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Thursday, October 22, 2026
मरहम वहाँ लगाते हो, जहाँ जख्म नहीं!
-बिजली कर्मचारियों की हड़ताल से आम जनता परेशान, आखिर नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
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कनीना की आवाज। बिजली आज के युग में केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है। घरों से लेकर खेतों तक, विद्यालयों से लेकर अस्पतालों तक और छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े उद्योगों तक, हर जगह बिजली की जरूरत है। ऐसे में यदि लगातार तीन दिनों तक बिजली आपूर्ति बाधित रहने की स्थिति पैदा हो जाए तो आम आदमी का जीवन किस तरह प्रभावित होगा, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। हरियाणा में बिजली कर्मचारियों की हड़ताल के कारण उपभोक्ताओं के सामने जो संकट खड़ा हुआ है, वह केवल बिजली की समस्या नहीं, बल्कि आम नागरिक की परेशानी, उसके अधिकार और व्यवस्था की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर सवाल है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि बिजली बिल समय पर भरने वाले उपभोक्ता आखिर किस अपराध की सजा भुगत रहे हैं? उपभोक्ता हर महीने अपना बिल भरता है। वह बिजली विभाग की सेवाओं के बदले भुगतान करता है। उसे उम्मीद रहती है कि घर में रोशनी होगी, बच्चों की पढ़ाई चलेगी, खेतों में सिंचाई होगी, पीने के पानी की व्यवस्था बनी रहेगी और जरूरत पडऩे पर अस्पतालों में आवश्यक सेवाएं उपलब्ध रहेंगी। लेकिन जब हड़ताल के कारण बिजली आपूर्ति प्रभावित होती है तो उपभोक्ता की सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती हैं।
ऐसे में मन में एक ही बात आती है—मरहम वहां लगाते हो जहाँ जख्म नहीं! चोट किसी और को लगती है और उसका दर्द किसी तीसरे को सहना पड़ता है। अपनी मांगों को मनवाने के लिए कर्मचारी हड़ताल करते हैं, सरकार और विभाग के सामने अपनी बात रखते हैं, लेकिन सबसे अधिक परेशानी उस आम नागरिक को उठानी पड़ती है जिसका इस विवाद से प्रत्यक्ष रूप से कोई लेना-देना नहीं है।
तीन दिन बिजली के बिना कैसे कटेंगे?
आज के समय में तीन दिन बिजली के बिना गुजारना कोई छोटी बात नहीं है। पहले के समय में लोग लालटेन, दीये और हाथ से चलने वाले पंखों के सहारे जीवन बिताते थे। उस समय न मोबाइल फोन थे, न आधुनिक उपकरणों पर इतनी निर्भरता थी और न ही जीवन की गति इतनी तेज थी। आज परिस्थिति बिल्कुल बदल चुकी है। घरों में पानी की मोटर से लेकर फ्रिज, पंखे, कूलर, मोबाइल चार्जर और अन्य आवश्यक उपकरण बिजली पर निर्भर हैं।
यदि तीन दिनों तक बिजली आपूर्ति ठप रहती है तो घरों में अंधेरा छा जाएगा। गर्मी और उमस से लोगों की परेशानी बढ़ सकती है। पीने के पानी की व्यवस्था प्रभावित होगी। मोबाइल फोन बंद होने लगेंगे और लोगों का एक-दूसरे से संपर्क करना कठिन हो सकता है। छोटे दुकानदारों, आटा चक्की संचालकों, वेल्डिंग करने वालों, साइबर कैफे, फोटो स्टूडियो और बिजली से चलने वाले अन्य व्यवसायों का काम रुक सकता है।
सवाल यह है कि इन तीन दिनों में होने वाले नुकसान की भरपाई कौन करेगा? क्या कर्मचारियों की हड़ताल से प्रभावित दुकानदारों को मुआवजा मिलेगा? क्या मजदूरों की छूटी हुई मजदूरी की भरपाई होगी? क्या किसानों को उनकी परेशानी का कोई लाभ मिलेगा? क्या बच्चों की पढ़ाई का नुकसान वापस लौटाया जा सकेगा? इन सवालों का जवाब किसी के पास आसानी से नहीं मिलता।
विद्यार्थियों की पढ़ाई और परीक्षाओं पर असर
इस समय विद्यार्थियों की पढ़ाई महत्वपूर्ण दौर में है। अनेक विद्यार्थी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। किसी को अगले दिन होने वाली परीक्षा की चिंता है तो कोई प्रतियोगी परीक्षा के लिए अध्ययन कर रहा है। ऐसे में बिजली की आपूर्ति बाधित होने से उनकी पढ़ाई प्रभावित होना स्वाभाविक है।
आजकल पढ़ाई केवल किताबों तक सीमित नहीं है। विद्यार्थी मोबाइल फोन, कंप्यूटर और इंटरनेट के माध्यम से भी अध्ययन करते हैं। ऑनलाइन कक्षाएं, शैक्षणिक वीडियो, डिजिटल नोट्स और परीक्षा संबंधी सामग्री बिजली पर निर्भर हैं। घर में बिजली न होने से मोबाइल की बैटरी खत्म हो सकती है और रात के समय रोशनी की समस्या पैदा हो सकती है।
जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर है, उनके पास इनवर्टर या जनरेटर जैसी वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं होती। ऐसे परिवारों के बच्चे अंधेरे में पढऩे को मजबूर हो सकते हैं। क्या इन विद्यार्थियों का भविष्य किसी श्रम विवाद से कम महत्वपूर्ण है? कर्मचारियों की मांगें अपनी जगह हो सकती हैं, लेकिन विद्यार्थियों के हितों को भी उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए।
रबी फसल की बिजाई में किसानों की परेशानी-
कनीना और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान इन दिनों रबी फसलों की तैयारी में जुटे हुए हैं। सरसों की बिजाई का काम चल रहा है और गेहूं की बिजाई की तैयारी भी की जा रही है। खेतों में समय पर पानी देना, जमीन तैयार करना और उचित समय पर बीज डालना किसानों के लिए अत्यंत आवश्यक है।
किसान पहले ही मौसम, बीज, खाद, डीजल और खेती की बढ़ती लागत जैसी अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे समय में बिजली आपूर्ति बाधित होने से उसकी मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। जिन किसानों के खेतों में ट्यूबवेल बिजली से चलते हैं, उन्हें सिंचाई के लिए वैकल्पिक साधनों का सहारा लेना पड़ सकता है। डीजल से सिंचाई करना महंगा पड़ता है। हर किसान के पास इतना पैसा नहीं होता कि वह लगातार बढ़ते खर्च को सहन कर सके।
खेती में समय का विशेष महत्व है। यदि खेत तैयार होने के बावजूद बिजली न मिले तो किसान की पूरी योजना प्रभावित हो सकती है। फसल की बिजाई में देरी होने पर उत्पादन पर भी असर पडऩे की आशंका रहती है। ऐसे में किसान पूछता है कि जब वह समय पर बिजली बिल भरता है, तब उसे समय पर बिजली क्यों नहीं मिलती?
