नौसेना के जवान का किया पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार
-21 वर्षों से थे सेवारत
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कनीना। कनीना उपमंडल के गांव खेड़ी तलवाना के भारतीय नौसेना में कार्यरत जवान ओमपाल सिंह का पार्थिव शरीर सोमवार को पैतृक गांव पहुंचा। जवान का पूरे सैनिक सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। 39 वर्षीय ओमपाल सिंह पिछले 21 वर्षों से भारतीय नौसेना में कार्यरत थे। ओमपाल सिंह वर्तमान में मुंबई में सेवारत थे। पिछले कुछ समय से कैंसर से पीडि़त थे। इस विषय में मुंबई से आए नौसेना अधिकारी जितेंद्र कुमार ने बताया कि ओमपाल सिंह अप्रैल में घर आए थे। छुट्टी काटकर जाने के बाद उन्हें क्वारेंटाइन किया गया था। इसके बाद उनकी तबीयत लगातार खराब रही। उन्होंने बताया कि 27 नवंबर को जवान ने अंतिम सांस लिया। जवान ओमपाल सिंह भारतीय नौसेना में गनर इंस्ट्रक्टर के पद पर कार्यरत थे। गांव में पहुंचने पर जवान के पार्थिव शरीर का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। इसे पहले गांव पहुंचने पर युवाओं ने सैकड़ों की संख्या में बाइकों पर सवार होकर बाइक रैली निकाली। जवान के पार्थिव शरीर को एक फूलों से सजा कर खुले वाहन में रखकर गांव में परिक्रमा की गई। गांव में बड़ी संख्या में लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़े। नौसेना की तरफ से दिल्ली से आई टुकड़ी ने सैनिक सम्मान के साथ पुष्प चक्र अर्पित कर शस्त्र सलामी दी। प्रशासन की तरफ से नायब तहसीलदार ने उन्हें पुष्प चक्र अर्पित कर श्रद्धा सुमन अर्पित किए।
फोटो कैप्शन 7: नौसेना के अधिकारी सैनिक ओमपाल के शव पर पुष्प अर्पित करते हुए।
आदर्श गांव दौंगड़ा अहीर में खेल महाकुंभ का हुआ समापन
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कनीना। । अमीलाल टूर्नामेंट का समापन सामाजिक न्याय मंत्री ओम प्रकाश यादव ने किया।
संवाद सहयोगी,कनीना। क्षेत्र के खेल महाकुंभ का समापन सामाजिक न्याय मंत्री ओमप्रकाश यादव ने किया। यंग फार्मर क्लब दौंगड़ा अहीर के इंजीनियर अशोक यादव ने बताया की 2 दिन चले इस महा खेल महाकुंभ में हरियाणा, दिल्ली, पंजाब तक के खिलाडिय़ों ने हिस्सा लिया तथा क्षेत्र के लोगों ने काफी मनोरंजन किया। जहां पर दूर-दूर से आई कबड्डी की टीमों ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।कुश्ती में भी दूर-दूर के पहलवानों ने आकर इस खेल महाकुंभ शोभा बढ़ाई कबड्डी प्रतियोगिता के फाइनल मैच में राजीव गांधी खेल स्टेडियम रोहतक ने बापोड़ा भिवानी को हराकर पहला स्थान प्राप्त किया। पहले स्थान पर रहने वाले टीम को 51000 रुपये तथा दूसरे स्थान पर रहने वाली टीम को 31000 रुपये का इनाम मिला तथा जीतपुरा तथा पाई को संयुक्त रूप से तीसरा स्थान मिला । वही वालीबाल प्रतियोगिता में पहले स्थान पर नजफगढ़ की टीम रही है जिस को 31000 रुपये इनाम मिले वही दूसरा स्थान बहादुरगढ़ की टीम वही जिसको इनाम स्वरूप 21000 रुपये मिले। 