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Sunday, January 18, 2026



 
40,000 रुपये की खल और गुड़ दिया गौशाला को दान
--सेठ कैलाश चंद ने किए 51000 रुपये भेंट
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कनीना की आवाज।
 कनीना निवासी मनोज कुमार यादव ग्रीवेंस कमेटी के सदस्य ने अपनी पत्नी उर्मिला के साथ कनीना की श्रीकृष्ण गौशाला में आकर अपनी माता की पुण्यतिथि पर गायों के लिए 40 हजार रुपए की खल एवं गुड़ लाकर दान दिया और गायों को खिलाया।
 वही गत दिवस गौशाला में सेठ कैलाश चंद धनौंदा वाले ने गौशाला में आकर गौवंश को गुड़ खिलाया और 51 हजार रुपये भेंट किये। समस्त गौशाला कार्यकारिणी ने उनका अभिनंदन किया। इस मौके पर प्रधान भगत सिंह, बलवान सिंह आर्य, प्रवेश शर्मा, निरंजन लाल शर्मा, मास्टर रामप्रताप, एडवोकेट अभिषेक यादव, सुधीर यादव, सुनील यादव, मधुर राव, सौम्या राव, दिलावर सिंह बाबूजी, रामपाल यादव, नवीन यदुवंशी, सत्यवीर गूगनवाला, कृष्ण कुमार गुरुजी, नरेश यादव, डा. रमेश यादव, वेद प्रकाश यादव आदि उपस्थित रहे।
 फोटो कैप्शन 6: गौशाला में गायों के लिए गुड़ एवं खल भेंट करते मनोज कुमार


कनीना के अस्पताल एवं पेयजल सप्लाई को जोड़ा जाए हाटलाइन से
-कभी दोनों जुड़े थे हाटलाइन से
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कनीना की आवाज।
 कनीना की पेयजल सप्लाई और उप-नागरिक अस्पताल को हाटलाइन से जोड़ा जाए। यह मांग क्षेत्र के अनेक लोगों ने की है। कनीना क्षेत्र के विजय कुमार, सुनील कुमार ,दिनेश कुमार, महेश कुमार ,रवि कुमार आदि ने बताया कि कभी पेयजल सप्लाई हाटलाइन से जुड़ी हुई थी। मोटी केबल द्वारा हाटलाइन से जोड़ा गया था जिससे निर्बाध से बिजली सप्लाई होती रहती थी और पेयजल सप्लाई पूरे कनीना में नियमित रूप से होती थी किंतु जब से मोटी केबल लाइन को हटाकर एल्यूमिनियम की तारे बिछी है और उनसे कनेक्शन विभिन्न लोगों को दे दिया गया है तब से बार-बार बिजली फाल्ट हो जाती है और पेयजल सप्लाई बाधित हो जाती है। कनीना में जहां रविवार को बार-बार पेयजल सप्लाई बाधित रही क्योंकि बार-बार बिजली फाल्ट आ रहा था। ऐसे में यदि फिर से कनीना के पेयजल सप्लाई को हाटलाइन से जोड़ दिया जाए तो पेयजल की सुचारू रूप से व्यवस्था चलती रहेगी। हालात यह है कि कनीना में पेयजल सप्लाई के लिए जो लाइन बिछाई गई है वह नहर के साथ-साथ रेवाड़ी रोड़ की ओर गई है और इसके समानांतर एक और बिजली की लाइन चल रही है। दो-दो लाइन लगाकर सरकार को नुकसान किया जा रहा है। ऐेसे में एक ही लाइन से सभी को जोड़ दिए जाएं या फिर मोटी केबल द्वारा बिजली सप्लाई को पेयजल सप्लाई तक अलग से जोड़ा जाए।
 यही हालात कनीना के उप-नागरिक अस्पताल की है। उप-नागरी अस्पताल में हाटलाइन न होने से समस्या बनी रहती है। किसी प्रकार की छोटा-मोटा आपरेशन या मरीजों की शिकायत सुनते वक्त सुचारू रूप से बिजली नहीं होना एक समस्या बन सकता है। ऐसे में कनीना उप नागरिक अस्पताल को भी हाटलाइन से जोड़ा जाना चाहिए।
फोटो कैप्शन 10: संबंधित है





 दूरदराज के लोगों को प्रेरणा दे रहा है कनीना का नेताजी मेमोरियल क्लब
-आयोजित होते हैं खेलकूद , 23 जनवरी को करते नेताजी को याद, इस वर्ष होंगे खेल
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कनीना की आवाज
।कनीना बस स्टैंड के पास स्थापित नेताजी मेमोरियल क्लब नेताजी सुभाष चंद्र बोस की याद दिला रहा है। क्लब दूरदराज के लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