कर्मचारियों की मांगों पर विचार होना चाहिए, लेकिन किसानों की मजबूरी को भी समझना आवश्यक है। खेतों में खड़ी फसल, बिजाई का समय और सिंचाई की जरूरत किसी हड़ताल की प्रतीक्षा नहीं कर सकते।
पानी के लिए दूर-दराज भटकने को मजबूर महिलाएं---
बिजली आपूर्ति बाधित होने का सबसे सीधा असर पेयजल व्यवस्था पर पड़ सकता है। अनेक गांवों और घरों में पानी की मोटर, बूस्टर तथा अन्य व्यवस्थाएं बिजली पर निर्भर हैं। बिजली नहीं होगी तो पानी की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है।
ऐसी स्थिति में महिलाओं को पानी के लिए दूर-दराज तक जाना पड़ सकता है। सिर पर घड़ा या हाथ में बाल्टी लेकर पानी लाना उनके लिए कोई नई बात नहीं है, लेकिन आज जब सुविधाओं का विस्तार हो चुका है, तब उन्हें फिर से पुरानी कठिनाइयों का सामना करना पड़े तो यह चिंता का विषय है।
दूर से पानी लाते समय महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को दुर्घटना का खतरा भी रहता है। रास्ते में फिसलने, वाहन की चपेट में आने या थकान के कारण परेशानी हो सकती है। जिन घरों में छोटे बच्चे, बुजुर्ग या बीमार व्यक्ति हैं, वहां पानी की कमी और गंभीर समस्या बन सकती है।
क्या किसी कर्मचारी या अधिकारी ने सोचा है कि तीन दिन तक पानी की व्यवस्था बाधित होने पर आम परिवार किस तरह गुजारा करेगा? क्या हड़ताल करने वालों के घरों में पानी की जरूरत समाप्त हो जाती है? क्या उनके परिवारों को भोजन बनाने, सफाई करने और पीने के लिए पानी की आवश्यकता नहीं होती? जब हर घर को पानी चाहिए, तब आम जनता को परेशानी में डालकर मांगें मनवाने की रणनीति पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
अस्पतालों और मरीजों की परेशानी सबसे गंभीर---
बिजली आपूर्ति बाधित होने की सबसे गंभीर स्थिति अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं में सामने आ सकती है। अस्पतालों में अनेक उपकरण बिजली पर निर्भर रहते हैं। ऑपरेशन थिएटर, जांच उपकरण, ऑक्सीजन की व्यवस्था, दवाओं के भंडारण और मरीजों की निगरानी में बिजली की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
यह कहना उचित नहीं होगा कि बिजली बंद होने मात्र से हर मरीज का ऑपरेशन रुक जाएगा या किसी की मृत्यु निश्चित हो जाएगी, क्योंकि अस्पतालों में बैकअप और वैकल्पिक व्यवस्थाएं भी होती हैं। फिर भी, यदि बिजली बाधित होने के दौरान वैकल्पिक व्यवस्था पर्याप्त न हो या उसमें कोई खराबी आ जाए तो गंभीर मरीजों के लिए जोखिम पैदा हो सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे स्वास्थ्य केंद्रों और निजी क्लीनिकों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
किसी मरीज का ऑपरेशन टल जाए, जांच में देरी हो या उसे दूसरे अस्पताल तक जाना पड़े तो उसकी परेशानी का अनुमान वही लगा सकता है जिसके घर में कोई बीमार हो। किसी परिवार के लिए एक-एक मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है।
इसलिए बिजली कर्मचारियों की हड़ताल हो या कोई अन्य विवाद, अस्पतालों और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं को निर्बाध बिजली उपलब्ध कराने की विशेष व्यवस्था होनी चाहिए। मरीजों की जिंदगी किसी भी श्रम विवाद से बड़ी है। इस मामले में सरकार, विभाग और कर्मचारी—तीनों की जिम्मेदारी बनती है कि आवश्यक सेवाएं बाधित न हों।
बिजली पर निर्भर रोजगार और मजदूरों की रोजी-रोटी
कनीना जैसे कस्बों में अनेक छोटे व्यवसाय बिजली के सहारे चलते हैं। आटा चक्की, वेल्डिंग की दुकान, इलेक्ट्रॉनिक मरम्मत केंद्र, फोटो स्टूडियो, प्रिंटिंग का काम, कंप्यूटर सेंटर और कई अन्य रोजगार सीधे बिजली पर निर्भर हैं। बिजली न होने पर इनका काम रुक सकता है।
दुकानदार की दुकान तो खुली रहती है, लेकिन ग्राहक लौट जाते हैं। मशीनें बंद रहती हैं और आमदनी घट जाती है। दूसरी ओर, दिहाड़ी मजदूर का जीवन तो प्रतिदिन की कमाई पर निर्भर करता है। यदि कारखाना, वर्कशॉप या अन्य कार्यस्थल बंद हो जाए तो उसे मजदूरी नहीं मिलती। उसके सामने परिवार के भोजन, बच्चों की फीस और रोजमर्रा के खर्च का संकट खड़ा हो जाता है।
ऐसे परिवारों के लिए तीन दिन की बेरोजगारी भी भारी पड़ सकती है। वे न तो हड़ताल में शामिल हैं और न ही उनकी किसी मांग से कोई सीधा संबंध है, फिर भी आर्थिक नुकसान उन्हीं को उठाना पड़ता है।
पेट्रोल पंपों पर भी बिजली की उपलब्धता और बैकअप व्यवस्था के अनुसार काम प्रभावित हो सकता है। हालांकि हर पेट्रोल पंप पर बिजली बंद होने से बिक्री पूरी तरह बंद हो जाएगी, ऐसा कहना सही नहीं होगा। लेकिन जहां आवश्यक उपकरणों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है, वहां उपभोक्ताओं को परेशानी हो सकती है।
इस तरह एक स्थान पर शुरू हुआ विवाद धीरे-धीरे पूरे समाज की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करने लगता है।
हड़ताल के दिनों के वेतन पर भी उठते हैं सवाल