31 हजार रुपए की कुश्ती पहलवान संजय कुमार दिल्ली ने जीती। वही इस खेल महाकुंभ में मंत्री ओमप्रकाश यादव के पहुंचने पर ग्राम वासियों की तरफ से वेद प्रकाश आर्य तथा निवर्तमान सरपंच होशियार सिंह ने मंत्री ओम प्रकाश यादव का स्वागत किया। वेदप्रकाश आर्य ने गांव की प्रमुख मांगो को मंत्री के सामने रखा। मंत्री ओमप्रकाश यादव ने कहा की युवा अधिक से अधिक खेल खेलें और योग करें। उन्होंने कहा कि सभी मांगों को वो जल्द से जल्द पूरा करेंगे।
इस अवसर पर जेजेपी के वरिष्ठ नेता कुंवर सिंह कलवाडी ,कर्ण सिंह पहलवान,मामन सिंह,वीर सिंह, अमरजीत, दिनेश पंच, इंजी.अशोक,रवि यादव, विकाश,नरेंद्र, बलजीत, रमेश कोबरा महिपाल मास्टर और समस्त ग्रामीण उपस्थित थे।
फोटो कैप्शन 11 से 13: दौंगड़ा खेलों से संबंधित हैं
चुनौतीपूर्ण स्थितियों का सामना करने के लिए जरूरी है जीवन कौशल शिक्षा-सूर्यकांत
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कनीना। उम्मीद काउंसलिंग सेंटर डाइट महेंद्रगढ़ के मनोवैज्ञानिक सूर्यकांत यादव का कहना है कि आज के इस भौतिकवादी युग में अधिकांश निजी विद्यालयों का फोकस बच्चे की बौद्धिक क्षमता बढ़ाने पर होता है। लगभग सभी विद्यालयों में एक निश्चित या बंधे हुए पाठ्यक्रम की शिक्षा दी जाती है और उसी पाठ्यक्रम के आधार पर बच्चे का मूल्यांकन किया जाता है। इतना ही नहीं अभिभावक तथा शिक्षक भी उस निश्चित पाठ्यक्रम को आधार मानकर बौद्धिक क्षमता या बुद्धि लब्धि बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।अभिभावक व विद्यालय प्रबंधन चाहता है कि हमारा बच्चा अपनी बौद्धिक क्षमता का उपयोग कर कक्षा में अधिकाधिक नम्बर प्राप्त कर जीवन की ऊंचाइयों को छुए। लेकिन बौद्धिक विकास के साथ-साथ भावनात्मक बुद्धि का विकास भी जरूरी होता है जो छात्रों के व्यवहारिक जीवन के लिए बहुत आवश्यक है। अब शिक्षकों के लिए यह जरूरी है कि छात्रों का मूल्यांकन एक निश्चित व बंधे हुए पाठ्यक्रम के आधार पर करने की बजाय सम्पूर्ण व्यक्तित्व को आधार बनाकर किया जाना चाहिए तथा बच्चों की अभिरुचि को समझकर उनकी कार्यकुशलता को विकसित किया जाना चाहिए।
अभिभावक तथा शिक्षकों को यह भली भांति जान लेना चाहिए कि छात्रों के लिए उचित निर्णय लेने,समस्याओं को सुलझाने,गंभीर और सृजनात्मक तरीके से सोचने,प्रभावी ढंग से संवाद करने,स्वस्थ संबंध बनाने, दूसरों के साथ सहानुभूति रखने और स्वस्थ तथा प्रभावी ढंग से अपने जीवन का प्रबंधन करने के लिए एवं चुनौतीपूर्ण स्थितियों का सामना करने के लिए जीवन कौशल शिक्षा बहुत ही आवश्यक है।
असल में बच्चे कोमल मिट्टी के समान होते हैं। इन्हें जैसा आकार दिया जाता है उसी रूप में ढल जाते हैं। बचपन में बताई गई बातें और आसपास के परिवेश से जो कुछ सीखने को मिलता है उसी के अनुरूप उनके व्यक्तित्व का निर्माण होता है। ऐसे में शिक्षकों की भूमिका और कर्त्तव्य बन जाता है कि वे अपने छात्र-छात्राओं को जीवन कौशलों की शिक्षा देकर उनमें एक स्वस्थ जीवनशैली विकसित करें।