 इस क्लब की स्थापना 27 अगस्त 1974 को कनीना के स्वर्गीय प्राचार्य सत्यनारायण यादव ने की थी। तत्पश्चात 22 जुलाई 2014 को फिर से इसका रजिस्ट्रेशन करवाया गया। प्रारंभ में नेताजी मेमोरियल क्लब कनीना में स्थित स्मारक पर कस्बे के विभिन्न शहीदों एवं स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें लगी हुई थी किंतु जिन्हें शहीदी दिवस के मौके पर याद किया जाता था। जब-जब आजादी की बात चलती इन शहीदों को याद किया जाता रहा किंतु 23 जनवरी 2016 को सभी शहीदों की मूर्तियां पुस्तकालय में स्थापित कर दी गई। पुस्तकालय नेताजी मेमोरियल क्लब के अंदर ही स्थित है जबकि नेताजी के नाम से अलग स्मारक स्थापित करके नेताजी की प्रतिमा स्थापित करवा दी गई। यह स्मारक दूर-दराज तक दिखाई देता है। वास्तव में नेताजी की प्रतिमा इस क्लब में 23 जनवरी 2016 को स्थापित की गई थी। पहले शहीदों को याद करने के लिए भी नेताजी मेमोरियल क्लब पहुंचते थे किंतु पूर्व एसडीएम संदीप सिंह ने शहीदों के लिए बाबा मोलडऩाथ आश्रम के पास 26 जनवरी 2018 को अलग से शहीद स्मारक बनवा दिया। शहीद स्मारक पर जहां कनीना उपमंडल के 44 विभिन्न शहीदों के नाम अंकित है वही इन शहीदों में जल, थल और वायु सेना में हुए शहीदों के नाम वर्णित हैं।
 तत्पश्चात शहीदों के कार्यक्रम को शहीद स्मारक पर आयोजित किया जाने लगा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का 23 जनवरी पर जन्मदिन मनाया जाता है। कनीना के इस क्लब में पुराने समय से फुटबाल प्रतियोगिता आयोजित की जाती रही है जो कभी कभी-कभी बंद हो जाती हैं। इस क्लब में ही कभी पुलिस चौकी तो वर्तमान में पुलिस स्टेशन स्थापित है।
राव मोहर सिंह पूर्व प्रधान का कहना है कि हर वर्ष नेताजी मेमोरियल क्लब पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं तथा लोगों में देशभक्ति का ज्ञान भरने का काम करता है। वे लोगों के लिए सदा प्रेरणास्रोत रहेंगे।
उधर विनय एडवोकेट पूर्व प्रधान का कहना है कि उनके पिता ने भावी सोच को रखते हुए इस क्लब की स्थापना की थी। यह क्लब सदा नेताजी की याद दिलाता रहेगा तथा लोगों में देशभक्ति के भाव भरता रहेगा।
फोटो कैप्शन 11: नेताजी मेमोरियल क्लब कनीना में स्थापित नेताजी बोस की प्रतिमा।






हरियाणा में दस्तक दे रही है खजूर की खेती
-विभाग दे रहा है 1.40 लाख रुपये का अनुदान
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कनीना की आवाज।
हरियाणा का बहुत सा भू-भाग राजस्थान से सटा होने के कारण राजस्थान में बेहतर पैदावार देने वाली खजूर की खेती दस्तक दे रही है। रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ जिलों में दो दर्जन किसान खजूर उगाकर लाभ की लाइन में चल रहे हैं। सरकार खजूर की खेती उगाने पर 1.40 लाख रुपये का अनुदान दे रही है जो तीन किस्तों में 84 हजार प्रथम वर्ष, दूसरे और तीसरे वर्ष 28-28 हजार देती है। 1 एकड़ में 61 पौधे मादा तथा 2 पौधे लगाने पड़ते हैं। 4 साल बाद पैदावार देने लग जाते हैं। एक खजूर के पेड़ से 25 से 30 किलो खजूर प्राप्त होते हैं। जब 7- 8 साल का हो जाता है तो 2 क्विंटल तक खजूर प्रति प्रदान करता है। टिशू कल्चर लैब से यह पौधे लिए जा सकते हैं।
खजूर विभिन्न रंगों में मिलते हैं तथा इन्हें बगैर सुखाये भी बाजार में बेचा जाता है वही सुखाकर भी मेवे के रूप में बाजार में उपलब्ध करवाया जाता है। खजूर के खाने के अनेकों लाभ है। खजूर कब्ज की समस्या को रोकता है इसलिए जिनको कब्ज है उन्हें खजूर पर्याप्त मात्रा में खाना चाहिए। खजूर की लंबी पत्तियां करीब 6 मीटर तक होती हैं। इसका वैज्ञानिक नाम फिनिक्स डैक्टाइलिफेरा है। यह पौधा राजस्थान में भी बेहतर रूप में पनपता है। माना जाता है खजूर सबसे पहले इराक और अरब देशों में उगाया जाने लगा। इसके बीज भी कारगर होते हैं जो कास्मेटिक और साबुन बनाने के काम में लाये जाते हैं।
 वैसे तो ताजा खजूर अगस्त से दिसंबर महीने तक ही मिलते हैं लेकिन उसको सूखे मेवे के रूप में वर्ष भर प्राप्त कर सकते हैं। खजूर की 200 से अधिक किस्में पाई जाती है जिनमें एक दर्जन किस में अधिक मात्रा में मिलती है। खजूर सेहत के लिए बहुत लाभप्रद माने जाते हैं क्योंकि फल भी है और सूखे मेवे के रूप में भी प्रयोग में लाए जाते हैं। इनमें कैल्शियम, पोटेशियम, प्रोटीन, मैग्नीज मैग्नीशियम, फास्फोरस, जिंक, विटामिन, बी-6, विटामिन-ए तथा विटामिन-के आदि पाए जाते हैं। वही कार्बोहाइड्रेट, लोहा, वसा, रुक्षांस, फैटी एसिड भी पाए जाते हैं।