कर्मचारियों की हड़ताल को लेकर आम जनता के मन में एक और प्रश्न उठता है। यदि कर्मचारी कई दिन काम नहीं करते तो क्या उन्हें उन दिनों का वेतन मिलेगा? इस विषय में वास्तविक स्थिति सेवा नियमों, हड़ताल की वैधता, सरकार के आदेश और संबंधित विभाग के निर्णय पर निर्भर करती है।
यह मान लेना उचित नहीं होगा कि हर कर्मचारी को हड़ताल के दिनों का पूरा वेतन निश्चित रूप से मिल ही जाएगा। सरकार वेतन काटने, अनुशासनात्मक कार्रवाई करने या किसी विशेष परिस्थिति में अलग निर्णय लेने जैसे कदम उठा सकती है। अंतिम स्थिति संबंधित आदेशों से ही स्पष्ट होगी।
फिर भी, यदि हड़ताल के दौरान कर्मचारियों को वेतन देने का निर्णय किया जाता है, तो जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब उपभोक्ताओं को बिजली नहीं मिली, तब उनकी भरपाई कैसे होगी? एक तरफ कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और दूसरी तरफ उपभोक्ता बिल भरने के बावजूद सेवा से वंचित रह जाते हैं। इस असंतुलन पर विचार करना आवश्यक है।
कर्मचारियों को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का अधिकार है, लेकिन अधिकारों के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। इसी प्रकार सरकार को भी विवाद सुलझाने में देरी नहीं करनी चाहिए। जनता को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उसकी जरूरतों और परेशानियों को कोई महत्व नहीं दे रहा।
सरकार से नाराजगी है तो सरकार तक पहुंचाएं आवाज
यदि बिजली कर्मचारियों को सरकार या विभाग से कोई शिकायत है, उनकी मांगें लंबे समय से लंबित हैं या उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है, तो उन्हें अपनी बात प्रभावी ढंग से सरकार तक पहुंचानी चाहिए। ज्ञापन देना, वार्ता करना, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना, जनप्रतिनिधियों से मिलना और कानूनी तरीके अपनाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के स्वीकृत रास्ते हैं।
कर्मचारी मंत्रियों और संबंधित अधिकारियों से मिलकर अपनी मांगों को स्पष्ट कर सकते हैं। मुख्यमंत्री तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं। यदि वार्ता विफल हो रही है तो नियमानुसार आगे के कदम उठाए जा सकते हैं। शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक विरोध का महत्व कम नहीं है।
लेकिन सवाल यह है कि अपनी मांगें मनवाने के लिए आम नागरिक की जिंदगी को कठिन क्यों बनाया जाए? जिस उपभोक्ता ने समय पर बिल भरा है, वह कर्मचारी और सरकार के बीच विवाद का पक्षकार नहीं है। फिर उसे ही सबसे बड़ी कीमत क्यों चुकानी पड़े?
सरकार पर दबाव बनाने के ऐसे तरीके तलाशे जाने चाहिए जिनसे आम जनता को कम से कम नुकसान हो। आवश्यक सेवाओं को बाधित करने के बजाय बातचीत, जनप्रतिनिधियों के माध्यम से दबाव और नियमों के दायरे में आंदोलन जैसे विकल्पों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सरकार को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी
इस पूरे मामले में केवल कर्मचारियों को दोषी ठहराकर सरकार की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। सरकार और बिजली विभाग का दायित्व है कि वे कर्मचारियों की समस्याओं को सुनें, विवाद को समय रहते सुलझाएं और जनता को बिजली जैसी आवश्यक सेवा उपलब्ध कराएं।
यदि कर्मचारियों की मांगें उचित हैं तो उन पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। यदि मांगों पर सहमति नहीं बन रही तो वार्ता का रास्ता खुला रहना चाहिए। साथ ही, वैकल्पिक कर्मचारियों, आपातकालीन सेवाओं और आवश्यक प्रतिष्ठानों के लिए बिजली आपूर्ति की व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए।
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल, अस्पतालों, आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं और अन्य महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं पर हड़ताल का न्यूनतम असर पड़े। उपभोक्ताओं को समय रहते सही जानकारी दी जाए ताकि वे अपनी जरूरतों के अनुसार तैयारी कर सकें।
लोकतांत्रिक सरकार की सफलता केवल निर्णय लेने में नहीं, बल्कि जनता को संकट से बचाने में भी है। इसी तरह किसी कर्मचारी संगठन की सफलता केवल मांगें मनवाने में नहीं, बल्कि समाज का विश्वास बनाए रखने में भी है।
कर्मचारियों को जनता का साथ चाहिए तो जनता का दर्द समझें
कर्मचारी भी इसी समाज का हिस्सा हैं। उनके घरों में भी बच्चे पढ़ते हैं, उनके परिवारों को भी पानी चाहिए, उन्हें भी अस्पतालों की जरूरत पड़ती है और वे भी रोजमर्रा की समस्याओं से गुजरते हैं। ऐसे में उन्हें समझना चाहिए कि बिजली बंद होने से आम जनता पर क्या बीतती है।
यदि कर्मचारियों को जनता का समर्थन चाहिए तो उन्हें जनता के हितों को भी प्राथमिकता देनी होगी। किसी आंदोलन के दौरान आम आदमी को कम से कम परेशानी हो, इसके लिए प्रयास होने चाहिए। कर्मचारियों को यह विचार करना चाहिए कि जिस उपभोक्ता के बिल से विभाग की व्यवस्था चलती है, उसी को परेशान करके आखिर किस तरह व्यापक जनसमर्थन प्राप्त किया जा सकता है?
