कोचिंग सेंटरों पर प्रतिबंध लगाने के आदेश जारी किए हैं। इसके साथ ही सक्षम अधिकारियों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत आवश्यक प्रतिबंधात्मक आदेश जारी करने के लिए भी निर्देशित किया गया है।
छात्रों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए, दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम को परीक्षा के दौरान सुबह 10 बजे से दोपहर 01:30 बजे तक निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने को कहा गया है।
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों और परीक्षा में गड़बड़ी करने वाले असामाजिक तत्वों पर पैनी नजर रखने के लिए खुफिया तंत्र और स्थानीय प्रशासन को अलर्ट पर रखा गया है।
इसके अलावा, जिला शिक्षा अधिकारी को विशेष रूप से सेल्फ सेंटरों की निगरानी करने और परीक्षा केंद्रों की गोपनीयता बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई है, ताकि छात्र बिना किसी मानसिक दबाव के अपनी परीक्षाएं दे सकें।





 किसानों की प्रमुख तिलहन फसल बन गई है-सरसों
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कनीना की आवाज।
दक्षिण हरियाणा की सूखी भूमि और जल संसाधनों की कमी के चलते किसानों की अपार मेहनत उनके लिए वरदान बनती जा रही है। सूखे एवं राजस्थान की सीमा से सटे इस रेतीले क्षेत्र में रबी की फसल के रूप में सरसों का नाम उभरकर आ गया है। तिलहन जाति की यह फसल अब किसानों के रोम-रोम में बस गई है। किसान के खाने में भी सरसों का तेल ही होता है वहीं खेतों में भी प्रमुख फसल सरसों बनकर किसानों को खुशहाली की ओर ले जा रही है।
   दक्षिणी हरियाणा में किसानों ने समय-समय पर फसलों में भारी बदलाव किया है। एक वक्त था(करीब 20 वर्ष पहले) जब किसान दलहन जाति की फसल चना उगाने में बहुत उत्साह दिखाता था किंतु अब समय के साथ-साथ चने उगाना ही भूल गया है। उस वक्त रबी की फसल के रूप में चने को इतना महत्व दिया जाता था कि अन्न के रूप में भी चने का उपयोग करता था और चने के चारे को किसान अपने पशुओं के लिए प्रयोग करता था। घरों में विवाह शादी के वक्त भी चना काम में लाया जाता था किंतु अब चने को भूला दिया गया है। आज हालात यह है कि चने की खेती करने वाला किसान भी विवाह शादी के लिए कहीं से खरीदकर चने लाता है। उसके पास चने की खेती नहीं होती है।
  किसान ने धीरे-धीरे चने की खेती का त्याग कर दिया क्योंकि चने की खेती किसान के लिए बेहतर साबित नहीं हो रही थी। उसे तेल आदि को बाजार से खरीदकर लाना पड़ता था। ऐसे में किसान का ध्यान तिलहन जाति की फसल सरसों उगाने की ओर गया और धीरे-धीरे सरसों उगानी शुरू कर दी है। किसान के लिए फिर तो सरसों एक अहं फसल बनकर रह गई। यूं तो किसान ने गेहूं, जौ, ज्वार, मक्का, कपास आदि फसलों पर प्रयोग किया किंतु सभी बेकार साबित हो गई। उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाई वहीं किसान अपने एवं अपने परिवार का पेट पालने के लिए सरसों की फसल की ओर आकर्षित हुआ जो उसके लिए वरदान साबित हुई।
   किसानों का सरसों की फसल के प्रति इतना गहरा रुझान हुआ कि अब तो सरसों सुख दु:ख का साथी ही बन गई है। किसान सरसों की फसल उगाकर खुशहाल बनता जा रहा है। किसान खरीफ की फसल के रूप में बाजरा एवं ग्वार उगाता है जो पशु चारे के रूप में जाने जाते हैं। रबी फसल के रूप में गेहूं अपने खाने के लिए उगाया जाता है जबकि सरसों न केवल घर में तेल के लिए अपितु खुशहाली लाने के अलावा ईंधन के रूप में भी काम में लाई जा रही है।