खजूर हृदय के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसमें एंटी आक्सीडेंट पाए जाते हैं जो कालस्ट्राल को खत्म करता है। इसलिए हृदय संबंधी रोगों को बचने के लिए खजूर लाभप्रद होता है।  खजूर हड्डियों को भी स्वस्थ रखता है क्योंकि इसमें मैग्नीशियम, तांबा ,मैंगनीज, सेलेनियम आदि पाए जाते हैं जो हड्डियों को मजबूत बनाते हैं। खजूर रक्तचाप को भी नियंत्रित करता है क्योंकि इसमें पोटेशियम तत्व पाया जाता है जो गुर्दे की पथरी से भी बचाता है। इसमें मैग्नीशिया मिलता है जो हृदय और रक्त वाहिकाओं के लिए लाभप्रद होता है। खजूर शरीर में ऊर्जा प्रदान करता है क्योंकि इसमें शुगर, ग्लूकोज एवं फ्रक्टोज आदि पाए जाते हैं। खजूर सूजन और दर्द से लडऩे की क्षमता भी रखता है क्योंकि प्रतिरक्षी प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण है। यौन स्वास्थ्य के लिए भी खजूर बहुत महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि समय 23 विभिन्न प्रकार की एमिनो एसिड मिलते हैं।
खजूर गर्भवती महिलाओं के लिए भी लाभप्रद होते हैं क्योंकि यह ऊर्जा प्रदान करता है वही प्रतिरक्षी तंत्र को भी मजबूत बनाता है। मस्तिष्क को स्वस्थ रखता है। यही नहीं कैंसर जैसे घातक रोगों से भी बचाता है। वजन बढ़ाने में भी लाभप्रद है। यहां तक की विभिन्न रोगों से बचाव, मांसपेशियों के विकास, एनीमिया जैसी घातक बीमारी से बचाता है। आंतों के विकार का इलाज, स्वस्थ त्वचा आदि में भी महत्वपूर्ण होता है।
सूखे खजूर खजूर को प्राय छुहारा कहते हैं जो खाने के काम आता है।
वास्तव में खजूर की दो प्रकार होती है नर और मादा। अति एक्सपर्ट लोग फूलों द्वारा भी नर और मादा की पहचान कर लेते हैं किंतु टिशू कल्चर द्वारा ही सही सही पता लग पाता है। टिशू कल्चर राजस्थान के जोधपुर, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में उपयोग में लाई जाने वाली विधि है। खजूर का पौधा 80 से 100 वर्ष तक जीवित रहता है इसलिए इंसान अपने जीवन के प्रारंभ में लगाए उसके पूरे जीवन तक खजूर प्रदान करता रहता है। खजूर चौथे साल में जहां एक पौधा 20 से 25 किलो खजूर देने लग जाता है। ऐसे में इसका भाव 50 रुपये किलो लगाए तो भी करीब 65 हजार रुपये प्रति एकड़ की आय होती है और ज्यों ज्यों पौधा बड़ा होता चला जाता है तो कि एक पौधा दो क्विंटल तक फल प्रदान करता है। जिससे पैदावार कई लाख रुपए पहुंचाती है। खजूर को प्रोसेस करके शर्बत,जैम, चटनी,गुड़, विभिन्न प्रकार के आचार गुण तथा मेवे बनाने के काम में लाया जाता है।
 ताजा फल बाजार में बिकता है जिसकी गुठली छोटी होती है। रेहडिय़ों पर लोग बड़े चाव से इस फल को खाते हैं। जोधपुर में अतुल डेट पाम ट्री के एग्रोनॉमिस्ट राकेश पारिक से संबंध में बात की उन्होंने बताया कि इस पौधे की अधिक देखभाल की जरूरत नहीं होती है। एक बार पौधा लगा दिया जाए दो पौधों के बीच में काफी जगह होती है जहां कुछ सब्जियां उगाई जा सकती है। जब पौधा बड़ा हो जाता है छाया भी बढ़ जाती है जिसके चलते इनके नीचे सब्जियां कम पैदावार देती है किंतु इसके फल अधिक लगते हैं। फलों से लदा  यह पौधा अति सुंदर लगता है। वही इस पौधे के लिए सामान्य खाद की जरूरत होती है। अन्य फसल या बागवानी की बजाय इस पर कम देखरेख करनी पड़ती है। यही कारण है कि रेगिस्तान जैसे क्षेत्रों में भी इस पौधे को अच्छी प्रकार उगाया जाता है तथा फल प्राप्त किए जाते हैं।