दरअसल छात्र जीवन में अनेक शारीरिक व मनोसामाजिक परिवर्तन बड़े तीव्र गति से होते हैं। छात्रों के समक्ष आत्म- छवि बनाने,भावनाओं को प्रबंधित करने,सामाजिक कौशलों को मजबूत करने और आपसी दबाव से निपटने या विरोध करने से संबंधित कई मुद्दे और चिंताएं होती हैं। छात्र संवेदनशील होने के कारण अनेक जोखिम भरी स्थितियों से घिर जाते हैं और इन जोखिम पूर्ण स्थितियों से कैसे निपटा जाए यह निर्भर करता है उनकी जीवन कौशल शिक्षा पर। इसी दिशा में शिक्षा निदेशालय पंचकूला द्वारा यह महसूस किया गया कि छात्रों के पास ऐसे अनेक मुद्दे और प्रश्न थे जिन्हें केवल प्रशिक्षित परामर्शदाताओं और पेशेवर मनोवैज्ञानिकों द्वारा ही संभाला जा सकता था। इसीलिए शिक्षा विभाग द्वारा विभिन्न जिलों में उम्मीद कॉउंसलिंग सेंटरों को स्थापित कर छात्रों व शिक्षकों के अनेक मनोवैज्ञानिक पहलुओं और मुद्दों को सुलझाने की पहल की गई।
फोटो कैप्शन: सूर्यकांत
खत्म कर दी है बुर्जी और सेहदा
-लाल पत्थर भी इक्का-दुक्का नजर आता है
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कनीना। 1962 में चकबंदी के समय हर 5 एकड़ एवं 10 एकड़ पर स्थापित किए गए लाल पत्थर, दो गांवों की सीमा पर स्थापित बुर्जी, तीन गांवों की सीमा पर स्थापित सेहदा धीरे-धीरे किसानों ने खत्म कर दिया। अब जब पैमाइश होती है तो इनके अभाव में भारी परेशानी उठानी पड़ती है। कभी-कभी तो दो गांवों की सीमा विवाद के चलते धरती को खोदना पड़ता है और बनाई गई बुर्जी को देखना होता है।
चकबंदी के समय में पूर्व से पश्चिम दिशा में हर 5 एकड़ पर तथा उत्तर से दक्षिण पर दिशा में 10 एकड़ पर लाल पत्थर नाम से पत्थर गाड़े गए थे। गहराई तक गाड़े गये ये पत्थर आज भी वैसे के वैसे मिल सकते हैं। यह सत्य है कि किसानों ने उनको इसलिए काट दिया या तोड़ डाला क्योंकि वे हल चलाने में या ट्रैक्टर द्वारा जुताई करने में समस्या बन रहे थे परंतु जब भी पैमाइश की जाती है तीन लाल पत्थरों का ही सहारा लिया जाता है। यदि इन पत्थरों की दूरी में कहीं फर्क भी पाया जाता है तो उसे किले से काट दिया जाता है। ये चकबंदी की बेहतरीन व्यवस्था थी। जब पैमाइश की गई, खेत का रास्ता छोड़ा गया था बहुत ही सूझबूझ से काम लिया गया था। पैमाइश के लिए, भविष्य के लिए भी लाल पत्थर छोड़े गए थे। दो गांवों की सीमाओं पर बुर्जी बनाई गई थी ताकि दूर से और नजर आए। वहीं तीन गांवों की सीमा पर सेहदा बनाए जाते थे और आज वो सेहदा नजर नहीं आते और लाल पत्थर भी नजर नहीं आते। यही हालात बुर्जियों की है।
दो गांव की सीमा पर बुर्जी स्थापित की जाती थी और जो गहराई पर स्थापित की जाती थी। कच्चा कोयला भरकर चूना से बनाई जाती थी। ऊपर लाल पत्थर या बुर्जी बनाई जाती थी ताकि दूर से दिखाई दे कि यह दो गांव की सीमा है और उन सीमाओं पर दोनों गांव के लोग पेड़ पौधे लगाते थे। विवाह शादी के समय भी इन सीमाओं पर रस्म अदा की जाती थी।