 सरसों फसल पर किसान को अधिक ध्यान देने की जरूरत भी नहीं है और पैदावार भी बेहतर देती है। किसान करीब छह माह में सरसों की फसल पैदावार अपने घर में डाल लेता है। किसान सरसों का तेल अपने घर की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयोग करता है। पहले किसान तेल खरीदकर लाता था और अब वो तेल अपनी फसल पैदावार से ही लेने लग गया है। जब तेल निकलवाता है तो एक ओर जहां तेल मीलों की संख्या में इजाफा हो गया है वहीं तेल किलवाते वक्त पशु चारा भी उपलब्ध हो जाता है। खल नामक यह बेहतर पशु चारा पैदा होता है। किसान को सरसों उगाकर एक लाभ और भी हो गया है कि सरसों की पदाड़ी के बदले खेत की फसल कटाई का काम करवाता है वहीं सरसों के धांसे बेहतर ईंधन का काम करते हैं। किसान अपने खेत के धांसों को काटकर अपने खेत में डाल लेता है और उन्हें वर्ष भर काम में लेता है।
    किसान को अपने खेत में सरसों उगाकर न केवल अपना अपितु अपने परिवार का पालन पोषण करना होता है। किसान के सामने आज के दिन सरसों से बेहतर कोई फसल नहीं है। किसान को सरसों उगाने में लागत भी कम लगानी पड़ती है। यही कारण है कि किसान प्रसन्न है। किसान आज अगर किसी क्षेत्र में होड़ कर रहा है तो अधिक से अधिक सरसों उगाने की कर रहा है। सरसों के भाव भी बेहतर होने के कारण किसान की आर्थिक स्थिति भी मजबूत बनती जा रही है।
   किसान ने जब सरसों उगानी शुरू की तो खेत में सरसों की पदाड़ी को यूं ही बेकार समझकर फेंकना होत था और आज पदाड़ी की इतनी मांग बढ़ गई है कि खेत से सरसों की पैदावार को बाद में उठाता है उससे पहले पदाड़ी को उठाकर घर में डालता है या फिर उसे बेच देता है। किसान के पास ईंट  भट्ठा






संचालक इस पदाड़ी को लेने के लिए आने लगे हैं। अब किसान को सरसों की कटाई, थ्रेसिंग एवं खेत से पैदावार को घर तक डलवाने का खर्चा सरसों के धांसों एवं पदाड़ी से ही प्राप्त होने लगा है। ऐसे में किसान की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होने लगा है।
   किसानों द्वारा सरसों उगाने का एक लाभ पशुओं का चारा भी सुलभ होना है। किसान अक्सर पशु पालते हैं जिनके लिए हरे चारे की जरूरत होती है और हरा चारा सरसों के पत्तों से मिल सकता है। किसानों के खेतों में सरसों उगाने से खेत की उर्वरा शक्ति भी बढ़ जाती है। सरसों के पत्ते एवं पौधे की जड़े भूमि के अंदर रहने से खाद की पूर्ति हो जाती है और भावी फसल के लिए लाभ होता है। ग्रामीण परिवेश का किसान ईंधन के लिए परेशान रहता है और उसे सरसों के धांसों से ईंधन प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार सरसों एक नहीं अपितु कई लाभ मिल जाते हैं।



प्रदेशभर में विख्यात है बाबा मोलडऩाथ
-डा. होशियार सिंह की प्रकाशित हो चुकी हैं बाबा पर 6 पुस्तकें                         
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कनीना की आवाज।
 संत, तपस्वी, गुणों की खान, चमत्कारी एवं संत शिरोमणि बाबा मोलडऩाथ की याद में जिला महेंद्रगढ़ के कनीना कस्बा में प्रत्येक वर्ष फाल्गुन शुक्ल एकादशी को महान धार्मिक मेला भरने जा रहा है। बाबा आश्रम के कारण कनीना एक दर्शनीय स्थल के रूप में उभरता जा रहा है।