धीरे धीरे मेरे हरियाणा के विभिन्न जिलों में सरकार के अनुदान के चलते किसानों का रुझान बढऩे लगा है। अब किसान खजूर की के पौधे उगाने पर लालायित हो रहे हैं और उन्हें जोधपुर से टिशू कल्चर फार्म से ही लाने पड़ते हैं जहां नर एवं मादा पौधों की पहचान हो जाती है। एक बार पौधे उगाए जाए तो 4 साल तक महज देखरेख करनी पड़ती है। सबसे बड़ी विशेषता है कि इन पौधों को जीव जंतु कम खाते हैं ।इसलिए भी ये पौधे सुरक्षित रहते हैं। किसान चाहे तो इन पौधों को उगाकर इनके फलों को प्रोसेस भी कर सकता है वरना इनके ताजा फलों को तोड़कर बाजार में बेच सकता है। फलों के प्रति भी लोगों का रुझान बढ़ रहा है। यह सबसे बड़ी विशेषता है किस फल को सुखाकर मेवे के रूप में लंबे समय तक प्रयोग किया जा सकता है जो खराब नहीं होता है। ऐसे में दक्षिण हरियाणा के लिए यह आम के आम गुठली के दाम के रूप में काम में लाया जाता है।
जिला उद्यान अधिकारी मनदीप यादव रेवाड़ी ने बताया की यह पौधे जोधपुर, महाराष्ट्र, गुजरात आदि क्षेत्रों से प्राप्त किए जा सकते हैं। अकेले रेवाड़ी जिले में हाजीपुर, कैप्टन अजय सिंह फार्म, जैनाबाद, धारण, बालधन आदि स्थानों पर खजूर की खेती की जाने लगी है। डा प्रेम सिंह डीएचओ नारनौल ने बताया कि महेंद्रगढ़ में महरमपुर, मुंडिया खेड़ा, धोलेड़ा, रसूलपुर  सहित कई गांवों में विगत वर्ष से खजूर की खेती की जा रही है। हिसार जैसे शहरों में तो खजूर रेहड्यिों पर मिलते हैं। खजूर विटामिन, खनिज लवण, शूगर आदि से भरपूर है। खजूर से शरबत, जैम, चटनी आदि बनाए जा सकते हैं। यह स्वास्थ दिमाग,कालस्ट्राल संतुलित रखने ,एनीमिया रोकने और एंटीऑक्सीडेंट की भरपूर पदार्थ है जिसमें फाइबर पर्याप्त मात्रा में मिलता है। इसे डेट पाम ट्री कहते हैं।
 उधर जोधपुर के टिशू कल्चर करने वाले राकेश पारीक ने बताया कि वे 10 सालों से खजूर पर काम कर रहे हैं तथा खजूर से विभिन्न पदार्थ तैयार किए जाते हैं। एक एकड़ में मैच 64 पौधे लगाये जाते हैं 80 सालों तक फल देते हैं। इनकी देखरेख अधिक नहीं करनी पड़ती तथा खाद आदि सामान्य डाला जाता है। अन्य बागवानी पौधों की अपेक्षा इन पर का मेहनत कम करनी पड़ती है ।
फोटो साथ हैं



40 सालों पहले होती थी जमकर चने की खेती
-शून्य एकड़ पर पहुंचा अब चना
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कनीना की आवाज।
किसान चने की खेती करना भूलते जा रहे हैं। अब न तो जौ की खेती होती और न राबड़ी एवं धानी। इसी प्रकार भूने हुये, टाट, छोल्ला, होला, चटनी, कुट्टी का जायका खत्म हो चुका है।  
  1986-87 तक कनीना क्षेत्र की करीब 33 हजार हेक्टेयर भूमि होती थी जिस पर हजारों एकड़ में चने की खेती की जाती थी। वैसे गेहूं-चना एवं जौ -चने की मिश्रित खेती की जाती थी। 1982 में स्प्रिंकलर












फव्वारा आया जिसके चलते चने की खेती घटती जा रही है और वर्तमान में तो चना अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। कनीना उपमंडल के सभी गांवों में कोई चना नहीं उगाया गया है। लोग अपने प्लाट पर चने को जरूर उगा देते हैं। यही कारण है कि अब तो कनीना में हरे चने के पौधे भी बिकने लगे हैं।
तीन दशक पूर्व कनीना क्षेत्र में चने की पैदावार सर्वाधिक होती थी जो अब शून्य हेक्टेयर पर चला गया है। किसी एक या दो क्यारी में किसान चना उगाते हैं। दालों भावों में तेजी आ रही है। विगत 2014 में महज तीस हेक्टेयर में चना उगाया था। वर्ष 2015 में 52 हेक्टेयर पर चने की बीजाई की गई थी। 2015 से 2018 तक भी चने की महज 70 से 80 हेक्टेयर बिजाई की गई थी जो 2020 तक 10 हेक्टेयर से कम सिमट कर रह गया है। 2022 में शून्य पर चला गया है। वर्ष 2023 में 8 एकड़ पर उगाया गया जो अब शून्य पर पहुंच गया है।
 कभी विवाह शादी में अवश्य लड्डू बनाए जाते थे किंतु अब जब किसी के शादी होती है तो लड्डू के लिए चने दूर दराज से लाने पड़ते हैं। पूर्व शिक्षा अधिकारी रामानंद यादव आज भी चना उगाते हैं। वर्तमान में कुओं द्वारा सिंचाई की जाती है जो चने के लिए प्रतिकूल है। चना बहुत कम पानी में ही पैदावार देता है।
 बुजुर्ग राजेंद्र सिंह, सूबे सिंह, कृष्ण कुमार, योगेश कुमार का कहना है कि कभी इस क्षेत्र में चने की खेती की जाती थी तो चने की सब्जी, चने की रोटी, मेसी रोटी, हरे चने की चटनी, खाटा का साग, कढ़ी, परांठे व कई अन्य सब्जियों में डालकर जायका लिया जाता था। जब तक चना सूख न जाता था तब तक चने को खाते रहते थे। यद्यपि चने का भाव बेहतर है किंतु पैदावार नहीं होती है। अब तो जौ चने का स्थान सरसों एवं गेहूं ने ले लिया है। यदि चने की पैदावार घटती गई तो मेसी रोटी, लड्डू संकट में पड़ जाएंगे।