दूसरी ओर, उपभोक्ताओं को भी कर्मचारियों की समस्याओं को सुनने और समझने के लिए तैयार रहना चाहिए। संभव है कि कर्मचारियों की कुछ मांगें जायज हों और उनका समाधान आवश्यक हो। लेकिन मांगें जायज होने का अर्थ यह नहीं कि आम जनता की कठिनाइयों को अनदेखा कर दिया जाए।
जनता को भी अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहिए--
यदि उपभोक्ताओं को लगता है कि उनकी समस्याओं की अनदेखी हो रही है, तो वे भी शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठा सकते हैं। वे बिजली विभाग में शिकायत दर्ज करवा सकते हैं, संबंधित अधिकारियों को ज्ञापन दे सकते हैं और जनप्रतिनिधियों से जवाब मांग सकते हैं।
आगामी चुनावों में भी नागरिक सरकारों के कामकाज का मूल्यांकन कर सकते हैं। किस सरकार ने बिजली व्यवस्था सुधारी, किसने कर्मचारियों की समस्याएं सुलझाईं और किसने उपभोक्ताओं को राहत दी—इन सभी बातों पर विचार करके मतदान करना जनता का अधिकार है।
लेकिन किसी विशेष दल को वोट न देने का निर्णय हर नागरिक का व्यक्तिगत अधिकार है। जनता को भावनाओं में बहने के बजाय तथ्यों, नीतियों और सरकार के समग्र कामकाज के आधार पर अपना निर्णय लेना चाहिए। लोकतंत्र में जनता की आवाज सबसे महत्वपूर्ण है और उसका इस्तेमाल सोच-समझकर होना चाहिए।
आखिर कब तक पिसता रहेगा आम आदमी?
कनीना की बिजली समस्या ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि किसी भी विवाद में सबसे अधिक नुकसान आम आदमी को ही क्यों उठाना पड़ता है? कर्मचारी अपनी मांगों के लिए संघर्ष करते हैं, सरकार अपने निर्णयों पर अड़ी रहती है और उपभोक्ता दोनों के बीच पिसता रहता है।
किसान को खेत की चिंता है, विद्यार्थी को परीक्षा की, महिला को पानी की, मरीज को इलाज की, दुकानदार को कारोबार की और मजदूर को रोजी-रोटी की। इन सबकी समस्याएं अलग-अलग हैं, लेकिन बिजली बाधित होने पर सभी की परेशानी एक जैसी हो जाती है।
यदि तीन दिन तक बिजली आपूर्ति प्रभावित होती है तो उसका असर केवल घरों के अंधेरे तक सीमित नहीं रहेगा। शिक्षा, खेती, स्वास्थ्य, व्यापार और सामाजिक जीवन पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। इसीलिए इस समस्या का समाधान तत्काल और जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए।
अंत में यही कहना है कि कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए लड़ें, सरकार कर्मचारियों की समस्याएं सुने और उपभोक्ताओं को उनकी आवश्यक सेवाएं मिलती रहें। किसी की मांग पूरी करने के लिए दूसरे के जीवन को संकट में डालना उचित नहीं है। जिस दिन कर्मचारी जनता की परेशानी को अपनी परेशानी समझेंगे और सरकार जनता की आवाज को गंभीरता से सुनेगी, उसी दिन ऐसे विवादों का बेहतर समाधान निकल सकेगा।
मरेहम वहा लगाते हो जहाँ जख्म नहीं—यह कहावत आज की परिस्थिति पर सटीक बैठती दिखाई देती है। चोट कहीं और लगती है, लेकिन दर्द उस आम आदमी को सहना पड़ता है जो हर महीने बिल भरकर केवल इतनी उम्मीद करता है कि उसके घर में रोशनी रहे, खेतों में पानी पहुंचे, बच्चों की पढ़ाई चलती रहे और जरूरत पडऩे पर मरीज को इलाज मिल सके।
कई अहं प्रश्र--
ये सरकारी कर्मचारी अगर सरकार से कुछ चाहते हैं तो मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों का घेराव करे, उनका बहिष्कार करें, उनको वोट न देने का निर्णय करें किंतु सब बातों के लिए कर्मचारी गला उपभोक्ता का घोट रहे हैं। तीन दिन अगर हड़ताल चली तो उसका वेतन ये कर्मी अंत में ले लेंगे वरना उन्हें वेतन लेने का हक नहीं है। जब लोग बच्चों को पढ़ाने की बात करते हैं तो प्राइवेट स्कूलों में, बसें भी चाहिए तो प्राइवेट, ईलाज चाहिए तो प्राइवेट में इसका मतलब प्राइवेट अध्रिक मेहनत करते हैं। सरकारी को प्राइवेट से अधिक मेहनत करके सिद्ध करना चाहिए कि प्राइवेट जीरों हैं। और सरकार के विरुद्ध न्यायालय की शरण लेनी चाहिए।
महेंद्रगढ़ में वोट बचाओ, देश बचाओ, संविधान बचाओ कार्यक्रम के तहत ब्लाक कांग्रेस का सम्मेलन
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कनीना की आवाज। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के निर्देशानुसार आज जिला कांग्रेस कमेटी, महेंद्रगढ़ के तत्वावधान में वोट बचाओ, देश बचाओ, संविधान बचाओ अभियान के तहत ब्लॉक कांग्रेस, महेंद्रगढ़ का कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम पार्टी हाईकमान के आह्वान पर ब्लॉक स्तर पर आयोजित किया गया
इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से जिला कांग्रेस अध्यक्ष सत्यवीर यादव , अरुण राव एवं किसान कांग्रेस के नेशनल कोऑर्डिनेटर कृष्ण राव विशेष रूप से उपस्थित रहे।
इसके साथ ही कार्यक्रम में महिला कांग्रेस की जिला अध्यक्ष डॉ. राजवती यादव , एससी प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष तोताराम कोहली एवं पंचायती राज प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष सुरेंद्र पाराशर जी भी उपस्थित रहे।
जिला अध्यक्ष सत्यवीर यादव ने कहा कि भाजपा सरकार चुनाव आयोग के साथ मिलकर वोट चोरी का काम कर रही है। आज देश में संविधान और लोकतंत्र दोनों खतरे में हैं। राहुल गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस का एक-एक कार्यकर्ता वोट बचाने और लोकतंत्र बचाने की इस लड़ाई को बूथ स्तर तक ले जाएगा।
युवा नेता अरुण राव ने कहा कि आज का युवा जाग चुका है। वोट चोरी करके बनाई गई यह सरकार ज्यादा दिन चलने वाली नहीं है। यह लड़ाई देश के भविष्य को बचाने की लड़ाई है।
किसान कांग्रेस के नेशनल कोऑर्डिनेटर कृष्ण राव ने कहा कि केंद्र सरकार ने सभी संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग किया है। किसान, जवान और आम आदमी सभी परेशान हैं। चुनाव आयोग की मिलीभगत से लोकतंत्र की हत्या की जा रही है, जिसके खिलाफ कांग्रेस सड़क से संसद तक लड़ाई लड़ेगी।
ब्लॉक अध्यक्ष प्रदीप यादव ने कहा कि महेंद्रगढ़ ब्लॉक का एक-एक कार्यकर्ता पार्टी के इस संकल्प के साथ मजबूती से खड़ा है और हम घर-घर जाकर लोगों को वोट चोरी के इस षड्यंत्र के बारे में जागरूक करेंगे।
फोटो कैप्शन 13: संबंधित है
अपनी मांगों के समर्थन में बैठक आयोजित
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कनीना की आवाज। अभियंता फूल सिंह के साथ मंडल अटेली कार्यालय में ब्रांच 681 कनीना की पदाधिकारी की मीटिंग प्रधान कृष्ण कुमार पुनिया की अध्यक्षता में हुई। इस मीटिंग में कर्मचारियों की लंबी पड़ी मांगों व समस्याओं का मौके पर सुलझाया गया और कार्यकारी अभियंता को आश्वासन दिया कि जो बाकी मांगे रह गए उनको जल्दी से जल्दी निपटारा किया जाएगा। कर्मचारियों की मुख्य मांगों में कर्मचारियों की हर 7 तारीख को वेतन दिया जाए, सभी रेगुलर टर्म फील्ड कर्मचारियों का जूता, डांगरी, रेनकोट दिलाया जाए। सभी फील्ड कर्मचारियों को सेल साबुन सीएफएल दिलाई जाए ,सभी में बूस्टर नहरी योजना पर रेस्ट रिलीवर लगाया जाए। सभी कर्मचारियों का सर्विस बुक चेक करवा कर अधूरी सर्विस को पूरा किया जाए, सभी फील्ड कर्मचारियों का एचआरएमएस पर अपलोड किया जाए कनीना बूस्टर पर बने क्लियर टांक व कलियर वैल की रिपेयर करवाई जाए। बूस्टर कनीना पर एक 50 एचपी की मोटर स्पेयर में रखवाई जाए, बूस्टर कनीना में तीन सेट और उसके आगे पार्क बनवाया जाए इत्यादि मांगे कार्यकारी अभियंता के समस्त रखी गई। इस मीटिंग में मौजूद रहे ब्रांच प्रधान महेंद्रगढ़ सुरेंद्र फौजी, कैशियर यशपाल ,ब्रांच प्रधान नारनौल दीपक सैंडल, जसवंत मास्टर, देव प्रकाश, राजेश मंडोला, संजय गोमल, कुलदीप ,संजय शर्मा, इस मीटिंग में मौजूद रहे।
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कैमला में आयोजित की गई बाल रामलीला
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कनीना की आवाज। राजकीय माध्यमिक विद्यालय कैमला में विभाग के निर्देशानुसार बाल रामलीला का मंचन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कृष्ण कुमार मुख्य शिक्षक राज्यकीय प्राथमिक पाठशाला बूचावास रहें। सभी विद्यार्थियों ने रामलीला के चित्रों का वर्णन, विस्तारपूर्वक से किया राम की भूमिका में अन्नु ,लक्ष्मण की भूमिका में धु्रव, हनुमान की भूमिका रिषभ,जीया ने संन्यासी , रावण का किरदार वान्या, अंगद का अध्या, दीपांशु और हिमांशु, नकुल वानर सेना का अभिनय निभाया सभी ने पात्रों के माध्यम से संवाद के द्वारा यथार्थ चित्रण प्रस्तुत कर सामाजिक कुरीतियों के प्रति एक नई चेतना, पुराणिक सनातन संस्कृति के महिमा का गुणगान किया भगवान श्री राम की लीलाओं का बखूबी वर्णन किया। सीता की भूमिका प्रीति ने निभाई मौलिक मुख्याध्यापक वीरेंद्र सिंह जांगिड़ ने सभी प्रतिभागियों को प्रेरित करते हुए कहा कि आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य