    जिला महेंद्रगढ़ एवं रेवाड़ी की सीमा पर बसे करीब 850 वर्ष पुराने कनीना कस्बा को कान्हा की नगरी के रूप में जाना जाता है। इस नगरी के सामान्य बस स्टैंड के पास बाबा मोलडऩाथ आश्रम स्थित है। महान तपस्वी बाबा मोलडऩाथ की याद में बनवाए गए आश्रम पर प्रत्येक वर्ष फाल्गुन शुक्ल एकादशी को उनकी स्मृति में मेला लगता है। इस मेले में प्रदेशभर से श्रद्धालु आते हैं। शक्कर का प्रसाद चढ़ाया जाता है इसलिए यह मेला शक्कर मेला नाम से भी प्रसिद्ध है। इस मेले में आज भी राजा महाराजाओं के समय के मनोरंजन की पुरानी परम्पराएं चली आ रही हैं जिनमें ऊंटों की दौड़, दंगल, कबड्डी, घोडिय़ों की दौड़ प्रसिद्ध हैं। बाबा का मंदिर एवं आश्रम प्रशासन द्वारा लांच किए वेबसाइट पर भी उपलब्ध करवा रखे हैं। होली के पर्व के पास हर वर्ष मेला लगता है। अब तो रोड़वाल राजस्थान में भी मोलडऩाथ मंदिर निर्मित किया है जहां हर वर्षा मेला लगता है।
   बाबा मोलडऩाथ जिन्हें बालकनाथ नाम से भी जाना जाता है अपने बाल रूप में बिरही से यहां आए। यूं तो बाबा मोलडऩाथ कनीना में ही नहीं अपितु मांदी, कांवी भोजावास, रोड़वाल, मानसरोवर, नीमराणा आदि स्थानों पर भी रहे और वहां भी तप किया किंतु उनका प्रमुख स्थल कनीना में ही है। बाबा को देखने वाले कितने ही जन आज भी कनीना व आस पास गांवों में जीवित हैं। बाबा के गुणों एवं चमत्कारों को याद करके अति प्रसन्न हो जाते हैं।
   बाबा ने कनीना में आकर यहां की बणी(जंगल) में स्थित एक जाल को ही अपना तप स्थल बनाया। जब से उन्होंने कनीना में तप करना शुरू किया तभी से किसी प्रकार की कोई आपदा नहीं आई और ओलावृष्टिï एवं हैजे जैसे रोग को तो भगाने की उनमें अपार शक्ति थी। यही कारण हे कि उनके समय तो दूर आज भी जब कभी कनीना में ओलावृष्टिï होती हे तो लोग बाबा का ही नाम लेते हैं और देखते ही देखते ओलावृष्टिï बंद हो जाती है। बाल तपस्वी बाबा रहमदिली संत थे। उनके आश्रम के पास अनेकों जीव जिनमें मोर, गीदड़ और अनेकों प्रकार की चिडिय़ां मिलती थी। बाबा को मिलने वाले खाने में से अधिकांश भाग उन जीवों को दिया जाता था।
  बाबा मोलडऩाथ में जल पर समाधि लेने का अद्भुत गुण भी था। जब कभी उनको जल में तप करना होता तो पास में बाबा के जोहड़ में ही वे बैठ जाते और घंटों तप करते थे। अधिक समय तक जल में तप करने से उन्हें ठंड लग गई और उनका स्वास्थ्य बिगडऩे लगा। विक्रमी संवत 2006 फाल्गुन शुक्ल एकादशी को उन्होंने चोला त्याग दिया। जिस स्थान पर उन्होंने चोला त्यागा उसी स्थान पर बाबा को समाधि दी गई। आज बाबा की समाधि पर कनीना के समाजसेवी भीम सिंह द्वारा निर्मित करवाई हुई उनकी प्रतिमा शोभा बढ़ा रही है और उनके जीवन एवं चरित्र पर कनीना के ही लेखक डा. होशियार सिंह यादव द्वारा चार पुस्तकें प्रकाशित करवाई गई है जिनमें से एक आइएसबीएन नंबर की है वहीं एक कैलेंडर, आरतियां एवं बाबा चालीसा भी प्रकाशित करवाया है। डा. होशियार सिंह के पिता स्व. जयनारायण एवं माता मिश्री देवी भी बाबा के प्रमुख भक्तों में से थे।