क्या कहते हैं पूर्व कृषि अधिकारी डा. देवराज-
वर्तमान में छोटे-छोटे खेत हो गए जिनमें जरूरत रूपी फसलें उगाई जाती है। वैसे भी बाजार में रेट कम होने के कारण लोग गेहूं एवं सरसों को उगाते हैं और गाय, भैंस आदि पालने वाले किसान भी गेहूं पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग में लेते हैं। यही हालात चने की है। परंतु चने की पैदावार में सबसे बड़ी मुसीबत भूमिगत जमीन के खारे पानी की है। लगता है जल मीठा है किंतु वह दाल देने वाली फसलों के लिए अच्छा नहीं है। वर्षा का पानी मिलता नहीं। कभी वर्षा पर आधारित चने की खेती होती थी किंतु अब धीरे-धीरे पैदावार घट गई है। आम आदमी की जरूरत में कम काम आता है, इसलिए भी किसान पैदावार के रूप में चने की बजाय गेहूं सरसों लेते हैं।
  क्या कहते हैं डा. रामानंद यादव-
परंतु कनीना के पूर्व खंड शिक्षा अधिकारी कनीना डा. रामानंद यादव ने बताया कि वे शिक्षा विभाग से वर्ष 2015 में सेवानिवृत्त हुए थे तब से लगातार चने की खेती करते आ रहे हैं। डीगरोता गांव में आज भी एक एकड़ पर चने की खेती की हुई है। वे हर वर्ष चने की बेहतर पैदावार लेते आ रहे हैं।
फोटो कैप्शन 03 व 05: रामानंद चने की खेती करते हुए



कनीना न्यायिक परिसर के पास सैकड़ों लोगों को नहीं मिल रहा आने-जाने का रास्ता
-आंदोलन पर उतारू
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कनीना की आवाज।
 कनीना बस स्टैंड पर जहां प्रशासनिक परिसर का निर्माण त्वरित जो गति से चल रहा है लगभग पूर्ण होने को जा रहा है किंतु सबसे बड़ी समस्या उसके आसपास करीब सैकड़ों परिवारों की बन गई है कि उनके लिए अब आने जाने का रास्ता ही बंद हो जाएगा। ये लोग आक्रोश में है और अब आंदोलन पर उतारू हैं। लोगों ने आज बताया कि उनके लिए सीवर लाइन नगर पालिका द्वारा प्रदान गई थी, पेयजल सप्लाई की लाइन भी बिछी हुई है। उन्हें बताया गया था कि न्यायिक परिसर बनेगा तब उनके लिए रास्ता छोड़ दिया जाएगा किंतु अब रास्ते को भी बंद किया जा रहा है जिसको लेकर के सैकड़ों की संख्या में लोग इकट्ठे हुए और उन्होंने और रोष जताया। उनका कहना है कि या तो सरकार उनके लिए आने जाने का रास्ता छोड़ें अन्यथा आंदोलन करेंगे।
 इस संबंध में महेश बोहरा, कृष्ण कुमार, होशियार सिंह पार्षद, धर्मेंद्र ,कृष्ण कुमार, रतन लाल, रजनीश, सूबे सिंह, प्रेम सेठ, अशोक बागवाला आदि ने वह स्थान दिखाते हुए बताया कि अब तक यह रास्ता था किंतु अभी इस रास्ते को भी बंद किया जा रहा है। उन्होंने सरकार के प्रति रोष जताया और अविलंब कार्रवाई करने की मांग की है ताकि उनका रास्ता किसी प्रकार बंध न हो। उन्होंने बताया कि करीब 400 से 500 लोग इस क्षेत्र में रह रहे हैं जिनके लिए रास्ता बंद होने के आसार बन गए हैं।
 क्या कहते हैं प्रापर्टी के एक्सपर्ट -
प्रापर्टी के एक्सपर्ट भगत सिंह कनीना निवासी ने बताया कि जब कनीना क्षेत्र में साठ के दशक में चकबंदी हुई थी तब सभी जगह चक बना दिए गए थे ।केवल गोचर भूमि को यूं ही छोड़ दिया गया था। जिन किसानों के खेत गोचर भूमि के पास  लगते थे अर्थात चक लगते थे उनके रास्ते अलग से नहीं छोड़े गये थे अपितु उनके रास्ते गोचर भूमि से जोड़ दिए गए थे। ताकि वो किसान गोचर भूमि से होकर गुजर सके। उन्होंने बताया कि जहां न्यायिक परिसर बन रहा है वहां भी कभी गोचर भूमि होती थी। यहां खंड कार्यालय बना तत्पश्चात विभिन्न कार्यालय बने किंतु इसके आसपास के किसानों के रास्ते इसी गोचर भूमि से होकर गुजरते हैं। यह गोचर भूमि तत्पश्चात नगरपालिका के तहत चली गई है इसलिए नगरपालिका को चाहिए कि वह उनके लिए रास्ता दे। उन्होंने बताया कि कभी डीएवी शिक्षण संस्थान का निर्माण किया गया था जो गोचर भूमि में स्थित है। और उसके आसपास किसानों के लिए रास्ते बंद कर दिए गए थे। तत्पश्चात वे किसान न्यायालय में पहुंचे और न्यायालय ने उन्हें गोचर भूमि से गुजरने अर्थात डीएवी शिक्षण संस्थान से होकर गुजरने का रास्ता दिया जो आज भी चल रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे में इनका हक जायज उनके रास्ते जरूर मिलने चाहिए।