आपा-धापी की दौड़ में लगा हुआ है, जिससे आज हमारे सामाजिक मूल्यों निरंतर गिर रहें है। ऐसे में उसे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के चरित्र, आदर्शवादिता और मर्यादा को निभाना अति आवश्यक है जिससे संस्कृति को बचाया जा सकें परिवारों में एकजुटता का संदेश मिल सकें रामायण हमें जीवन, चरित्र ,परंपरा सिद्धांत मर्यादा और परस्पर प्रेम भाव का संदेश देती है। रामायण का प्रत्येक पात्र अपने आप में हमारे जीवन का आदर्श स्वरूप है हमें बखूबी इसका अध्ययन और मनन अपने जीवन में करना चाहिए सभी प्रतिभागियों को प्रशस्ति -पत्र और स्टेशनरी देकर सम्मानित किया। इस मौके पर मनवीर सिंह विद्यालय अध्यापक, सुनील कुमार शास्त्री ,देवेंद्र यादव ,भगत सिंह, तारामणि देवी ,पिंकी देवी, बबली देवी, सुबे सिंह, पूर्व समिति प्रधान सुनील कुमार डीटीएच चौकीदार और संजीत एबीआरसी आदि उपस्थित रहें।
फोटो कैप्शन 11: संबंधित है
बीआर स्कूल के विद्यार्थियों ने उदयपुर एवं चित्तौडग़ढ़ का किया शैक्षणिक भ्रमण
-शैक्षणिक भ्रमण से विद्यार्थियों को मिलती है व्यावहारिक शिक्षा एवं ऐतिहासिक ज्ञान : हरीश भारद्वाज
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कनीना की आवाज। बी.आर. आदर्श वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, सेहलंग द्वारा कक्षा छठी से बारहवीं तक विद्यार्थियों के लिए राजस्थान के उदयपुर, चित्तौडग़ढ़ एवं श्री सांवरिया सेठ मंदिर का शैक्षणिक भ्रमण आयोजित किया गया। इस भ्रमण का उद्देश्य विद्यार्थियों को ऐतिहासिक धरोहरों, भारतीय संस्कृति, स्थापत्य कला एवं प्राकृतिक सौंदर्य से परिचित करवाना था।
भ्रमण के दौरान विद्यार्थियों ने उदयपुर के प्रसिद्ध सिटी पैलेस, पिछोला झील, सहेलियों की बाड़ी, जगदीश मंदिर एवं फतेहसागर झील का अवलोकन किया। विद्यार्थियों ने सिटी पैलेस में मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास एवं राजस्थानी स्थापत्य कला के बारे में जानकारी प्राप्त की। वहीं सहेलियों की बाड़ी तथा उदयपुर की खूबसूरत झीलों के भ्रमण ने विद्यार्थियों को प्रकृति एवं पर्यावरण के महत्व से परिचित करवाया।
भ्रमण के दूसरे दिन विद्यार्थियों ने श्री सांवरिया सेठ मंदिर में दर्शन किए तथा ऐतिहासिक चित्तौडग़ढ़ किले का भ्रमण किया। किले में विजय स्तंभ एवं अन्य ऐतिहासिक स्थलों के माध्यम से विद्यार्थियों ने मेवाड़ के शौर्य, वीरता, त्याग एवं बलिदान की गौरवशाली गाथाओं के बारे में जाना।
विद्यालय की प्रधानाचार्या ज्योति भारद्वाज ने कहा कि शैक्षणिक भ्रमण विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थलों का प्रत्यक्ष अवलोकन बच्चों में जिज्ञासा, रचनात्मक सोच और अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान की भावना विकसित करता है। उन्होंने कहा कि विद्यालय भविष्य में भी इस प्रकार की शैक्षणिक गतिविधियों का आयोजन करता रहेगा।
इस अवसर पर विद्यालय के चेयरमैन हरीश भारद्वाज ने कहा कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। शैक्षणिक भ्रमण विद्यार्थियों को कक्षा में अर्जित ज्ञान को वास्तविक जीवन से जोडऩे का अवसर प्रदान करते हैं। ऐसे आयोजनों से बच्चों में आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, अनुशासन, सामूहिक सहयोग एवं सामाजिक व्यवहार जैसे महत्वपूर्ण गुण विकसित होते हैं।
भ्रमण के दौरान विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया तथा शिक्षकों के मार्गदर्शन में विभिन्न ऐतिहासिक एवं दर्शनीय स्थलों के बारे में उपयोगी जानकारी प्राप्त की।
फोटो कैप्शन: उदयपुर एवं चित्तौडग़ढ़ के शैक्षणिक भ्रमण के दौरान ऐतिहासिक स्थलों पर समूह चित्र में बीआर स्कूल, सेहलंग के विद्यार्थी एवं शिक्षक।
फोटो कैप्शन 08 से 10: संबंधित हैं
बिजली कर्मचारियों की हड़ताल से दर्जनों गांवों में बिजली गुल, पेयजल संकट गहराया
95 प्रतिशत कर्मचारी हड़ताल पर रहने से जनजीवन प्रभावित, बिजली पर निर्भर दुकानदार भी परेशान
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कनीना की आवाज। बिजली विभाग के कर्मचारियों की 24 अक्टूबर तक प्रस्तावित हड़ताल का असर पहले ही दिन कनीना उपमंडल के दर्जनों गांवों में देखने को मिला। करीब 95 प्रतिशत कर्मचारी हड़ताल पर रहे, जबकि पांच प्रतिशत कर्मचारी ड्यूटी पर तैनात दिखाई दिए। बिजली आपूर्ति बाधित होने से ग्रामीणों को परेशानी का सामना करना पड़ा और पशुओं तथा इंसानों के लिए पेयजल संकट उत्पन्न हो गया।