   मेले से पूर्व रात्रि को बाबा आश्रम पर शब्द कीर्तन का आगाज होता है। वर्ष 1972 में कनीना के समाजसेवी स्व. डा. मेहरचंद द्वारा बाबा के नाम पर सत्संग मंडली बनाई  जो आज भी बाबा के नाम को चार चांद लगा रही है। सत्संग मंडली में मेहरचंद आजीवन अपना योगदान दे रहे हैं और स्वर्गवासी हो चुके हैं। मेले के प्रमुख दिन सुबह सवेरे से ही बाबा के आश्रम में लोगों और भक्तों का तांता लग जाता है। दूर दराज से लोग शक्कर का प्रसाद लाकर बाबा के धूने व बाबा की समाधि पर चढ़ाते हैं और मन्नतें मांगते हैं। माना जाता हैे की उनकी मन्नतें पूरी होती हैं। बाबा के आश्रम पर सबसे अधिक भीड़ महिलाओं की होती है। प्रसाद के रूप में प्राप्त शक्कर को बोरों में भरकर गायों को खिला दिया जाता है। अपार जनसमूह उमड़ पड़ता है। बाबा आश्रम में शक्कर का प्रसाद उसी वक्त से चढ़ाया जा रहा हे जब से बाबा का मेला भरता आ रहा है।
  उधर बाबा के मेले के दिन ही सुबह सवेरे थाना परिसर के पास भीड़ जुटने लग जाती है। दूसरे राज्यों से आने वाले घोड़ी दौड़ व ऊंट दौड़ के प्रतिभागी अपना जौहर दिखाते हैं और प्रथम तीन स्थान पाने वाले प्रतिभागियों को बड़ा ईनाम भी दिया जाता है। कबड्डी एवं दंगल भी शाम तक चलते हैं। शाम को पुन: बाबा के स्थल पर शब्द कीर्तनों का आगाज होता है। अगली सुबह दूर दराज से आए साधु संतों को आदर सहित विदा किया जाता है। दूर दराज से आने वाले साधु संतों एवं श्रद्धालुओं के ठहरने व भोजन का भी उचित प्रबंध किया जाता है। इस मेले का सबसे बड़ा आकर्षण वैसे तो शक्कर का ही प्रसाद है किंतु शक्कर को बांटने के लिए आने वाले श्रद्धालु बाबा के नाम पर पास से ही मिट्टïी छांटते हैं और जय बाबा की पुकारते हैं।
 बाबा स्थल को चार चांद लगाने के लिए बाबा के स्थल के पास ही अनेकों धार्मिक स्थलों का निर्माण होता जा रहा है। बाबा के आश्रम के पास ही 21 फुट ऊंची शिव प्रतिमा वाला शिवालय स्थित है। इस शिवालय का निर्माण शिवभक्त भरपूर सिंह निर्बाण ने निर्मित करवाया है जो हरिद्वार से 14 कावड़ लाकर शिवालय बाघोत में चढ़ा चुके हैं।  शिवरात्रि के दिन यहां तांता लगता है। शिव मंदिर के पास ही पेयजल टंकी बनी हुई है। पास में सीताराम मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। सीताराम मंदिर के पास ही राधाकृष्ण का मंदिर बना हुआ है। बाबा आश्रम के पीछे सती समाधि भी बनी हुई है। पास में पानी से भरा जोहड़ है जहां कभी बाबा जल समाधि लेते थे।  कभी गंदा पानी भरा होता था किंतु विगत वर्षों से इसमें साफ पानी और पक्का तालाब बनाया हुआ है। पास में खाटू श्याम मंदिर भी मन मोह लेता है।
   बाबा आश्रम के नीचे वर्तमान में प्रकटीनाथ का आश्रम बना हुआ है जो बाबा के एक कमरे के निर्माण के वक्त प्रकट हुए थे। एक सुंदर गुफा का भी निर्माण ओमप्रकाश सत्संगी के प्रयासों से करवाया गया। बाबा के पास ही बाबा डूंगरमल की समाधि, खागड़ आश्रम, मंगलदेव की कुटिया, शहीद सुजान सिंह पार्क, बाबा हनुमान की 11 फुट ऊंची प्रतिमा वाला मंदिर, बाबा हनुमान का पुराना मंदिर, बाबा भैया स्थल, शनिदेव मंदिर, मां मंदिर, माता स्थल बने हुए हैं जहां समय-समय पर लोगों का तांता लगा रहता है। बाबा आश्रम के पास ही बस स्टैंड का होना भी अहं भूमिका निभा रहा है। वर्तमान में बाबा आश्रम का नवीनीकरण किया गया है।


राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, कनीना मंडी में
-राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के लिए निकली रैली