तीन गांव की सीमा हो वहां पेयजल सप्लाई टैंक जैसा सेहदा बनाया जाता था। यह भी 6-7 फुट गहराई तक गाड़ा जाता था। दूर से दिखाई देता था कि यहां 3 गांवों की सीमा लगती है।
ये बुर्जी और सेहदा खसरा एवं गिरदावरी में नोट किये जाते थे। जब भी पैमाइश की जाती है तीन लाल पत्थरों से मिलान करके की जाती है। यदि कहीं अंतर आता है तो किले से काटने की परंपरा है।
क्या कहते हैं उमेद सिंह जाखड़ पटवारी-
उमेद सिंह जाखड़ पटवारी का कहना है कि बुर्जी, सेहदा,लाल पत्थर चकबंदी की निशानी ही नहीं भविष्य में की जाने वाली पैमाइश का आधार होती है। इनके साथ छेड़छाड़ करना अपराध है। यदि इनके साथ छेड़ करता है तो उसकी एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है। नियम अनुसार ऐसे व्यक्ति को सजा का प्रावधान है।
विवाह शादी में निभाई जाती है परंपरा-
विवाह शादी करके दुल्हन को गाड़ी में लाया जाता है तो वह अपने साथ एक लाल कपड़े से बंधेे हुए करवे में मिठाई तथा पैसे आदि डालकर लाते हैं। जब अपने गांव की सीमा में प्रवेश करते है तो इसे फेंक दिया जाता है। यद्यपि इसके पीछे माना जाता है कि जंगली जीव इस मिठाई को खाएंगे और वह भी खुश हो जाएंगे।
कौन-कौन सी सीमाएं लगती है-
कनीना की कुल 2383 हेक्टेयर भूमि है जिसके चारों ओर कोटिया, करीरा, भडफ़, उन्हाणी, चेलावास, ककराला, गाहडा आदि गांवों की सीमाएं लगती हैं। लगभग सारे पत्थर और बुर्जी सेहदा आदि तोड़ दिए हैं या भूमि में दबे हुए हैं। जब कभी गांवों की सीमा का विवाद हो जाता है तो बुर्जी को भूमि से खोदकर ढूंढा जाता है। परंतु ऐसा भी होता है कि कई बार ये नहीं मिलती।
फोटो कैप्शन 3 और 2: लाल पत्थर एवं लाल पत्थर को दिखाता किसान देशराज कोटिया।
एक दिसंबर से बदल रहा है स्कूलों का समय
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कनीना। प्रदेभर के राजकीय स्कूलों का समय प्रति वर्ष की भांति 3 माह के लिए प्रात: 9 बजे से शाम 3:30 बजे तक का होने जा रहा है।
अब तक विभिन्न स्कूलों का समय प्रात: 8 बजे से शाम 1:30 बजे तक का था। विस्तृत जानकारी देते हुए अध्यापक नेता सुनील कुमार यादव ने बताया कि यह समय 3 माह के लिए हर वर्ष प्रथम 1 दिसंबर से बदलता है। 1 दिसंबर से 28 फरवरी तक यही समय रहता है। इस मौसम में धुंध सर्दी अधिक पड़ती है इसलिए यह समय हर वर्ष बदलाव किया जाता है।
हल्की धुंध पड़ी, ठंड बढ़ी
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कनीना। कनीना क्षेत्र में सोमवार को दोपहर तक हल्की धुंध पड़ी तथा ठंड बढ़ गई है।
जहां सोमवार सुबह जल्दी धुंध पड़ती रही जो दोपहर तक चली। कहीं-कहीं तो प्रदूषण अधिक देखने को मिला, ठंड भी बढऩे लगी है।
वैसे तुम नवंबर माह में धुंध पड़ती आई है किंतु इस बार कुछ देर से धुंध पडऩे लगी है। विगत वर्ष नवंबर के दूसरे सप्ताह में धुंध शुरू हो गई थी।
विज्ञान के जानकार मानते हैं कि जब धुआं या प्रदूषण बढ़ जाता है और ठंड पड़ती तो धूम कोहरा बनता है जो सेहत के लिए बहुत नुकसानदायक है।
बतौर शिक्षक एवं समाजसेवा मिसाल कायम की
-राव भगवान् सिंह देवरूप बने हैं कइयों के लिए