कनीना उपमंडल के गुढ़ा, रसूलपुर, कैमला, चेलावास सहित दर्जनों गांवों में बुधवार रात करीब 9:30 से 10 बजे के बीच बिजली आपूर्ति बंद हो गई थी। इसके बाद गुरुवार को भी आपूर्ति बहाल नहीं हो पाई। गांवों में बिजली न होने से घरेलू कार्य प्रभावित हुए। हालांकि मौसम में गर्मी नहीं होने के कारण पंखों की जरूरत कम महसूस हुई, लेकिन पेयजल की व्यवस्था और बिजली से चलने वाले अन्य कार्य ठप होने से ग्रामीणों की परेशानी बढ़ गई।
हड़ताल का सबसे अधिक असर बिजली पर निर्भर दुकानदारों और छोटे कारोबारियों पर पडऩे की आशंका है। बिजली से चलने वाली मशीनों और उपकरणों के सहारे आजीविका चलाने वाले दुकानदार दिनभर खाली बैठे नजर आए। बिजली आपूर्ति बाधित रहने से उनकी रोजमर्रा की कमाई पर भी असर पड़ा।
उधर, किसी अप्रिय घटना से बचाव के लिए पावर हाउसों पर पुलिसकर्मी तैनात रहे। हड़ताल कर रहे बिजली कर्मचारी विभाग के कार्यों का निजीकरण करने और कर्मचारियों को निजी व्यवस्था के तहत काम पर लगाने के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं।
ग्रामीणों और दुकानदारों की निगाहें अब बिजली आपूर्ति बहाल होने पर टिकी हैं। देखना होगा कि विभागीय कर्मचारी कब तक काम पर लौटते हैं और प्रभावित गांवों में बिजली व्यवस्था कब तक सुचारु हो पाती है।
ग्रामीण महिलाएं पेयजल के लिए दूर दराज बनी पानी की टंकियों का उपयोग करती तथा जहां से पेयजल लाने की व्यवस्था करती नजर आई। महिलाए परेशान वहीं किसान भी परेशान रहे। इस वक्त किसान अपने खेतों की सिंचाई कर रहे हैं, उनको बिजली अभाव में कष्ट झेलने पड़े हैं चूंकि सिंचाई के लिए बिजली की आवश्यकता होती है।
फोटो केप्शन 03 व 04= कनीना का 132 केवी उपकेंद्र जहां पुलिस तैनाती एवं चंद कर्मी बैठे नजर आ रहे
किसान क्लब महेंद्रगढ़ ने सौंपा कृषि मंत्री को मांग पत्र
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कनीना की आवाज। किसान क्लब के जिला प्रधान इसराना के पूर्व सरपंच विजेंद्र सिंह चौहान ने गत दिवस कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा से चंडीगढ़ में मुलाकात की तथा मांग की जिन किसानों के फसल पंजीकरण नहीं हो सके उन्हें फिर से मौका दिया जाए तथा जमीन की उर्वरा शक्ति बनी रहे उसके लिए किसानों को जिप्सम पर सब्सिडी प्रदान की जाए ।
इसके साथ उन्होंने हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव से भी मुलाकात की और बिजली आपूर्ति में आए दिन लग रहे कट से निजात दिलाने की मांग की ताकि किसान अपनी सिंचाई समय से कर सके और आपूर्ति समय बढ़ाने की मांग की।
इस अवसर पर उनके साथ धनौंदा से बीर सिंह, पूर्व पार्षद सत्यपाल पाथेड़ा ओम तंवर, नरेश , यदुनंदन पूर्व सरपंच बेवल आदि मौजूद रहे।
फोटा कैप्शन 01: कृषि मंत्री से मुलाकात करते हुए
कनीना में डीएपी खाद आते ही किसानों की लगी भीड़, सरसों की बिजाई जोरों पर
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कनीना की आवाज। कनीना क्षेत्र में रबी फसलों की तैयारी के बीच डीएपी खाद की मांग बढ़ गई है। कनीना के इफको केंद्र तथा हैफेड केंद्रों पर डीएपी खाद पहुंचने के बाद किसानों की भीड़ लग गई। इन दिनों क्षेत्र में सरसों की बिजाई पूरे जोर-शोर से चल रही है, जबकि गेहूं की बिजाई एक नवंबर से शुरू होने की संभावना है।
किसान खेतों में अच्छी पैदावार लेने के लिए बिजाई से पहले डीएपी खाद का प्रयोग करते हैं। ऐसे में खाद की उपलब्धता किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनी हुई है। खाद केंद्रों पर डीएपी पहुंचने की सूचना मिलते ही किसान खाद लेने के लिए पहुंचने लगे।
इफको केंद्र के कार्यालय से जुड़े भरपूर सिंह ने जानकारी दी कि उनके पास डीएपी खाद के 500 बैग आए हैं। प्रत्येक किसान को तीन बैग डीएपी खाद दिए जा रहे हैं, ताकि अधिक से अधिक किसानों को खाद उपलब्ध हो सके।
किसानों का कहना है कि सरसों की बिजाई के चलते खाद की जरूरत बढ़ गई है। वहीं, गेहूं की बिजाई का समय भी नजदीक आ रहा है। ऐसे में किसानों को उम्मीद है कि आगामी दिनों में खाद की आपूर्ति सुचारु बनी रहेगी, जिससे उन्हें फसलों की बिजाई में परेशानी का सामना न करना पड़े।
फोटो कैप्शन 02: डीएपी के लिए इफको में भीड़