 फोटो कैप्शन 02: रास्ते को लेकर रोष जताते हुए क्षेत्र के लोग





अधिवक्ता अनुप्रिया की स्थायी लोक अदालत के सदस्या के रूप में हुई नियुक्ति
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कनीना की आवाज।
गांव फतेहपुर की बेटी अधिवक्ता अनुप्रिया की स्थायी लोक अदालत के सदस्य के रूप में नियुक्ति हुई है। स्थायी लोक अदालत जन उपयोगी सेवाओं से संबंधित विवादों के निपटारे का महत्वपूर्ण मंच है जो परिवहन, डाक सेवाएं, बिजली की आपूर्ति, स्वच्छता, अस्पताल और बीमा से संबंधित मामलों को संभालती है । अधिवक्ता अनुप्रिया के पिता सेवानिवृत्त मुख्याध्यापक हैं जबकि उनके पति संजय यादव सिविल कोर्ट नारनौल में अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस कर रहे हैं। अनुप्रिया ने अपनी नियुक्ति पर खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि यह मेरे लिए एक बड़ा अवसर है। मैं अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाऊंगी और जन उपयोगी सेवाओं से संबंधित विवादों को सुलझाने में मेरा योगदान रहेगा ।
 अनुप्रिया की नियुक्ति पर बार एसोशियशन नारनौल व अटेली एवं कनीना के वकीलों ने बधाई दी है।
फोटो कैप्शन 04: अधिवक्ता अनुप्रिया की स्थायी लोक अदालत की सदस्य के रूप में






शीतकालीन अवकाश के बाद सोमवार को खुलेंगे सभी स्कूल
-अवकाश दौरान चले कई कार्यक्रम
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कनीना की आवाज।
 एक जनवरी से सरकारी और गैर सरकारी स्कूलों में शीतकालीन अवकाश शुरू हो गए थे। शीतकालीन अवकाश के बाद 16 जनवरी को स्कूल खुलने थे किंतु  बढ़ती सर्दी को देख सरकार ने अवकाश बढ़कर 18 जनवरी तक कर दिये थे और अब 19 जनवरी सोमवार को फिर से स्कूल खुलेंगे।
विस्तृत जानकारी देते हुए प्राचार्य नरेश कौशिक ने बताया कि सरकार के आदेशानुसार 19 जनवरी को सरकारी स्कूल फिर से खुल जाएंगे। इन दिनों में बहुत से स्कूलों में जहां विभिन्न गतिविधियां चली है, एनएसएस शिविर चले हैं, कौशल विकास संबंधी कार्यक्रम चले हैं, गोष्ठियां भी हुई हैं। अब विधिवत रूप से स्कूल खुलेंगे और विद्यार्थी एक बार फिर से सर्दी में स्कूल जाएंगे।   उल्लेखनीय है कि अभी सर्दी का माहौल है और सर्दी के माहौल में विद्यार्थी स्कूल पढऩे के लिए जाएंगे।



कनीना क्षेत्र में फिर से बदला मौसम
-रविवार सुबह सवेरे छाया रहा कोहरा
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कनीना की आवाज।
 कनीना क्षेत्र में एक बार फिर से मौसम बदल गया है। अचानक सुबह सवेरे रविवार को कोहरा छाया रहा। यह कोहरा करीब 2 घंटे चला तत्पश्चात फिर से सूर्य चमकने लगा और धूप खिली। बार-बार कनीना क्षेत्र में मौसम बदल रहा है। कभी सर्दी तो कभी बरसात, कभी पाला पड़ता है लगातार मौसम बदलने से किसान चिंतित है लेकिन अभी तक फसलों में किसी प्रकार के नुकसान की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। जहां कोहरा छाने से फसलों को लाभ मिलने की उम्मीद बन गई है। किसान खुश है क्योंकि फसलों को लाभ मिलेगा।
  पूर्व विषय विशेषज्ञ डा. देवराज का कहना है कि कोहरे से नमी बनी रहती है जिससे फसलों में पानी देने की कम आवश्यकता होती है।
फोटो कैप्शन 01: फोटो कैप्शन एक छाया हुआ कोहरा





प्राचार्य कुतरूं के कारनामें-03
आज भी शेर सिंह से डरता है कुतरूं प्राचार्य
-....तब तो वो आपका गुरु निकला
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कनीना की आवाज।