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कनीना। पूर्व मुख्याध्यापक भगवान सिंह गुढ़ा में अपने फार्म हाउस पर एक छोटे से कमरे में अपनी पत्नी सहित अपनी बेहतर छाप के चलते सफल जीवन जी रहे हैं। करीब 30 सालों तक शिक्षा के क्षेत्र में नाम एवं धाक जमाने वाले भगवान सिंह ने आज वो पहचान बनाई है जो शायद किसी शिक्षक ने बनाई हो। शिक्षा के क्षेत्र में आज भी बढ़ावा दे रहे हैं वहीं समाजसेवा में उनका कोई सानी नहीं है। अपनी पेंशन में से अल्प अपने पर खर्च कर बाकी समस्त जनसेवा, शिक्षा एवं समाजसेवा में लगा रहे हैं। गायों के प्रति गहन आस्था है और गौशालाओं में हर वर्ष लाखों रुपये दान देते आ रहे हैं। ककराला स्कूल से कुछ वर्षों पूर्व बतौर मुख्याध्यापक सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने जनसेवा अपना ध्येय बनाया हुआ है।
राव भगवान सिंह ने सेवा में रहते हुए ईमानदारी की मिसाल कायम की है। उन्हें करीब 32 हजार रुपये पेंशन मिलती है जिसमें से अपनी पत्नी व स्वयं पर थोड़ा बहुत खर्च करके समस्त राशि गौशालाओं में दान कर देते हैं या फिर कन्याओं की विवाह शादी पर खर्च कर देते हैं। बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देते हैं। आज भी वे बच्चों को बेहतर शिक्षा दे रहे हैं। गुढ़ा स्कूल में जहां बच्चों को शिक्षा के प्रति प्रेरणा देने के लिए विद्या देवी सरस्वती की प्रतिमा स्थापित करवाई। वे भी गायों की सेवा में लगे रहते हैं। कनीना की गौशाला में डेढ़ लाख रुपये भी अधिक दान दे चुके हैं वहीं विभिन्न गौशालाओं में भी दानपुण्य देकर गायों की सेवा का संकल्प ले चुके हैं। उनका कहना है कि वे गायों की सेवा करते रहेंगे। चाहे उनके प्राण निकल जाए किंतु गायों की सेवा तथा बच्चों की शिक्षा से पीछे नहीं हटेंगे।
फोटो कैप्शन : पूर्व मुख्याध्यापक राव भगवान सिंह
एक दिसंबर को एड्स दिवस
-एड्स है दुसाध्य रोग
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कनीना। एड्स एक दुसाध्य रोग है जिसे एक्वायर्ड इम्यून डेफिसिएंशी सिंड्रोम मानवीय प्रतिरक्षी अपूर्णता विषाणु (एचआईवी) से होता है जो कि मानव की प्राकृतिक प्रतिरोधी क्षमता को कमजोर करता है। जिसके चलते कोई भी रोग आसानी से शरीर पर धावा बोल देता है। यह रोग नहीं पितु रोगों का समूह कहा जाता है। सुरक्षा कवच के बिना एड्स पीडि़त लोग भयानक बीमारियों क्षय रोग और कैंसर आदि से पीडि़त हो जाते हैं और शरीर को सर्दी जुकाम, फुफ्फुस प्रदाह इत्यादि घेर लेते हैं।
एडस कैसे फैलता है-
डा वेदप्रकाश बताते हैं कि एक सामान्य व्यक्ति एचआईवी संक्रमित व्यक्ति के शुक्राणु,, योनि स्राव अथवा रक्त के संपर्क में आता है तो उसे एड्स हो सकता है। आमतौर पर लोग एचआईवी पाजिटिव होने को एड्स समझ लेते हैं, जो कि गलत है। बल्कि एचआईवी पाजिटिव होने के 8-10 साल के अंदर जब संक्रमित व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता क्षीण हो जाती है। तब उसे घातक रोग घेर लेते हैं और इस स्थिति को एड्स कहते हैं। यह पीडि़त व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन सम्बन्ध स्थापित करने ,दूषित रक्त आधान,संक्रमित सुई के से,एड्स संक्रमित माँ से उसके होने वाली संतान को मिल सकता है।