पोर्टल का लिंक नहीं मिलने से वालंटियर शिक्षकों के आवेदन अटके
-पूर्व सैनिकों और पूर्व शिक्षकों ने सरकार से पोर्टल शीघ्र शुरू करने की मांग की
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कनीना की आवाज। हरियाणा के मुख्यमंत्री द्वारा गत दिनों वालंटियर शिक्षक रखने के लिए पोर्टल खोलने की घोषणा के बावजूद इच्छुक अभ्यर्थियों को आवेदन करने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री की ओर से पोर्टल लांच होने की बात कही गई थी, लेकिन अभ्यर्थियों का कहना है कि अभी तक उन्हें पोर्टल का लिंक उपलब्ध नहीं हो पाया है। ऐसे में वे आवेदन कहां और कैसे करें, इसे लेकर असमंजस में हैं।
पूर्व सैनिकों रमेश, सुनील और दिनेश तथा पूर्व शिक्षकों हमीर और सुरेंद्र सहित अन्य इच्छुक अभ्यर्थियों ने सरकार से मांग की है कि वालंटियर शिक्षकों के पंजीकरण के लिए पोर्टल का लिंक जल्द सार्वजनिक किया जाए, ताकि वे सरकारी स्कूलों में वालंटियर के रूप में अपनी सेवाएं दे सकें।
उन्होंने कहा कि सरकार पहले ही इस संबंध में घोषणा कर चुकी है और वालंटियर के रूप में कार्य करने के लिए किसी प्रकार का मानदेय या पारिश्रमिक नहीं दिया जाएगा। इसके बावजूद आवेदन प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होने से इच्छुक लोग अपनी सेवाएं देने से वंचित रह रहे हैं।
पूर्व सैनिकों और पूर्व शिक्षकों ने शिक्षा विभाग तथा सरकार से मांग की है कि पोर्टल को शीघ्र चालू कर आवेदन प्रक्रिया, पात्रता और आवश्यक दिशा-निर्देश सार्वजनिक किए जाएं, ताकि स्कूलों में जरूरत के अनुसार वालंटियर शिक्षकों की सेवाएं ली जा सकें।
कई समस्याओं से जूझ रहे हैं कनीना के किसान
-रबी फसल पैदावा
र लेना तलवार की धार
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कनीना की आवाज। क्षेत्र के किसान कई समस्याओं से जूझते आ रहे हैं। पैदावार लेने के लिए बिजली, पानी, खाद, गिरते जलस्तर, बीजों की जानकारी अभाव तथा कई अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में रबी फसल पैदावार लेना तलवार की धार के समान है।
कनीना क्षेत्र का किसान यूं तो सदा ही मेहनत के बलबूते पर जीवित रहा है। कठिन परिश्रम करके अपनी आजीविका कमा रहा है। उसकी मुख्य फसलें खरीफ एवं रबी की होती है। खरीफ की फसल वर्षा पर आधारित होती है। पहले ही भू-स्तर गिरता जा रहा है ऊपर से डार्क जोन घोषित होने से नलकूप खोदना आसान नहीं रहा है। वैसे भी नलकूप लगाना लाखों रुपये का खर्चा होता है। यह भी सत्य है कि प्रतिवर्ष उसके बिजली के उपकरण जलने की समस्या रहती है। जैसे तैसे उपकरण ऋण लेकर लगा भी देता है तो पानी की समस्या फिर भी आड़े आ जाती है क्योंकि बिजली कम आती है जिसके चलते पर्याप्त खेतों की सिंचाई नहीं हो पाती है। इस संबंध में कुछ किसानों से चर्चा की गई जिनके विचार निम्र हैं--
**कनीना क्षेत्र में नहरों की संख्या काफी है किंतु या तो उनमें पानी आता ही नहीं या फिर वह पानी पीने के लिए ही सप्लाई होता है। इस पानी को किसान ले नहीं सकते। खादों की कमी विगत वर्ष से अधिक चल रही है। बीज और दवाइयां भी तो अ'छे नहीं मिलते हैं। मिल भी जाते हैं तो अति महंगे होते हैं। किसान रूढि़वादी होने के कारण भी परेशान हैं क्योंकि वे नए बीजों का उपयोग करने की बजाए पूर्व में उपयोग करते आ रहे बीजों का ही उपयोग करना श्रेष्ठ समझते हैं।
---भरत सिंह किसान
किसानों के सामने गिरते जलस्तर की समस्या भी तो विकराल बन रही है क्योंकि किसान प्रत्येक वर्ष डीप बोर करवाता है किंतु अगले वर्ष वह जलस्तर भी घट जाता है। ऐसे में दक्षिण हरियाणा का किसान हताश व निराश लगता है। उससे बात करने पर कृषि को घाटे का सौदा बताता है। इन हालातों में उसके लिए फसल पैदावार लेना तलवार की धार पर चलने के समान है।
---रोहित कुमार, किसान
कई कई सालों तक ट्यूबवेल कनेक्षन नहीं मिलता है जिससे कुछ पैदावार लेना चाहे वो नहीं ले पाता है। किसान कुआं खोद ले तो कनेक्षन के लिए मारे मारे फिरते रहो। परेशान होकर बैठ जाता है।
---सूबे सिंह, किसान
आवारा जंतु फसल को तबाह कर जाते हैं। अब तो बंदर, नीलगाय, कुछ सुअर, कुछ अन्य आवारा जंतु भी खड़ी फसल पर धावा बोल देते हैं। किसान मायूस मिलता है। इन पर काबू करना कठिन है।
--अजीत कुमार, किसान
फोटो कैप्शन: अजीत कुमार, सूबे सिंह, रोहित कुमार, भरत सिंह
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