 कनीना निवासी डा. होशियार सिंह यादव जहां करीब 40 वर्षों तक शिक्षा के क्षेत्र में जमे रहे। उन्होंने अपने जीवन में कई हजार विद्यार्थियों को शिक्षा दी है। उन्होंने करीब 35 विभिन्न मुख्याध्यापकों एवं प्राचार्यों के साथ काम किया और करीब 35 ही स्कूलों/कालेजों में अपनी सेवा दी है। वैसे तो डा. होशियार सिंह की कृति -मेरी शिक्षा का सफर में विस्तार से बताया जा चुका है। सेवा दौरान अनेक कष्ट और समस्याएं झेलनी कुतरूं जैसे प्राचार्यों के कारण वहन करनी पड़ी है। डा. होशियार सिंह के अनेक लाभ जो प्रदेश के बहुत से स्टेट अवार्डी शिक्षक ले रहे हैं वो भी आज तक नहीं दिए क्योंकि साफ छवि और मेहनतकश शिक्षकों की तरफ बहुत कम लोग मिलते और बोलते हैं। डा. होशियार सिंह ने सदा ही कुर्सी पर बगैर बैठे पढ़ाया और नाम कमाया है। इस अवधि में कुछ ऐसे प्राचार्य मिले जिनका नाम लेते वक्त भी फक्र होता है जबकि कुछ ऐसी प्राचार्य भी मिले जिनके  नाम लेते हुए भी ऐसा महसूस होता है जैसे किसी गंदगी में हाथ लग गया हो। इसी दौरान उनके कारनामे भी सामने लाने पड़े हैं क्योंकि एक नहीं दो-तीन कुतरूं प्राचार्य मिले हैं जिनके कारनामे एपिसोड के रूप में पेश किए जाएंगे। किंतु पूर्ण रूप से नाम सहित गाथा पढऩे के लिए मेरी भविष्य प्रकाशित होने वाली पुस्तक कुतरूं प्राचार्य के कारनामे जरूर पढऩे का कष्ट करें।
पहले तो लघुकथा-
 शेर सिंह आपका गुरु है लघुकथा पढ़े-
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प्राचार्य कुतरूं ने स्टाफ समक्ष अपना राग अलापते हुए कहा- मैंने शेर सिंह को सीधा कर दिया। वह बहुत उछलता था। कितनी ही उसने आरटीआई लगाई, उच्च अधिकारियों को लिखा परंतु उसका वो हाल किया कि आज वह बोल भी नहीं रहा है।
अभी कुतरूं रुका नहीं और उसने कहा कि शेर सिंह की वजह से मैं आज बहुत अनुभवी हो गया हूं। पहले तो मैं शिक्षक था, अब मैं वकील बन गया हूं और अब वकीलों की तो ऐसी तैसी करता हूं। शेर सिंह ने मुझे वकील बना दिया।
पास बैठे शिक्षकों ने धीमे स्वर में कहा -यदि शेर सिंह ने आपको वकील बना दिया तो इसका मतलब शेर सिंह आपका गुरु निकला। आखिर शेर सिंह है ही आपका गुरु। तुम जैसे तो उसने न जाने कितने कुतरुओं को पढ़ा पढ़ाकर एक तरफ बैठा दिए। माहौल में हंसी की फुहार फूट पड़ी।
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कुतरूं प्राचार्य ने कई बार कहा है कि शेर सिंह ने उनके विरुद्ध कई बार आरटीआई लगाई हैं तथा बार बार परेशान किया है। उनके विरुद्ध कुतरूं प्राचार्य ने कहा कि अब तक में शिक्षक था किंतु शेर सिंह ने उन्हें वकील बना दिया है। पास बैठे शिक्षक ने कहा कि सचमुच फिर तो शेर सिंह आपका गुरू हैं। आप जैसे कितने ही वकील उन्होंने बना दिये हैं। कुतरूं प्राचार्य ने एक दिन कहां कि वकील भी अब तो मेरे से पूछने आते हैं। ऐसा एक बार नहीं कुतरूं प्राचार्य ने कई बार शेर सिंह का हवाला दे चुके हैं। जिसके विरुद्ध उल्टी सीधी बातें भी करता सुना गया और यह सत्य है किसी का विरोध भी अधिक है तो वह व्यक्ति महान है। शिक्षकों ने जब सुना तो कहा कि सचमुच आज भी कुतरूं प्राचार्य शेर सिंह से डरता है। नहीं डरेगा तो एक दिन मुंह की खाएगा। शिक्षक बहुत खुश हुए और कहा कि सचमुच शेर सिंह इतने महान व्यक्ति तो है जिनका कोई तोड़ नहीं है। इनके आगे कितने कुतरूं प्राचार्य पानी भरते हैं। यही कारण है कि बार-बार उनकी चर्चा करने का अर्थ है कि कुतरूं उनसे खूब अंदर खाते डरते हैं।
       



क्या मिला पत्रकारिता से
-सज्जन इंसान को नहीं करनी चाहिए पत्रकारिता
-लेखन बुद्धि का खेल एवं चिंतनशीलता का कार्य
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कनीना की आवाज।
 डा. होशियार सिंह कनीना निवासी ने बहुत लंबे समय से पत्रकारिता की है। वे करीब चार दशकों से पत्रकारिता और लेखन कार्य से जुड़े हुए हैं। यह सत्य है कि जिस ईमानदारी का परिचय देते हुए, जिस लग्नशीलता के चलते हुए पत्रकारिता की है उससे कुछ हासिल नहीं हुआ हासिल हुआ था लोगों का प्यार और स्नेह वह भी थोड़ा बहुत। अक्सर साथी पत्रकार पूछते कि तुमने आखिर पत्रकारिता में क्या पाया?