लक्षण-
एचआईवी से संक्रमित लोगों में लंबे समय तक एड्स के कोई लक्षण दिखाई नहीं देते। अधिकतर एड्स के मरीजों को सर्दी, जुकाम या विषाणु बुखार हो जाता है पर इससे एड्स होने का पता नहीं लगाया जा सकता। जब वायरस का संक्रमण शरीर में अधिक हो जाता है, उस समय बीमारी के लक्षण दिखाई देते हैं। एड्स के लक्षण दिखने में आठ से दस साल का समय भी लग सकता है। ऐसे व्यक्ति भी एड्स फैला सकते हैं।
क्या हैं लक्षण-
डा वेदप्रकाश बताते हैं कि एड्स के लक्षणों में वजन का कम होना,लगातार खांसी बने रहना, बार-बार जुकाम का होना,बुखार,सिरदर्द,थकान,शरीर पर निशान बनना, हैजा,भोजन से अरुचि,लसीकाओं में सूजन जैसे लक्षण दिखाई पड़ते हैं। एचआईवी की उपस्थिति का पता लगाने हेतु एलिसा टेस्ट किया जाता है।
पीडि़त के साथ खाने-पीने से, बर्तनों की साझीदारी से,हाथ मिलाने या गले मिलने से,एक ही टायलेट का प्रयोग करने से,मच्छर या अन्य कीड़ों के काटने से,पशुओं के काटने से,खांसी या छींकों से यह रोग नहीं फैलता।
एड्स का उपचार-
एंटी रेट्रोवाईरल थेरपी दवाईयों का उपयोग किया जाता है। इन दवाइयों का मुख्य उद्देश्य एचआईवी के प्रभाव को काम करना, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना और अवसरवादी रोगों को ठीक करना होता है। पीडि़त साथी या व्यक्ति के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित नहीं करना चाहिए, खून को अच्छी तरह जांच कर ही उसे चढ़ाना चाहिए। उपयोग की हुई सुइयों या इंजेक्शन का प्रयोग नहीं करना चाहिए, दाढ़ी बनवाते समय हमेशा नाई से नया ब्लेड उपयोग करना चाहिये।
फोटो कैप्शन: डा वेदप्रकाश।
निबंध प्रतियोगिता में सिमरन ने मारी बाजी
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कनीना। नेहरू युवा केंद्र नारनौल द्वारा ब्लॉक स्तरीय निबंध प्रतियोगिता राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय नांगल मोहनपुर में आयोजित की गई।
प्रतियोगिता में सिमरन प्रथम, निर्मला द्वितीय, और खुशी तृतीय स्थान पर रही। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आजाद युवा समिति के अध्यक्ष मोहित इसराना रहे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्यालय प्रधानाचार्य सत्यदेव ने की प्रतियोगिता में निर्णायक मंडल की भूमिका में संस्कृत प्रवक्ता प्रदीप, इतिहास प्रवक्ता बलराम व हिंदी प्रवक्ता बृजमोहन शर्मा रहे
मोहित इसराना ने युवाओं को जल संरक्षण के लिए प्रेरित किया कार्यक्रम का संचालन राष्ट्रीय युवा स्वयंसेवक गीता ने किया।
इस अवसर पर प्रधानाचार्य सत्यदेव ने भी विद्यार्थियों को जल संरक्षण के महत्व को समझाया
और जल संरक्षण को लेकर शपथ भी दिलाई।
इस अवसर पर गीता, कार्तिकेय, रवि, प्रविंद्र, राकेश कुमार ,विजयपाल,यशवीर शुखसहायक, रविन्द्र, धर्मवीर सिंह, हीरालाल, निशु,अंकिता, हीना, मोनिका,प्रिति राजेश मौजूद रहे।