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कनीना की आवाज।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत आज राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, कनीना मंडी में मोटे अनाजों के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से एक प्रभावशाली जागरूकता रैली का आयोजन किया गया। रैली को विद्यालय के प्राचार्य नरेश कुमार कौशिक ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह रैली कनीना मंडी तथा रेलवे रोड के विभिन्न मार्गों से होकर गुजरी और आमजन को मोटे अनाजों के महत्व का संदेश दिया।
इस अवसर पर ब्लाक टेक्निकल आफिसर डा. मनीषा यादव एवं सहायक तकनीकी मैनेजर अरविंद यादव विशेष रूप से उपस्थित रहे।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डा. मनीषा यादव ने कहा कि वर्तमान समय में स्वस्थ जीवन के लिए मोटे अनाज अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने बताया कि अत्यधिक गेहूं एवं चावल के सेवन से शुगर तथा अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है, जबकि चना, मक्का, बाजरा, ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाज पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं और शरीर को आवश्यक ऊर्जा एवं रोग-प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों एवं आमजन से आह्वान किया कि वे अपने दैनिक आहार में मोटे अनाजों को शामिल कर बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में कदम बढ़ाएं।
इस अवसर पर विभाग की ओर से बाजरे एवं मक्का से बने पौष्टिक व्यंजन विद्यार्थियों को वितरित किए गए, जिन्हें बच्चों ने उत्साहपूर्वक ग्रहण किया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ अध्यापक ओमप्रकाश, नरेन्द्र कुमार, राकेश कुमार, माया देवी सहित 100 से अधिक विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई।
यह जागरूकता रैली स्वास्थ्य के प्रति सजगता बढ़ाने एवं संतुलित, पौष्टिक आहार अपनाने के संदेश के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
फोटो कैप्शन 01: जागरूकता रैली निकालते हुए

शतरंज प्रतियोगिता आयोजित की गई

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कनीना की आवाज। लिसान गांव में टाइगर शतरंज क्लब के तत्वावधान में शतरंज प्रतियोगिता आयोजित की गई। मुख्य अतिथि प्रमुख समाजसेवी अतरलाल ने विजेता प्रतिभागियों को पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया। प्रतियोगिता का शुभारम्भ नगरपालिका कनीना की प्रधान रिम्पी ने किया। प्रतियोगिता में 18 टीमों ने भाग लिया। सीनियर वर्ग में दादरी के हिमांशु विजेता तथा लिसान के शीशराम उपविजेता रहे। जूनियर वर्ग में अर्जुन सैदपुर प्रथम तथा गुडियानी की लक्ष्या कुमारी द्वितीय रही। अतरलाल ने विजेता प्रतिभागियों को स्मृति चिह्न व नगद इनाम प्रदान किए। प्रतियोगिता स्थल पर पहुंचने पर मुख्य अतिथि अतरलाल का स्मृति चिह्न प्रदान कर स्वागत किया गया। टाइगर शतरंज क्लब के प्रधान ब्रहमप्रकाश, जयप्रकाश नम्बरदार, धर्मवीर पंच, रमेश शर्मा प्रवक्ता, महिपाल पंच, राजेन्द्र सांखला, सुनिल, कर्मबीर फौजी, विक्रम प्रजापतआदि उपस्थित रहे।
फोटो कैप्शन 02: विजेता प्रतिभागियों को पुरस्कार वितरित करते हुए


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