यह सत्य है। अकसर पत्रकारों को पत्रकारिता में एक्रिडिएशन मिलता है, उनमें भी डा. होशियार सिंह का नाम शामिल नहीं है। रही बात पत्रकारिता में जहां विज्ञापन मिलने चाहिए वो भी उतने कभी विज्ञापन नहीं मिले। पत्रकारिता में जो लाभ कमाना चाहिए और कुछ पत्रकार कमा लेते हैं वह लाभ भी होशियार सिंह ने कभी नहीं कमाया। अपने काम निकलवाने हो तो भी नहीं निकलवा पाया। हां बहुत अधिक मिली लोगों की गलियां, लात, घूंसे आदि। उन्होंने सीधे प्रहार नहीं किया किंतु उनकी बातों से ऐसा लगता है कि उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है। मेरे साथी पत्रकार जहां घूमने के लिए दूर हिमाचल में गए हुए थे उनसे अनायास ही बात हुई। उन्होंने कहा कि उनके न्यूज़ चैनल ने उन्हें घूमने के लिए चार दिनों का टूर दिया है? क्या आपके अखबार ने कभी दिया है? सच है ही कहा। शायद कोई समाचार पत्र नहीं जिसमें डा. होशियार सिंह ने काम नहीं किया हो किंतु जितना प्यार दैनिक ट्रिब्यून ने दिया था उतना शायद कभी नहीं मिल पाया। दैनिक जागरण में सबसे अधिक लंबे तक टिका रहा किंतु एक जाति विशेष की बदौलत आगे नहीं बढ़ पाया। लेकिन पारिश्रमिक भी बंद कर दिया। कोरोना कल के बाद पारिश्रमिक देना बंद कर दिया है। अपनी जेब से खर्च करके तब अखबार में समाचार छपते हैं। अक्सर लोग कह देते हैं कि समाचार प्रकाशित नहीं किया परंतु यह नहीं पूछते कि तुम कितना खर्चा इन समाचारों पर करते हो?  साइकिल पर चलना, प्रतिदिन 60-70 किलोमीटर साइकिल चल लेती है। अपना इंटरनेट, अपना मोबाइल और सबसे बड़ा कीमती समय बर्बाद करना पड़ रहा है और हर महीने हजारों रुपए का नुकसान हो रहा है फिर भी इसलिए जुड़ा हुआ हूं कि किसी भाई को यह समस्या न आए कि उसके समाचार नहीं छपे। समाचार हर हाल में छपवाए हैं। यह भी सत्य है कनीना के सभी पत्रकारों ने जितने समाचार छपाये होंगे उसके सारे समाचारों के आधे से अधिक अकेले डा. होशियार सिंह के होंगे। बहुत से लोग जानते तक नहीं। जब जान पहचान ही नहीं है तो कैसी पत्रकारिता? कभी थाना तहसील में जाकर नहीं देखा कैसी पहचान बनेगी? इसलिए पत्रकारिता सज्जन लोगों के लिए नहीं होती। हां लेखन कार्य जरूर संभव है जिसमें  बुद्धि और तर्कशीलता की जरूरत होती है। यही कारण है कि आज 44 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। और भविष्य में कम से कम 60 पुस्तकें और प्रकाशित होने का मैटर सुरक्षित है। मुझे कहने में हिचक नहीं है कि पत्रकारिता में खोया है पाया नहीं लेखन में पाया है खोया नहीं। आज भी किसी भाई को लेखन संबंधी या पत्रकारिता संबंधित जानकारी चाहिए वह खुशी-खुशी संपर्क कर सकता है जितना ज्ञान है है उस अनुसार उसकी की मदद की जाएगी।

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