फोटो कैप्शन 5: अव्वल रहे विद्यार्थियों को सम्मानित करते नेहरू युवा केंद्र के मोहित इसराणा।
सर्दी आते ही बा
जरे के उत्पादों की मांग बढ़ी
- बढ़ रहा है युवा वर्ग का युवा वर्ग का रुझान
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कनीना। कनीना उपमंडल के गांव करीरा में जहां बाजरे के उत्पादन शुरू होने के बाद क्षेत्र के लोगों का रुझान भी बाजरे के उत्पादों की ओर बढ़ा है वहीं युवा वर्ग की पसंद की चीजें बनने से युवा आकर्षित हो रहा है। सर्दी का मौसम आते ही बाजरे के उत्पाद अधिक बिकते हैं। 25 अक्टूबर 2020 को मंत्री ओम प्रकाश एडीओ ने करीरा में महावीर सिंह एवं ललित कुमार द्वारा संचालित बाजरे के उत्पाद पिज्जा, बिस्कुट, बर्गर, केक, फैन की शुरुआत की जाने से जहां कनीना का नाम हरियाणा में एक नंबर पर पहुंच गया वही लोगों का रुझान भी बढ़ गया है। ललित कुमार विभिन्न कृषि मेलों में जाकर अपने बाजरे के उत्पादों से मन मोह रहे हैं। हरियाणा में इस प्रकार का यह पहला उत्पाद केंद्र है।
कभी बाजरा खाने से लोग डरते थे किंतु अब बाजरे की ओर आकर्षित हो रहे हैं। महावीर सिंह ने बताया कि सुबह तीन बजे से परिवार के चार सदस्य तथा 3 हलवाई काम में जुट जाते हैं जो रात्रि आठ बजे तक लगे रहते हैं। हाल ही में दो बड़े मिक्सचर एवं ओवन आ चुके हैं जिससे रोजगार बढ़ा है। इस प्रकार चार लाख रुपये की लागत से उनका यह उद्योग प्रदेश का पहला बाजरे पर आधारित उद्योग बन गया है। हरियाणा के कृषि विश्वविद्यालय हिसार से ट्रेनिंग लेकर करीरा में काम शुरू किया गया है। यहां प्रतिदिन 40 से 50 पिज्जा, 5 से 6 किलो बिस्कुट, केक,30 से 35 बर्गर 15 से 20 दर्जन फैन हाथोंहाथ बिक जाते हें। महावीर सिंह ने बताया और आसपास के लगभग सभी फास्ट फूड विके्रता उनके उत्पादों को पसंद कर रहे हैं और जितना भी उत्पाद होता है उतना सारा बिक जाता है।
वैसे तो बाजरा खाना युवा वर्ग की पसंद नहीं है किंतु उनकी पसंद के पदार्थ जैसे बर्गर, पिज्जा फैन एवं केक आदि बनने से रुझान बढ़ा है। महाबीर सिंह ने बताया कि मैदा आदि से बने पदार्थों की तुलना में उनके भाव अधिक नहीं हैं। उन्होंने बताया कि बाजरे का पिज्जा 150 रुपये बिस्कुट 300 रुपये किलो, केक 350 रुपये का, बर्गर 20 से 30 रुपये, फैन 30 रुपये दर्जन बेचे जा रहे हैं। विवाह शादियों तथा जन्म दिन पर पर उनके बर्गर और केक अधिक पसंद किए जाते हैं। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्र में इस प्रकार का उद्योग राजस्थान के बाद हरियाणा में उन्नति कर रहा है। इस प्रकार का उद्योग चलाने वाले महावीर सिंह पहले भी अग्रणी किसान हैं जिन्होंने कृषि पर आधारित पदार्थ जैसे अचार, आंवले की लड्डू, कैंडी, नींबू एवं बेर उत्पादन में बेहतर नाम कमाया है। कई बार सरकार द्वारा सम्मानित हो चुका है।
फोटो कैप्शन 6: बाजरे बर्गर बनाते करीरा के महाबीर सिंह एवं अन्य।
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